मार्क टली की यादें: वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने साझा किए अनसुने किस्से
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मार्क टली की यादें: वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने साझा किए अनसुने किस्से

"गांव वाले मुझे ही मार्क टली समझ लेते थे..." पुराने साथी मधुकर उपाध्याय ने याद किया इमरजेंसी का दौर और टली का वो अधूरा सपना।


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Tribute To Mark Tully : बीबीसी के दिग्गज पत्रकार मार्क टली के निधन से पत्रकारिता जगत का एक युग समाप्त हो गया है। उनके साथ लंबे समय तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने उनसे जुड़ी अपनी यादें साझा की हैं। मधुकर बताते हैं कि इमरजेंसी के दौर में जब वे गोरखपुर के एक अखबार में थे, तब मार्क टली उनके लिए एक नायक की तरह थे। उस समय सरकार की आंखों में आंखें डालकर सच बोलने वाला अगर कोई पत्रकार था, तो वे मार्क टली ही थे। मधुकर उपाध्याय जब दिल्ली आए और बीबीसी ज्वाइन किया, तो उस समय दफ्तर में सिर्फ तीन लोग हुआ करते थे- मार्क टली, सतीश जैकब और खुद मधुकर।


जीवन का वो एक मलाल: 'धार्मिक संवाददाता' न बन पाना

मधुकर उपाध्याय बताते हैं कि मार्क टली के मन में एक बात का मलाल ताउम्र रहा। मार्क की भारत के सभी धर्मों में गहरी रुचि और जबरदस्त पकड़ थी। वे चाहते थे कि बीबीसी उन्हें 'रिलीजियस अफेयर्स करेस्पोंडेंट' (धार्मिक मामलों का संवाददाता) बनाए। लेकिन यह पद उन्हें कभी नहीं मिला। उनके बाद कई लोग इस पद पर आए, लेकिन मार्क की यह इच्छा अधूरी रह गई। उन्होंने मधुकर से एक-दो बार इस बात का जिक्र भी किया था।


"अरे! आप मार्क टली नहीं हैं?"

उन दिनों मार्क टली की लोकप्रियता का आलम क्या था, इसका एक दिलचस्प किस्सा मधुकर सुनाते हैं। वे बताते हैं, "जब मैं रिपोर्टिंग के लिए गांवों में जाता था, तो लोग बीबीसी का नाम सुनते ही मुझे घेर लेते थे। वे पूछते थे- 'आप तो मार्क नहीं हैं?' गांव वालों को लगता था कि बीबीसी से आने वाला हर पत्रकार मार्क टली ही है।" लोगों ने रेडियो पर सिर्फ उनकी आवाज सुनी थी, इसलिए उन्हें लगता था कि मार्क कोई भारतीय ही होंगे। यह मुगालता अक्सर लोगों को हो जाया करता था।


विलियम नाम से नफरत और 200 शब्दों की आदत

एक मजेदार वाकया साझा करते हुए मधुकर उपाध्याय बताते हैं कि मार्क टली जब रिटायर हुए, तो उन्होंने उनका एक हिंदी इंटरव्यू लिया। परिचय देते समय मधुकर ने कहा- "सर विलियम मार्क टली"। इस पर मार्क तुरंत बोल पड़े- "विलियम हटाओ, इतना लंबा नाम कोई नहीं पहचानेगा। सिर्फ मार्क टली कहो।" मार्क को किताबें लिखना बहुत मुश्किल काम लगता था। वे कहते थे कि बीबीसी की रिपोर्टिंग करते-करते उन्हें 200 शब्द लिखने की आदत पड़ गई है। टाइपराइटर पर 200 शब्दों के बाद वे 'मार्क टली, दिल्ली' लिखकर खत्म करना चाहते थे। उन्हें ताज्जुब होता था कि लोग लंबी किताबें कैसे लिख लेते हैं।


गाजीपुर से सीखी गालियां और सियासत

मधुकर याद करते हैं कि मार्क का मानना था कि दिल्ली की सत्ता को समझने के लिए यूपी को समझना जरूरी है। इसलिए वे हिंदी, अवधी और भोजपुरी सीखने के लिए अक्सर गाजीपुर और पूर्वी यूपी के दौरों पर जाते थे। जब वे लौटते थे, तो साथी मजाक में कहते थे कि मार्क ने हिंदी तो नहीं सीखी, लेकिन गालियां जरूर सीख ली हैं। यह भारत के प्रति उनका सहज प्रेम था, जिसने उन्हें कभी वापस अपने देश लौटने नहीं दिया।


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