महिला आरक्षण को तेजी से लागू करने पर विराम, सरकार की नजर विशेष या मानसून सत्र पर
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संसद में 33% सीटों के आरक्षण के मोदी सरकार के कदम ने भारतीय राजनीति में एकजुटता से ज्यादा विवाद को जन्म दिया है।

महिला आरक्षण को तेजी से लागू करने पर विराम, सरकार की नजर विशेष या मानसून सत्र पर

केंद्र सरकार 33% आरक्षण को अगली जनगणना से अलग करने पर विचार कर रही है, लेकिन विपक्ष सहमति की मांग कर रहा है।


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केंद्र सरकार संसद के मौजूदा बजट सत्र में, जो 2 अप्रैल को समाप्त होने वाला है, नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023—यानी महिला आरक्षण कानून—में संशोधन को आगे बढ़ाने की संभावना कम है। सत्र खत्म होने से पहले केवल चार बैठकें शेष हैं और विपक्षी गठबंधन INDIA इस संशोधन को जल्दबाजी में लाने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में सरकार या तो विशेष सत्र बुला सकती है या फिर साल के अंत में मानसून सत्र का इंतजार कर सकती है।

महिला आरक्षण कानून में संशोधन को लेकर सरकार की मंशा

केंद्र सरकार सितंबर 2023 में विशेष संसदीय सत्र के दौरान पारित महिला आरक्षण कानून में संशोधन कर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% आरक्षण को जल्दी लागू करना चाहती है।

इसके लिए सरकार इस प्रक्रिया को नई जनगणना और परिसीमन आयोग के गठन की अनिवार्यता से अलग करना चाहती है।

कानून पर पहले भी उठे थे सवाल

करीब ढाई साल पहले पारित इस कानून की विपक्ष ने इस बात को लेकर कड़ी आलोचना की थी कि इसमें लागू होने की कोई निश्चित समयसीमा नहीं है।

2023 के कानून के अनुसार, आरक्षण लागू करने का फैसला उस परिसीमन आयोग की सिफारिशों के आधार पर होगा, जिसे 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के बाद गठित किया जाएगा। (परिसीमन पर 2026 तक रोक है; सामान्य स्थिति में अगली जनगणना 2031 में होती, लेकिन वर्तमान परिस्थिति में यह 2027 मानी जा रही है।)

यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब यह कानून पारित हुआ था, तब 2021 से लंबित अगली जनगणना को लेकर कोई स्पष्टता नहीं थी।

हालांकि संसद के दोनों सदनों ने इस कानून को सर्वसम्मति से पारित किया था, लेकिन उस समय विपक्ष के कई नेताओं ने कहा था कि बिना तय समयसीमा के कानून बनाना उचित नहीं है। विपक्ष ने यह भी मांग की थी कि इस कानून को परिसीमन प्रक्रिया से अलग किया जाए।

सरकार ने विपक्ष से बातचीत शुरू की

इस महीने की शुरुआत में केंद्र सरकार ने विपक्षी दलों से संपर्क करना शुरू किया, ताकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिला आरक्षण लागू करने की समयसीमा को आगे बढ़ाने पर सहमति बन सके।

सरकार का प्रस्ताव था कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन किया जाए और महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाएं। इसके साथ ही लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 (लगभग 50% वृद्धि) करने का भी प्रस्ताव है।

विपक्ष का रुख

विपक्ष सिद्धांत रूप में महिला आरक्षण को जल्दी लागू करने के पक्ष में है, जैसा कि उसने 2023 में भी मांग की थी। लेकिन उसका कहना है कि प्रस्तावित संशोधनों के सभी पहलुओं पर पहले विस्तृत चर्चा होनी चाहिए।

‘ध्यान भटकाने का हथियार’

बुधवार (25 मार्च) को कांग्रेस के राज्यसभा मुख्य सचेतक जयराम रमेश ने केंद्र के इस प्रस्ताव को “ध्यान भटकाने का हथियार” बताया। उन्होंने याद दिलाया कि सितंबर 2023 में जब यह कानून लाया गया था, तब कांग्रेस ने मांग की थी कि इसे 2024 के लोकसभा चुनाव से ही लागू किया जाए।

एक दिन पहले, राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी INDIA गठबंधन की ओर से केंद्र सरकार को पत्र लिखकर मांग की थी कि 2023 के कानून में प्रस्तावित संशोधनों पर चर्चा के लिए पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए। इसके बाद ही असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनावों के खत्म होने के बाद संसद के किसी सत्र में इन बदलावों को पेश किया जाए।

लोकसभा और विधानसभाओं के आकार बढ़ाने का मुद्दा

विपक्ष के इस रुख को दोहराते हुए बुधवार को जयराम रमेश ने कहा कि केंद्र की “लोकसभा और विधानसभाओं का आकार 50% बढ़ाने” की योजना पर भी “गंभीर विचार-विमर्श” जरूरी है।

परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव पहले से ही केंद्र के लिए एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। पहले की रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 816 करने के लिए संबंधित कानूनों और संविधान में संशोधन करने पर विचार कर रही है, जबकि हर राज्य का वर्तमान प्रतिशत प्रतिनिधित्व बनाए रखने की कोशिश की जा रही है।

विपक्ष शासित राज्यों की आपत्ति

कई राज्यों—खासकर विपक्ष शासित तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना साथ ही पंजाब और हिमाचल प्रदेश—ने जनसंख्या के आधार पर परिसीमन का जोरदार विरोध किया है।

इन राज्यों का कहना है कि ऐसा करने से उनकी लोकसभा में हिस्सेदारी और प्रभाव कम हो सकता है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ जाएगा।

DMK जैसी पार्टियों का तर्क है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन करना उन राज्यों को दंडित करने जैसा होगा, जिन्होंने परिवार नियोजन को सफलतापूर्वक लागू किया है, जबकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को इसका लाभ मिलेगा।

केंद्र सरकार का यह प्रस्ताव कि लोकसभा की कुल सीटें बढ़ाई जाएं लेकिन राज्यों का प्रतिशत प्रतिनिधित्व वही रखा जाए, DMK जैसी पार्टियों की चिंताओं को कम करने की कोशिश है। साथ ही, इससे सरकार महिला आरक्षण लागू करने के अपने प्रयास को भी आगे बढ़ाना चाहती है, जिसका राजनीतिक लाभ भाजपा को भविष्य के चुनावों में मिल सकता है।

फिलहाल पीछे हटी सरकार

विपक्ष द्वारा संशोधनों पर सहमति और विस्तृत चर्चा की मांग के बीच, और बजट सत्र खत्म होने में कम समय बचने के कारण, केंद्र सरकार फिलहाल पीछे हटती नजर आ रही है।

अन्य विधेयक भी लंबित

सरकार के इस फैसले के पीछे एक कारण यह भी है कि अभी वित्त विधेयक (Finance Bill) को संसद से मंजूरी मिलना बाकी है। यह विधेयक बुधवार को लोकसभा में पारित हो चुका है और उम्मीद है कि 26 मार्च को राम नवमी की छुट्टी के बाद, 27 मार्च को राज्यसभा इसे वापस लोकसभा भेजेगी।

इसके अलावा, दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक भी संसद के दोनों सदनों में पेश किए गए हैं, जिन्हें अगले सप्ताह पारित किया जाना है।

ऐसे में मौजूदा सत्र में महिला आरक्षण कानून और उससे जुड़े संवैधानिक संशोधनों को पेश करने और उन पर विस्तृत चर्चा के बाद पारित कराने के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा है।

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