
इस साल कम बरसेंगे बादल, स्काइमेट का मानसून पूर्वानुमान
इस साल कम बरसेंगे बादल, स्काइमेट का मानसून पूर्वानुमान। ये मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाली निजी कंपनी है। जो कृषि-परामर्श और जोखिम प्रबंधन समाधान प्रदान करती है
मौसम की जानकारी देने वाली प्रमुख निजी संस्था 'स्काईमेट' ने हाल ही में एक चिंताजनक अनुमान जारी किया है। स्काईमेट का कहना है कि वर्ष 2026 में भारत में मानसून की बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना है। संस्था ने इसके लिए मुख्य रूप से 'अल नीनो' (El Niño) के प्रभाव को जिम्मेदार ठहराया है। यह स्थिति विशेष रूप से मानसून के दूसरे भाग यानी अगस्त और सितंबर के महीनों में बारिश को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है। स्काईमेट के अनुसार, इस साल कुल मानसूनी वर्षा 868.6 मिलीमीटर के दीर्घकालिक औसत का केवल 94% ही रहने का अनुमान है। अब सभी की निगाहें सरकारी संस्था 'भारत मौसम विज्ञान विभाग' (IMD) पर टिकी हैं, जो अगले सप्ताह मानसून का अपना आधिकारिक पूर्वानुमान जारी करने वाली है।
मानसून का यह चक्र भारत की अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की जीवनशैली के लिए रीढ़ की हड्डी जैसा है। भारत की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 70% हिस्सा जून से सितंबर के बीच होने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून से ही प्राप्त होता है। यह बारिश न केवल देश की कृषि व्यवस्था को जीवित रखती है बल्कि देश की जीडीपी में भी एक बड़ा योगदान देती है। भारत की 1.4 अरब से अधिक आबादी का आधे से अधिक हिस्सा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि और उससे संबंधित कार्यों पर निर्भर है। जून और जुलाई का समय 'खरीफ' फसलों की बुवाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसलिए मानसून का सही समय पर आना और उसका वितरण पूरे देश में समान रूप से होना बहुत आवश्यक है। सामान्यतौर पर मानसून 1 जून को केरल में दस्तक देता है और 15 जुलाई तक पूरे देश में सक्रिय हो जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे 'अल नीनो' और 'ला नीना' नामक दो मौसमी स्थितियां प्रमुख भूमिका निभाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, 'अल नीनो' का मतलब प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का सामान्य से अधिक गर्म होना है, जो भारत में मानसून की बारिश को कम कर देता है। इसके ठीक विपरीत, 'ला नीना' वह स्थिति है जब समुद्र की सतह ठंडी होती है, जो मानसून को मजबूत बनाने में मदद करती है। इस वर्ष अल नीनो का प्रभाव भारत की मानसूनी बारिश के लिए एक बड़ी बाधा बनकर उभरा है। यदि बारिश का वितरण असंतुलित रहता है या समय पर बुवाई नहीं हो पाती है तो इसका सीधा असर फसलों की पैदावार और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है, जो आने वाले समय में देश के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

