
AIMIM का विस्तार और विपक्ष की उलझन: ओवैसी का उभार बनी कांग्रेस-सपा-RJD-TMC के लिए खतरे की घंटी!
ओवैसी के उभार से BJP को बड़ा फायदा मिलता नजर आ रहा है. क्योंकि महाराष्ट्र निकास चुनाव हो या बिहार विधानसभा चुनाव. मुसलमानों के वोटों के बिखराव का AIMIM को बड़ा फायदा मिला है
क्या हैदराबाद के रहने वाले लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) देश में मुसलमानों की पार्टी हो गई है. जिस ओवैसी को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के B टीम कहकर दूसरे विपक्षी दलों अछूत मानते थे उसे वोट कटवा मानते थे, वो बिहार विधानसभा चुनाव और अब महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में धमाकेदार प्रदर्शन कर भारतीय राजनीति के बड़े धुरंधर बनकर उभरे हैं जो किसी भी चुनाव के नतीजे को प्रभावित कर सकते हैं.
महाराष्ट्र निकाय चुनावों में AIMIM का उभार
महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में यही हुआ है. हाल ही में जो वहां निकाय चुनाव हुए उसके नतीजों ने देश की राजनीति में अचानक से ओवैसी को एक मजबूत ताकत के रूप में उभार दिया है. ओवैसी की AIMIM ने राज्य के निकाय चुनावों में 125 सीटों में जीत हासिल की है जिसके बाद ना केवल महाराष्ट्र की राजनीति में AIMIM बड़ी ताकत बनकर उभरी है बल्कि वो महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में मजबूत दावेदार बन चुकी है. पार्टी की पकड़ मजबूत हुई है ओवैसी ने राज्य की राजनीति के समीकरण भी बदले दिए हैं. महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में AIMIM को ज्यादा सफलता नहीं मिली थी. पार्टी ने 16 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन सिर्फ मालेगांव सेंट्रल की एक सीट जीत पाई थी. जबकि औरंगाबाद यानी छत्रपति संभाजीनगर जो वो 2019 में जीतने में कामयाब हुई थी वो 2024 के लोकसभा चुनाव में हार गई थी. लेकिन इन असफलताओं को पार पाते हुए निकाय चुनाव में AIMIM ने जोरदार वापसी की है.
AIMIM के पास छिटक गए मुसलिम वोट
महाराष्ट्र निकाय चुनाव के नतीजों से साफ है कि अल्पसंख्यक वोट अब दूसरी दिशा में जा रहे हैं. पहले मुसलिम वोट कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और एनसीपी को मिलते थे, लेकिन इस बार कई जगहों पर AIMIM ने उनके वोट काट लिए. छत्रपति संभाजीनगर और मालेगांव जैसे इलाकों में मुस्लिम बहुल वार्डों में बड़ी संख्या में लोगों ने AIMIM के पतंग निशान पर वोट दिए.
ओवैसी को भाव नहीं देने का बिहार में दिखा नतीजा
इससे पहले बिहार विधानसभा चुनाव में सीमांचल के मुसलिम बहुल इलाके के सीटों पर ओवैसी के AIMIM ने धमाकेदार वापसी की और 5 सीट जीत लिए और महागठबंधन के दल आरजेडी कांग्रेस को कई सीटों पर खासा नुकसान पहुंचाया और इससे बीजेपी - जेडीयू को जीत में मदद भी मिली. 2020 में भी AIMIM ने अच्छा प्रदर्शन किया था और 5 सीटें जीती लेकिन उसके 4 विधायक आरजेडी में शामिल हो गए. ओवैसी बिहार चुनाव में आरजेडी के साथ समझौता करना चाहती थी लेकिन तेजस्वी यादव ने ओवैसी को भाव नहीं दिया और नतीजा हम सबके सामने है. औवेसी ने अपनी बेइज्ती का बदला ले लिया.
ओवैसी के साथ गोलबंद हो रहे मुसलमान
महाराष्ट्र निकाय और बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद अब ये सवाल खड़ा हो रहा क्या भारत के मुसलमान, मुसलिम राजनीति करने वाले ओवैसी के साथ गोलबंद हो सकते हैं? क्या ये संभव है? और अगर ऐसा हुआ तो इसके क्या परिणाम होंगे? मोदी-शाह की बीजेपी तो यही चाहती होगी. लेकिन ये तय है कि अगर ऐसा हुआ भारत की राजनीति और खासतौर से उत्तर भारत की राजनीति पूरी तरीके से बदल जाएगी.
संकट में कांग्रेस, SP, RJD और TMC का वोटबैंक
बिहार में जिस यादव-मुसलिम यानी MY वोटबैंक को लालू प्रसाद यादव ने तैयार किया था वो टूट जाएगा,बिखर जाएगा. उत्तर प्रदेश में भी अखिलेश यादव की मुश्किलें बढ़ जाएगी क्योंकि उनका सबसे बड़ा जनाधार यादव-मुसलिम वोटबैंक ही है. कांग्रेस को बड़ा नुकसान होगा. उत्तर प्रदेश और बिहार से बाहर जिन राज्यों में उसे मुसलमानों के वोट मिलते हैं उसमें बड़ा बिखराव आ जाएगा और मुसलमानों का वोट छिटककर ओवैसी के पास चला जाएगा. दिल्ली में आम आदमी पार्टी को 2025 के विधानसभा चुनाव में AIMIM नुकसान पहुंचा चुकी है. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव जो 2 महीने बाद होने वाला है उसमें टीएमसी और ममता बनर्जी के सामने औवैसी की AIMIM बड़ी चुनौती पेश कर सकती है. ममता का बड़ा वोटबैंक राज्य में मुसलमान ही हैं.
ओवैसी बन गए मुसलमानों के नेता
जहां जहां भी चुनाव होते हैं वहां सभी राजनीतिक दल के टिकट देने का आधार धर्म और जाति ही होता है. जहां ब्राह्मण की संख्या ज्यादा होती है वहां ब्राह्मण को ही टिकट दिया जाता है. यादव बहुल इलाके या जो कुर्मी बहुल इलाका होता है वहां उसी जाति के नेता को टिकट दिया जाता है. मुसलमान बहुल इलाके में सभी दल मुसलमान को ही टिकट देते हैं. तो ऐसे में मुसलमानों के बीच और खासतौर से शहरी इलाकों में ये सोच गहरी होती जा रही है कि वे मुसलमान नेता के पीछे लामबंद क्यों ना हो जो उनके हितों की बात करता हो. ओवैसी भी यही तर्क देते हैं. साथ ही ऑपरेशन सिंदूर के बाद अलग-अलग देशों में जो प्रतिनिधिमंडल भेजा गया उसमें ओवैसी भी शामिल थे ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी ओवैसी ने खुद को मुसलमानों का नेता साबित करने में सफलता हासिल कर ली.
ओवैसी के उभार से BJP को फायदा
ओवैसी के भारतीय राजनीति में इस तरह के उभार से भारतीय जनता पार्टी को बड़ा फायदा मिलता नजर आ रहा है. क्योंकि महाराष्ट्र निकास चुनाव हो या बिहार विधानसभा चुनाव . मुसलमानों के वोटों के बिखराव का उसे बड़ा फायदा मिला है और ओवैसी जिस प्रकार मुसलमानों के नेता बनकर उभरे हैं और विपक्ष को नुकसान पहुंचा रहे हैं उससे आने वाले चुनावों में भी फायदा मिलता रहेगा. लेकिन कांग्रेस, समाजवादी पार्टी आरजेडी टीएमसी जैसे दल अब दोराहे पर खड़े हैं और उनकी उलझनें बढ़ती जा रही है. ओवैसी के साथ वे क्या करें? जिस ओवेसी को वे अब तक बीजेपी की B टीम बताते रहे हैं उसके साथ गठबंधन करें या नहीं? हालिया चुनावी नतीजों के बाद इन दलों के माथे पर बल पड़ चुका है. वे ओवैसी के साथ हाथ मिलाये या नहीं लेकिन AIMIM और ओवैसी का कद भारतीय राजनीति में उस मुकाम पर पहुंच चुका है कि उनकी अनदेखी करना अब असंभव सा नजर आ रहा है. मुसलमान भी उन दलों से निराश हैं जिन्हें ये दल केवल वोटबैंक मानकर चलती हैं. यही वजह है कि मुसलिम वोटबैंक ओवैसी का बनता जा रहा है.

