राष्ट्रीय मतदाता दिवस बना प्रतीक, असली मुद्दे अब भी अनसुलझे
x

राष्ट्रीय मतदाता दिवस बना प्रतीक, असली मुद्दे अब भी अनसुलझे

SIR के तहत लाखों मतदाता ड्राफ्ट सूची से गायब हैं। BLO कार्यभार, दस्तावेज़ी जद्दोजहद और राजनीतिक विरोध के बीच लोकतंत्र और वोटर अधिकार प्रभावित।


लखनऊ, उत्तर प्रदेश के 37 वर्षीय व्यवसायी सर्वेश कुमार पांडे ऐसे ही लोगों में शामिल हैं जिनके नाम पिछले साल राज्य में शुरू किए गए स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के बाद प्रारंभिक मतदाता सूची से हटा दिए गए। मूल रूप से सोनभद्र जिले की डुद्धी विधानसभा क्षेत्र के निवासी पांडे का कहना है कि उनके नाम को इसलिए हटाया गया क्योंकि उनके क्षेत्र में इस प्रक्रिया को संचालित करने वाले बूथ स्तर अधिकारी (BLO) ने पाया कि वे कई साल पहले लखनऊ आ गए थे।

पांडे कहते हैं जब राज्य में पिछली बार मतदाता सूची का संशोधन हुआ, 2003 में, तब मैं मतदान की उम्र का नहीं था। हालांकि, जैसे ही मैं वोट देने के योग्य हुआ, मैंने मतदाता कार्ड बनवाया और 2017 और 2022 की विधानसभा चुनाव तथा 2019 के आम चुनाव में वोट किया। 2024 के अंतिम आम चुनाव में मैं काम की व्यस्तता के कारण मतदान नहीं कर पाया। वे आगे बताते हैं जब BLO ने पाया कि मैं लखनऊ में रह रहा हूं. तो उन्होंने मेरे नाम को दुद्धी सूची से हटा दिया और नोट किया कि मैं स्थानांतरित हो गया हूँ। अब मुझे बताया गया है कि मुझे लखनऊ में नाम जोड़वाना होगा।

SIR की व्यापकता और विवाद

हाल ही में बिहार में जून 2025 में शुरू हुए SIR के तहत भारत के 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 6.5 करोड़ नाम प्रारंभिक मतदाता सूची से हटाए गए। इसके बाद यह प्रक्रिया पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और गुजरात सहित अन्य राज्यों में भी की गई।

इस प्रक्रिया को हर जगह विवाद और भ्रम का सामना करना पड़ा। कई BLOs ने अत्यधिक कार्यभार और असंभव समयसीमा का हवाला देते हुए आत्महत्या की। जनता में नाम हटाए जाने को लेकर आक्रोश फैल गया। नियमों और दस्तावेज़ी प्रमाणों को लेकर उलझन बनी रही। विपक्षी पार्टियों ने ECI पर आरोप लगाया कि वह केंद्र की एनडीए सरकार के लिए मतदाता धोखाधड़ी की सुविधा दे रही है।

22 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या ECI ने SIR के लिए “स्पष्ट और प्रभावशाली” तरीके से सीमा पार प्रवासन को कारण बताया है। भाजपा और एनडीए सहयोगियों ने बार-बार कहा है कि यह प्रक्रिया कथित नकली मतदाताओं और अवैध प्रवासियों के नाम हटाने के लिए की गई। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ECI ने केवल “बार-बार होने वाले प्रवासन” को कारण बताया है।

राष्ट्रीय मतदाता दिवस और लोकतंत्र में अर्थ

इसी पृष्ठभूमि में 25 जनवरी को देश राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाएगा। 2011 में शुरू किया गया यह दिन ECI की स्थापना (1950) की वर्षगांठ को समर्पित है। इसका उद्देश्य “मतदाता नामांकन को प्रोत्साहित करना, सुविधाजनक बनाना और अधिकतम करना” तथा “जागरूकता फैलाकर मतदान में सूचित भागीदारी को बढ़ावा देना” है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय मतदाता दिवस को “EC के अद्भुत योगदान की सराहना करने का अवसर” बताया है। लेकिन SIR विवाद और इसके खिलाफ जनता की भावना के बीच, क्या यह दिन आज के मतदाताओं के लिए वास्तव में महत्वपूर्ण है, या यह सिर्फ प्रतीकात्मक घटना बनकर रह गया है?

राजनीतिक प्रतिक्रिया और विरोध

SIR के खिलाफ राजनीतिक विरोध बिहार में इसके लॉन्च के समय शुरू हुआ, राज्य विधानसभा चुनावों से महीने पहले। संसद में विपक्ष ने पूरे मानसून सत्र को बाधित किया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अगस्त में RJD, विकासशील इंसान पार्टी और CPI-ML(L) के सहयोगियों के साथ 17 दिन की वोटर अधिकार यात्रा की।

हालांकि इस यात्रा में बड़ी भीड़ जुटी, लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्ष का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। 243 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस समेत महागठबंधन को केवल 35 सीटें मिलीं। विपक्ष अब भी मानता है कि SIR ने NDA की भारी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

RJD के सांसद अभय कुशवाहा ने कहा, “EC अब तक नए मतदाताओं का श्रेणीवार विवरण नहीं दे सका। हमने पूछा कि ड्राफ्ट रोल से हटाए गए कितने मतदाता अंतिम सूची में शामिल हुए, कितने विदेशी पाए गए, कोई जवाब नहीं मिला।” CPI-ML(L) के दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि SIR लोकतंत्र को कमजोर करने का एक अत्यंत कठोर तरीका है।

जनता की परेशानियां

सर्वेश कुमार पांडे, रमेश प्रसाद, और अन्य ऐसे लोग हैं जिनके नाम ड्राफ्ट सूची से गायब हो गए। BLOs को अत्यधिक कार्यभार का सामना करना पड़ रहा है। पेंड़गुलियों और अनपढ़ लोगों को दस्तावेज़ी प्रमाण दिखाने में परेशानी हो रही है।

70 वर्षीय शेख मुज़ाम्बिल, जिन्होंने परिवार का उपनाम बदल दिया था, अब अपने बेटे के नाम के कारण सुनवाई में हैं। केरल की जैनकी श्री, के चेन्नई में जन्मी, अपने परिवार के नामों के मिलान की जद्दोजहद में हैं। बंगाल में नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन और उनके परिवार को भी नामों में मतभेद के कारण नोटिस मिला।

धार्मिक और अन्य समुदाय

रामकृष्ण मिशन के साधु और मिशनरीज ऑफ चैरिटी की ननें भी इसी प्रक्रिया का सामना कर रही हैं क्योंकि उनके आध्यात्मिक और जैविक माता-पिता के नाम भिन्न हैं।

राजनीतिक बहस और BJP की प्रतिक्रिया

विपक्ष SIR और ECI की भूमिका पर जोर दे रहा है। बंगाल में TMC ने इसे “सॉफ्टवेयर आधारित धांधली” बताया। DMK के सारवनन अन्नादुरई ने कहा, SIR ने ECI की विश्वसनीयता को नष्ट किया।”

कांग्रेस के इमरान प्रतापगढ़ी ने कहा, मतदाता ही सबसे महत्वपूर्ण है। लेकिन पिछले 10 वर्षों में मतदाता पूरी तरह से इस समीकरण से बाहर हो गया। BJP का कहना है कि SIR आवश्यक प्रक्रिया है और नकली मतदाताओं को हटाने के लिए जरूरी था।

ECI की कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। नाम गायब होने वालों के लिए राष्ट्रीय मतदाता दिवस घाव पर नमक छिड़कने जैसा है। सर्वेश कुमार पांडे ने भी सवाल उठाया, “मेरे नाम को वापस जोड़ने के लिए बार-बार फॉर्म 6 के लिए जाना असंभव है। मेरा नाम सोनभद्र से हट गया। क्या यह लखनऊ में जोड़ा जाएगा? ऐसी स्थिति में मेरे लिए मतदाता दिवस का क्या मतलब?

(पुनीत निकोलस यादव, समीर के पुरकायस्थ, राजीव रामचंद्रन, शिल्पी सेन और श्वेता त्रिपाठी के इनपुट के साथ)

Read More
Next Story