
एनसीईआरटी किताब बैन से भड़की बहस, क्या आलोचना से ऊपर है न्यायपालिका?
NCERT पुस्तक में न्यायपालिका पर टिप्पणी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से ‘अवमानना’, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बेसिक स्ट्रक्चर पर नई बहस छिड़ी हुई है।
एनसीईआरटी (NCERT) विवाद की शुरुआत एक वैधानिक परिभाषा से होती है। अवमानना न्यायालय अधिनियम, 1971 की धारा 2(सी)(i) के अनुसार, आपराधिक अवमानना वह कृत्य है जो किसी अदालत की “छवि को धूमिल करे या धूमिल करने की प्रवृत्ति रखता हो।” कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक को लेकर उठे विवाद को लगभग पूरी तरह इसी नजरिए से देखा गया है।
अदालत को बदनाम करना (Scandalising the Court) की यह अवधारणा अंग्रेजी कॉमन लॉ से आई है, जिसकी जड़ें राजशाही न्याय व्यवस्था में हैं। ऐतिहासिक रूप से ब्रिटिश न्यायाधीशों को क्राउन का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि माना जाता था, और उन पर हमला संप्रभु पर हमला समझा जाता था। एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता ने इसे न्यायपालिका के चारों ओर “गरिमा की आभा” बनाए रखने का सिद्धांत बताया था, ताकि जनता का विश्वास कायम रहे।
यह शब्दावली कुछ हद तक पितृसत्तात्मक और अधिनायकवादी मानी जाती है, क्योंकि इसका उद्देश्य न्यायपालिका को हर प्रकार की आलोचना से बचाना और उसकी रहस्यमयी प्रतिष्ठा बनाए रखना था।
ब्रिटेन में समाप्त, भारत में कायम
विडंबना यह है कि जिस ब्रिटेन से यह सिद्धांत आया, वहीं 2013 में लॉ कमीशन की सिफारिश पर इसे समाप्त कर दिया गया। इसके बाद ब्रिटेन की अदालतों ने अदालत को बदनाम करना को अप्रासंगिक मान लिया। भारत में हालांकि इस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिकाएं सफल नहीं हो पाई हैं। लेकिन यह न्यायपालिका पर निर्भर करता है कि वह इस प्रावधान का इस्तेमाल किस हद तक और किस तरह करती है। यदि संसद ने कानून में संशोधन नहीं किया है, तब भी अदालत यह तय कर सकती है कि वह इसे शायद ही कभी उपयोग में लाए।
सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की पुस्तक के लेखकों के खिलाफ इस प्रावधान को लागू करने को प्रासंगिक माना, क्योंकि उन्होंने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चर्चा की थी। तीन न्यायाधीशों की पीठ मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची व न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली ने पुस्तक की सामग्री पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए उस पर प्रतिबंध लगा दिया, प्रतियां जब्त करने का आदेश दिया और अवमानना की कार्रवाई के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किए। यहीं से मूल प्रश्न खड़ा होता है: जब आलोचना न्यायपालिका की ओर निर्देशित हो, तो वह कैसे प्रतिक्रिया देती है?
छात्र की नजर से
यदि दृष्टिकोण बदला जाए और इसे एक आठवीं कक्षा के छात्र के नजरिए से देखा जाए, तो स्थिति और स्पष्ट होती है। महानगर का एक छात्र आज समाचारों से पूरी तरह अनभिज्ञ नहीं होता। वह मोबाइल पर सुर्खियां देखता है, घर की बातचीत सुनता है और सार्वजनिक विमर्श के अंश रोज ग्रहण करता है।
पाठ्यपुस्तक उसके सामने आने से पहले वह संभवतः न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा प्रकरण के बारे में जानता है। एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आवास से भारी मात्रा में अघोषित नकदी मिलने की खबर, जांच और जवाबदेही की लंबी प्रक्रिया। वह जिला अदालतों में लंबित 4.7 करोड़ मामलों के बारे में भी सुन चुका होता है। निचली अदालतों की कार्यवाही मैनेज करने की शिकायतें भी उसके कानों तक पहुंचती हैं।
ऐसे में पाठ्यपुस्तक जब कहती है कि भ्रष्टाचार, लंबित मामले और अपर्याप्त न्यायिक ढांचा भारतीय न्यायपालिका की चुनौतियां हैं, तो यह उसके लिए नई जानकारी नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श की औपचारिक पुष्टि होती है। जब सुप्रीम कोर्ट इसे सुनियोजित साजिश कहता है, तो छात्र के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है सच्चाई के ज्यादा करीब कौन है?
संस्थागत विश्वसनीयता पर असर
संस्था की विश्वसनीयता ऐसे क्षणों में बनती या बिगड़ती है। आलोचना का उत्तर दमन से देना, कई बार आलोचना को खारिज करने के बजाय उसे पुष्ट कर देता है। विवाद अब केवल एक पैराग्राफ का नहीं, बल्कि इस बात का हो जाता है कि जब न्यायपालिका की वैधता पर सवाल उठे तो उसकी प्रतिक्रिया क्या होती है।
‘बेसिक स्ट्रक्चर’ और चयनात्मक सक्रियता
26 फरवरी के आदेश में अदालत ने यह भी खेद जताया कि पाठ्यपुस्तक में लोकतांत्रिक ढांचे की रक्षा, संवैधानिक नैतिकता और ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ सिद्धांत में उसके योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। यहां 2015 का NJAC (नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन) मामला महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से NJAC कानून को निरस्त कर दिया था, यह कहते हुए कि यह न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है और संविधान की मूल संरचना के खिलाफ है। इस फैसले ने न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका और विधायिका की भूमिका लगभग समाप्त कर दी।
न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर के असहमति मत को याद करना जरूरी है। उन्होंने कहा था कि कॉलेजियम प्रणाली “भाई-भतीजावाद का पर्याय” बन चुकी है और NJAC इससे निपटने का उपाय हो सकता था। उनका मत 4:1 से खारिज कर दिया गया।
लोकतंत्र के अन्य आयाम
‘बेसिक स्ट्रक्चर’ सिद्धांत ने दशकों में धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव और न्यायिक पुनरावलोकन के अधिकार की रक्षा की है। लेकिन क्या इसे हर तत्व पर समान शक्ति से लागू किया गया? उदाहरण के लिए, चुनावी बॉन्ड योजना ने राजनीतिक दलों को गुमनाम कॉरपोरेट फंडिंग की अनुमति दी। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक ठहराया, लेकिन तब तक वर्षों तक अपारदर्शिता बनी रही। यहां वैसी तात्कालिकता नहीं दिखी, जैसी NJAC मामले में दिखी थी।
इसी तरह, एस.आर. बोम्मई मामले में संघवाद को मूल संरचना का हिस्सा माना गया था। कई राज्यों में राज्यपालों द्वारा विधायिका से पारित विधेयकों को लंबे समय तक लंबित रखना संवैधानिक बहस का विषय रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी तो की, लेकिन अनुपालन धीमा और जटिल रहा।
ऐसा प्रतीत होता है कि बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत का प्रयोग कभी-कभी अलग-अलग तीव्रता से किया जाता है। यह इस पर निर्भर करता है कि किस संस्था के हित दांव पर हैं। एनसीईआरटी विवाद केवल एक पाठ्यपुस्तक का मुद्दा नहीं है। यह इस बात की परीक्षा है कि आलोचना के सामने न्यायपालिका कितनी उदार, कितनी आत्मविश्वासी और कितनी पारदर्शी रहती है। लोकतंत्र में संस्थागत गरिमा केवल कानूनी प्रावधानों से नहीं, बल्कि आलोचना को सहने और उसका तार्किक उत्तर देने की क्षमता से भी बनती है।

