NCERT किताब विवाद: क्या सुप्रीम कोर्ट ने जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दी?
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NCERT किताब विवाद: क्या सुप्रीम कोर्ट ने जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दी?

NCERT की कक्षा 8 की नागरिक शास्त्र की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और मामलों में देरी का उल्लेख किया गया है। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति जताई और NCERT को कड़ी फटकार भी लगाई।


'AI with Sanket' कार्यक्रम में 'The Federal' ने NCERT के पूर्व निदेशक जे.एस. राजपूत और वरिष्ठ पत्रकार वी. वेंकटेशन के साथ उस विवाद पर चर्चा की, जो कक्षा 8 की नागरिक शास्त्र (Civics) की किताब में न्यायपालिका के भ्रष्टाचार और देरी के जिक्र से शुरू हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को वास्तविकता से रूबरू कराना जरूरी है।

बच्चों से वास्तविकता छुपाना सही है?

जे.एस. राजपूत ने NCERT का बचाव करते हुए कहा कि 13-14 साल के बच्चे आने वाले 10 वर्षों में जिम्मेदार पदों पर होंगे। उन्होंने सवाल किया, "उन्हें उस दुनिया से परिचित क्यों नहीं होना चाहिए जिसका वे सामना करने वाले हैं?" उन्होंने सुझाव दिया कि अगर कोर्ट को आपत्ति थी, तो उन्हें NCERT को पत्र लिखना चाहिए था, क्योंकि संस्थान हर साल फीडबैक के आधार पर बदलाव करता है।

सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया पर सवाल

राजपूत के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने "जल्दबाजी में और बहुत तीखी" प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि निचली अदालतों (तहसील स्तर) में भ्रष्टाचार एक कड़वी सच्चाई है जिसे आम जनता जानती है। उनके मुताबिक, किसी भी संस्था को आलोचना के प्रति इतना संवेदनशील (Thin-skinned) नहीं होना चाहिए।


"जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड" में गलत क्या है?

वरिष्ठ पत्रकार वी. वेंकटेशन ने भी कोर्ट की प्रतिक्रिया को 'जरूरत से ज्यादा' (Overreaction) बताया। उन्होंने कहा कि किताब में केवल यह कहा गया है कि, “ न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और मामलों की देरी समस्या है। ‘Justice delayed is justice denied’ में गलत क्या है?” उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश मानना उचित है? उन्होंने पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के उस बयान का भी हवाला दिया जिसमें उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के बारे में सख्त टिप्पणी की थी।मार्कंडेय काटजू ने 2010 में कहा था कि “इलाहाबाद हाई कोर्ट में कुछ गड़बड़ है।” 1995 के C. रविचंद्रन अय्यर केस में जजों के खिलाफ शिकायतों की आंतरिक प्रक्रिया तय की गई। 2010 में शांति भूषण अवमानना मामला भी चर्चा में रहा।

पारदर्शिता का अभाव

चर्चा में यह तथ्य भी सामने आया कि पिछले एक दशक में जजों के खिलाफ 8,600 से अधिक शिकायतें मिली हैं, लेकिन उनके नतीजे क्या रहे, यह किसी को नहीं पता। वेंकटेशन ने कहा कि न्यायपालिका के भीतर की जांच प्रक्रिया (In-house mechanism) पारदर्शी नहीं है, जिससे संस्था की साख पर असर पड़ता है।

आलोचना या जागरूकता?

दोनों विशेषज्ञों का मानना था कि पाठ्यपुस्तकों में भ्रष्टाचार का जिक्र करना संस्था को बदनाम करना नहीं है, बल्कि भविष्य के नागरिकों में 'क्रिटिकल थिंकिंग' (तार्किक सोच) विकसित करना है। संस्थाओं को अपनी कमियों को स्वीकार कर सुधार की दिशा में बढ़ना चाहिए।

(ऊपर दी गई जानकारी को एक एआई (AI) मॉडल की मदद से वीडियो से टेक्स्ट में बदला गया है। इसकी सटीकता, गुणवत्ता और संपादन की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए हम 'ह्यूमन-इन-द-लूप' (HITL) प्रक्रिया का पालन करते हैं। हालांकि शुरुआती ड्राफ्ट एआई द्वारा तैयार किया जाता है, लेकिन हमारी अनुभवी संपादकीय टीम प्रकाशन से पहले इसकी बारीकी से समीक्षा और सुधार करती है। 'द फेडरल' में हम भरोसेमंद और सटीक पत्रकारिता के लिए एआई की गति और मानवीय विशेषज्ञता का तालमेल बिठाते हैं।)

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