
सांसदों की छुट्टी कैंसिल! अब वीकेंड पर भी खुलेगी संसद, सरकार ने रखा प्रस्ताव
सिर्फ त्योहार ही नहीं, बल्कि लोकसभा में हुए भारी हंगामे ने भी सरकार की चिंता बढ़ा दी है। सत्र के दौरान विपक्षी दलों के विरोध-प्रदर्शनों और नारेबाजी के कारण सदन की कई घंटों की कार्यवाही बाधित हुई।
राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि जनसेवा के लिए कोई छुट्टी नहीं होती, और इस बार भारत के माननीय सांसद इसे सच साबित करने वाले हैं। साल 2026 का बजट सत्र अपने आप में कई मायनों में खास रहा है। इसकी शुरुआत 1 फरवरी (रविवार) को बजट पेश करने के साथ हुई थी, और अब इसके समापन के दौरान भी सांसदों को अपना वीकेंड संसद की कार्यवाही में बिताना पड़ सकता है।
क्यों पड़ी वीकेंड पर काम करने की जरूरत?
बजट सत्र का दूसरा हिस्सा 9 मार्च से शुरू हुआ है जो 2 अप्रैल तक चलना है। इस बीच देश में गुड़ी पड़वा, उगादी, ईद और रामनवमी जैसे बड़े त्योहार पड़ रहे हैं। इन त्योहारों के कारण संसद में कई दिनों का अवकाश रहेगा। सरकार चाहती है कि विधायी कार्यों और बजट चर्चा में कोई कमी न आए, इसलिए एक विशेष प्रस्ताव रखा गया है।
प्रस्ताव के मुताबिक, छुट्टियों के कारण बर्बाद हुए समय की भरपाई 28 और 29 मार्च (शनिवार और रविवार) को संसद चलाकर की जाएगी। सरकार का तर्क है कि बजट सत्र का अधिकतम लाभ उठाने और पेंडिंग बिलों को पास कराने के लिए यह कदम उठाना जरूरी है।
विरोध और अविश्वास प्रस्ताव ने बिगाड़ा समय का गणित
सिर्फ त्योहार ही नहीं, बल्कि लोकसभा में हुए भारी हंगामे ने भी सरकार की चिंता बढ़ा दी है। सत्र के दौरान विपक्षी दलों के विरोध-प्रदर्शनों और नारेबाजी के कारण सदन की कई घंटों की कार्यवाही बाधित हुई। इसके अलावा, स्पीकर के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव ने भी कीमती समय ले लिया। जानकारों का कहना है कि संसदीय कार्यों के लिए जो समय निर्धारित था, उसका एक बड़ा हिस्सा इन बाधाओं की भेंट चढ़ गया, जिसकी भरपाई अब 'वर्किंग वीकेंड' के जरिए की जाएगी।
क्या कहता है इतिहास?
आमतौर पर संसद सोमवार से शुक्रवार तक ही चलती है, लेकिन शनिवार-रविवार को सदन बैठना कोई नई बात नहीं है।
1 फरवरी 2026: इस साल का बजट रविवार को पेश कर एक मिसाल कायम की गई।
1 फरवरी 2020: उस दिन शनिवार था, फिर भी तत्कालीन वित्त मंत्री ने बजट पेश किया था।
29 फरवरी 1992: अंग्रेजों के जमाने की परंपरा के अनुसार शनिवार को बजट पेश हुआ था।
सरकार इस कदम के जरिए यह संदेश देना चाहती है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और आर्थिक चर्चाओं के लिए समय की कमी को आड़े नहीं आने दिया जाएगा। हालांकि, अब यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्षी दल इस 'एक्स्ट्रा वर्किंग डे' के प्रस्ताव पर कितनी सहमति जताते हैं।

