क्या CEC को हटाया जा सकता है? इंडिया गठबंधन के कदम की पूरी कहानी
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क्या CEC को हटाया जा सकता है? इंडिया गठबंधन के कदम की पूरी कहानी

इंडिया गठबंधन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव ला सकता है। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन विवाद के बाद संसद में नया संवैधानिक टकराव बनता दिख रहा है।


संसद के बजट सत्र में पहले ही एक बड़ा संवैधानिक टकराव देखने को मिल चुका है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव। अब एक और, उससे भी बड़ा टकराव सामने आने वाला है। विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक ने घोषणा की है कि वह मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाएगा। तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों ने पुष्टि की है कि हटाने का नोटिस जल्द ही दाखिल किया जाएगा।

अगर यह प्रस्ताव दाखिल होता है तो यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार होगा जब किसी मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाया जाएगा। इसका तत्काल कारण 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया है।

विवाद की पृष्ठभूमि

ममता बनर्जी सरकार ने इस प्रक्रिया का जोरदार विरोध किया है। राज्य सरकार ने मताधिकार छिनने (disenfranchisement) के आरोप लगाए हैं और इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले गई है। हालांकि यह प्रस्ताव केवल SIR विवाद से पैदा नहीं हुआ है। यह INDIA ब्लॉक और चुनाव आयोग के बीच लगातार बिगड़ते रिश्तों का नतीजा है, जिसकी शुरुआत 2025 के बिहार चुनावों के दौरान हुए विवाद और राहुल गांधी द्वारा लगाए गए बड़े पैमाने पर मतदाता धोखाधड़ी के आरोपों से हुई थी।

ज्ञानेश कुमार ने इन आरोपों का प्रेस कॉन्फ्रेंस में सार्वजनिक रूप से खंडन किया था। उन्होंने राहुल गांधी से सात दिनों के भीतर या तो हलफनामा देने या सार्वजनिक माफी मांगने की मांग की थी। एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा विपक्ष के नेता को दिया गया यह अल्टीमेटम विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया और उसने उपलब्ध हर संसदीय उपाय का इस्तेमाल करने का फैसला किया।

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 324(5) में दिया गया है। इसके अनुसार CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है। संविधान सभा को इस बात का एहसास था कि चुनाव आयोग को कार्यपालिका के दबाव से मुक्त रखना जरूरी है। इसलिए उसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए न्यायाधीशों की तरह ही हटाने की प्रक्रिया रखी गई।

CEC को केवल दो आधारों पर हटाया जा सकता है—

सिद्ध कदाचार (Proved Misbehaviour)

अक्षमता (Incapacity)

इस प्रक्रिया को जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत दोनों सदनों से होकर गुजरना पड़ता है। प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा के कम से कम 100 सांसद या राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो तीन सदस्यीय जांच समिति मामले की जांच करती है।

CEC को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत चाहिए। कुल सदस्यों का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन।

संख्या का गणित

विपक्ष के लिए यह संख्या हासिल करना लगभग असंभव है। NDA गठबंधन के पास दोनों सदनों में स्पष्ट बहुमत है।इस प्रस्ताव के पीछे मुख्य भूमिका निभाने वाली तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा में 29 और राज्यसभा में 12 सदस्य हैं। पूरा INDIA ब्लॉक मिलकर भले ही प्रस्ताव दाखिल करने के लिए 100 हस्ताक्षर जुटा ले, लेकिन उसे पारित कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत से वह बहुत दूर है।

फरवरी में दिल्ली दौरे के दौरान ममता बनर्जी ने खुद यह स्वीकार किया था। उन्होंने कहा था, “हम प्रस्ताव लाएंगे, कम से कम यह संसद के रिकॉर्ड में रहेगा। यही बात समझने की कुंजी है कि विपक्ष वास्तव में क्या करना चाहता है। यह प्रस्ताव सफल होने के लिए नहीं, बल्कि जांच शुरू करवाने के लिए लाया जा रहा है। अगर प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है और जांच समिति बनती है, तो भले ही अंतिम मतदान में प्रस्ताव गिर जाए, लेकिन CEC के आचरण की औपचारिक संसदीय जांच हो जाएगी।

हालांकि प्रस्ताव दाखिल करते समय विपक्ष को आरोपों के लिए ठोस आधार दिखाना होगा। अगर आरोप पर्याप्त नहीं पाए गए, तो प्रस्ताव शुरुआती चरण में ही खारिज किया जा सकता है।

संवैधानिक सवाल

इसी बिंदु पर एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा होता है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995) मामले में कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त को अन्य चुनाव आयुक्तों की तुलना में हटाने से अधिक सुरक्षा इसलिए दी गई है ताकि इस पद को राजनीतिक दबाव से बचाया जा सके।

यह सुरक्षा केवल सरकार से नहीं, बल्कि विपक्षी दलों से भी बचाव के लिए है। यानी हटाने की प्रक्रिया को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने से भी यह पद सुरक्षित रहना चाहिए। अगर ऐसा प्रस्ताव पहले से ही इस जानकारी के साथ लाया जाता है कि वह पारित नहीं होगा और सिर्फ रिकॉर्ड के लिए है, तो यह सवाल उठ सकता है कि क्या यह वास्तव में जांच प्रक्रिया का ईमानदार इस्तेमाल है।

दूसरी ओर, विपक्ष का तर्क भी मजबूत है। लोकतांत्रिक जवाबदेही केवल तब नहीं तय की जा सकती जब हटाने के लिए जरूरी संख्या मौजूद हो। अगर पक्षपात के विश्वसनीय सबूत हैं, तो संसद में चर्चा और जांच जरूरी है। लेकिन INDIA ब्लॉक की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह प्रस्ताव दाखिल करते समय स्पीकर के सामने कितने मजबूत सबूत पेश करता है। केवल प्रतीकात्मक राजनीति पर्याप्त नहीं होगी।

नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल

यहां एक और दिलचस्प विरोधाभास है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 ने उस चयन समिति को बदल दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) मामले में निर्धारित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) भी शामिल होंगे। लेकिन 2023 के कानून में CJI को समिति से बाहर कर दिया गया।

अब समिति में केवल तीन सदस्य हैं—

प्रधानमंत्री

लोकसभा में विपक्ष के नेता

प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री

इस व्यवस्था में सत्तारूढ़ दल के पास हमेशा दो वोट होते हैं, जबकि विपक्ष के पास केवल एक। ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति फरवरी 2025 में इसी व्यवस्था के तहत हुई थी। इसलिए यह तर्क दिया जा रहा है कि नियुक्ति प्रक्रिया ही ऐसी है जिसमें वास्तविक स्वतंत्रता सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है।

हालांकि विपक्ष के सामने एक असहज तथ्य भी है राहुल गांधी उस चयन समिति का हिस्सा थे जिसने ज्ञानेश कुमार को चुना था और उन्होंने नियुक्ति का विरोध नहीं किया था।

एक पुराना उदाहरण

2009 में भी एक विवाद सामने आया था। उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की थी। उन पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया गया था। लेकिन राष्ट्रपति ने उस सिफारिश को बाध्यकारी नहीं माना और उसे खारिज कर दिया। उस समय इस मामले में संसद में कोई प्रस्ताव नहीं लाया गया था। आज की स्थिति अलग है—यह अधिक सार्वजनिक, अधिक राजनीतिक और अधिक संवैधानिक रूप से संवेदनशील हो गई है।

संवैधानिक टकराव या राजनीतिक शोर

INDIA ब्लॉक के सामने खतरा यह है कि वह एक असाधारण संवैधानिक उपाय को सामान्य राजनीतिक हथियार बना दे। इससे भविष्य में इस प्रक्रिया की गंभीरता कम हो सकती है।फिर भी, अगर यह प्रस्ताव लाया जाता है तो यह स्वतंत्र भारत के साढ़े सात दशकों के संवैधानिक इतिहास में पहली बार होगा जब किसी मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद में औपचारिक चुनौती दी जाएगी।यह घटना इस बात का संकेत होगी कि चुनाव प्रशासन और राजनीतिक विपक्ष के बीच रिश्ते कितने तनावपूर्ण हो चुके हैं।

आखिरकार यह इस बात पर निर्भर करेगा कि विपक्ष अपने आरोपों को कितनी मजबूती से साबित कर पाता है। क्या यह एक वास्तविक संवैधानिक जवाबदेही की शुरुआत होगी या सिर्फ राजनीतिक शोर में एक और आवाज बनकर रह जाएगी।

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