
बजट 2026-27 पर चुनावी असर: क्या मोदी की रणनीति तय करेगी दिशा?
सवाल यह है कि बजट 2026-27 भी क्या 2024 के बाद वाले इस सीधे चुनावी राज्यों और संवेदनशील मुद्दों को साधने वाले मॉडल पर चलेगा या फिर सरकार पुराने पैटर्न पर लौटेगी।
मार्च–अप्रैल में पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल में होने वाले अहम विधानसभा चुनावों से ठीक पहले पेश होने वाला बजट 2026-27 कितना चुनावी रंग लिए होगा, इस पर सियासी हलकों में चर्चा तेज है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को यह बजट पेश करेंगी। पिछले एक दशक में नरेंद्र मोदी सरकार के केंद्रीय बजट आमतौर पर एक तय पैटर्न पर चलते रहे हैं। बजट में देशव्यापी योजनाओं और कार्यक्रमों के भीतर चुनावी राज्यों के लिए विशेष प्रावधानों को चतुराई से शामिल किया जाता रहा, ताकि सरकार यह दावा कर सके कि वह बजट का इस्तेमाल सीधे चुनावी हथियार के रूप में नहीं कर रही है। इस रणनीति के जरिए मोदी सरकार पिछले करीब 11 वर्षों तक यह कहने में सफल रही कि वह पूर्ववर्ती सरकारों की तरह बजट का राजनीतिक दुरुपयोग नहीं करती।
असमान आवंटन की शुरुआत
हालांकि, पिछले दो बजट इस परंपरा से अलग रहे। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को अपने दम पर बहुमत गंवाना पड़ा, जिसके बाद जुलाई 2024 और फरवरी 2025 में पेश किए गए बजटों का स्वरूप भी बदलता नजर आया। नीतीश कुमार की जद (यू) और एन. चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के समर्थन पर टिकी नई मोदी सरकार के लिए बिहार और आंध्र प्रदेश बेहद अहम हो गए। नतीजतन, इन दोनों राज्यों को बजट में अपेक्षाकृत कहीं अधिक आवंटन मिला। खासतौर पर बिहार को, जहां अक्टूबर 2025 में चुनाव होने थे। इसी तरह 2024 के चुनावों में भाजपा को मिली चुनौतियों के पीछे बेरोजगारी को एक बड़ा मुद्दा माना गया। इसके जवाब में वित्त मंत्री ने रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएं (ईएलआई) और निजी क्षेत्र में इंटर्नशिप योजनाओं की घोषणा की, ताकि रोजगार सृजन को बढ़ावा दिया जा सके।
क्या बदलेगा बजट का रुख?
अब सवाल यह है कि बजट 2026-27 भी क्या 2024 के बाद वाले इस सीधे चुनावी राज्यों और संवेदनशील मुद्दों को साधने वाले मॉडल पर चलेगा या फिर सरकार पुराने पैटर्न पर लौटेगी। इसका जवाब तो बजट पेश होने के बाद ही मिलेगा, लेकिन संकेत हैं कि इस बार भी बजट में लोकप्रियता (पॉपुलिज़्म) की झलक दिख सकती है, भले ही उसे ‘विकसित भारत’ के बड़े विजन में लपेटकर पेश किया जाए।
मनरेगा को हटाने का सियासी असर
यह बजट ऐसे समय आ रहा है, जब संसद ने यूपीए सरकार के दौर की महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को समाप्त कर उसकी जगह विकसित भारत रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून लागू किया है। कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन के कई दलों का कहना है कि यह देखना दिलचस्प होगा कि वित्त मंत्री बजट के ज़रिए इस फैसले से होने वाले राजनीतिक नुकसान की भरपाई कैसे करती हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, सीपीआई(एम) और सीपीआई सहित विपक्षी दलों ने मनरेगा को हटाने का कड़ा विरोध किया है। उनका आरोप है कि नए कानून का मकसद पिछले दो दशकों में बने ग्रामीण रोजगार गारंटी ढांचे को कमजोर करना है।
विपक्ष का यह भी कहना है कि नए कानून में राज्यों पर 40 प्रतिशत खर्च का बोझ डाल दिया गया है, जबकि मनरेगा पूरी तरह केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित था। ऐसे समय में जब राज्य पहले से ही संसाधनों की कमी और बढ़ते कर्ज से जूझ रहे हैं, यह व्यवस्था बेरोज़गारी की जिम्मेदारी राज्यों पर डालने का प्रयास है।
‘मनरेगा बचाओ’ आंदोलन और विपक्ष की रणनीति
कांग्रेस इस समय देशभर में ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ चला रही है। 45 दिनों के इस आंदोलन के जरिए पार्टी ग्रामीण इलाकों में भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने की कोशिश कर रही है। एक वरिष्ठ कांग्रेस राज्यसभा सांसद ने कहा कि मोदी सरकार पिछले दस सालों से मनरेगा को खत्म करने की कोशिश कर रही थी—कभी बजट घटाकर, कभी राज्यों के बकाया रोककर। अब कानून ही खत्म कर दिया गया। नया कानून ऐसा है, जिसमें अधिकार केंद्र के पास हैं और जवाबदेही राज्यों पर डाल दी गई है। उन्होंने कहा कि बजट में यह देखना अहम होगा कि नए ग्रामीण रोजगार कानून के लिए कितना आवंटन होता है और क्या सरकार रोजगार सृजन के लिए कोई नई योजना लाती है।
बंगाल को लेकर तृणमूल का सख्त रुख
तृणमूल कांग्रेस का मानना है कि मनरेगा को खत्म करने का फैसला पश्चिम बंगाल में भाजपा को भारी नुकसान पहुंचा सकता है, जहां दो महीने के भीतर चुनाव होने हैं। तृणमूल के एक नेता ने चेतावनी दी कि अगर केंद्रीय बजट में बंगाल के हिस्से के केंद्रीय फंड में कटौती की गई तो इसका “जवाब संसद से लेकर सड़कों तक” दिया जाएगा।
असम, तमिलनाडु और केरल पर भी नजर
विपक्ष की नजर इस बात पर भी रहेगी कि बजट में चुनावी राज्यों असम, तमिलनाडु और केरल को कितना महत्व मिलता है। असम में भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही है, जबकि तमिलनाडु और केरल में वह पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को तोड़ने का सपना देख रही है। प्रधानमंत्री द्वारा हाल ही में बंगाल से वंदे भारत स्लीपर ट्रेन की शुरुआत के बाद अटकलें तेज़ हैं कि बजट में बंगाल और असम के लिए रेलवे और हाईवे परियोजनाओं पर बड़ा खर्च दिख सकता है। वहीं तमिलनाडु और केरल के विपक्षी नेताओं का कहना है कि बजट में शिपिंग, मत्स्य पालन और सड़क अवसंरचना जैसे क्षेत्रों के लिए बड़े वादे किए जा सकते हैं, जिनका सीधा असर इन राज्यों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

