SIR पर प्रशांत भूषण का तीखा हमला, बोले- प्रक्रिया अवैध और पक्षपातपूर्ण
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SIR पर प्रशांत भूषण का तीखा हमला, बोले- प्रक्रिया अवैध और पक्षपातपूर्ण

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण का कहना है कि SIR प्रक्रिया अवैध और पक्षपातपूर्ण है। वोटर लिस्ट बनाने की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और यह मुसलमानों को निशाना बनाती है।


सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं। उनका कहना है कि यह पूरी कवायद न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि इसे विशेष रूप से मुसलमानों को निशाना बनाने और उन्हें मतदाता सूची से हटाने के लिए डिजाइन किया गया है। पश्चिम बंगाल में लगभग 91 लाख नामों की कटौती के बाद इस प्रक्रिया की पारदर्शिता, वैधता और निष्पक्षता पर सवाल और तेज हो गए हैं।

“कानून के खिलाफ है पूरी प्रक्रिया”

प्रशांत भूषण के अनुसार, बिना पुरानी मतदाता सूची को आधार बनाए नई सूची तैयार करना कानून में कहीं भी मान्य नहीं है। उनका कहना है कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) केवल किसी क्षेत्र विशेष में सीमित और कारण दर्ज कर की गई गहन पुनरीक्षण की अनुमति देता है, लेकिन पूरे राज्य या देश की मतदाता सूची को पूरी तरह से नई (de novo) बनाना इसके दायरे में नहीं आता।

उन्होंने कहा कि 2003 में हुई गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया बूथ लेवल अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर की गई थी, जिसमें पुराने रिकॉर्ड के आधार पर सत्यापन हुआ था। उस समय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी थी, लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं किया जा रहा है और बिना उचित सुनवाई के निर्णय लिए जा रहे हैं।

नागरिकता के आधार पर नाम हटाने पर आपत्ति

भूषण ने कहा कि वर्तमान प्रक्रिया में नागरिकता के मुद्दे पर भी गंभीर खामियां हैं। मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए फॉर्म-6 में केवल निवास और आयु का प्रमाण मांगा जाता है, जबकि नागरिकता के लिए सिर्फ स्व-घोषणा (self-declaration) पर्याप्त मानी जाती है, किसी दस्तावेज की अनिवार्यता नहीं है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 1995 के लाल बाबू हुसैन मामले का हवाला देते हुए कहा कि मौजूदा मतदाता सूची में नाम होना ही नागरिकता का प्रारंभिक प्रमाण माना जाता है। यदि किसी की नागरिकता पर संदेह हो, तो चुनाव आयोग को कारण बताकर नोटिस जारी करना चाहिए और व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देना चाहिए।

भूषण के अनुसार, देश में बड़ी संख्या में लोगों के पास नागरिकता साबित करने के औपचारिक दस्तावेज नहीं हैं। ऐसे में केवल 11–12 प्रकार के दस्तावेज मांगना व्यावहारिक रूप से करोड़ों लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने जैसा है।

पारदर्शिता पर गंभीर सवाल

उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की अपनी मैनुअल के अनुसार हर आवेदन को वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। इसके अलावा डुप्लिकेशन हटाने के लिए आवश्यक सॉफ्टवेयर का उपयोग भी नहीं किया जा रहा है।उनका कहना है कि बूथ या वार्ड स्तर पर सत्यापन सभाएं भी आयोजित नहीं की जा रही हैं और मतदाता सूची मशीन-रीडेबल फॉर्म में भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही, जिससे स्वतंत्र जांच संभव नहीं है। पूरी प्रक्रिया को उन्होंने “अस्पष्ट, जल्दबाज़ी में और मनमानी” बताया।

‘ कानूनी विसंगतियों पर विवाद'

भूषण ने चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” (logical discrepancies) श्रेणी पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, पश्चिम बंगाल में करीब 60 लाख नाम केवल इसलिए हटाए गए क्योंकि उन्होंने फॉर्म पर हस्ताक्षर नहीं किए थे, जबकि 27 लाख नाम कथित विसंगतियों के आधार पर हटाए गए।

इन विसंगतियों में एक ही घर में कई लोगों का दर्ज होना, नामों में मामूली अंतर, या माता-पिता और बच्चों की उम्र में छोटे अंतर जैसे कारण शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरी सूची एक एल्गोरिदम के जरिए तैयार की गई है, जिसमें मुस्लिम समुदाय को अनुपातहीन रूप से अधिक प्रभावित किया गया है।

अपील और सुनवाई व्यवस्था पर सवाल

भूषण ने कहा कि हटाए गए नामों के लिए प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली लगभग मौजूद नहीं है। कई मामलों में लाखों मामलों की सुनवाई बहुत तेज गति से की जा रही है, जिससे वास्तविक न्याय संभव नहीं है।उन्होंने कहा कि इतने कम समय में लाखों मामलों का निपटारा केवल औपचारिकता बनकर रह गया है और वास्तविक सुनवाई नहीं हो रही है।

न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता

प्रशांत भूषण ने स्पष्ट कहा कि इस प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक था। उनके अनुसार, चुनाव आयोग की मैनुअल में साफ लिखा है कि गहन पुनरीक्षण को पूरा करने में कम से कम छह महीने लगते हैं, जबकि इसे तीन से चार महीनों में पूरा किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट समय रहते हस्तक्षेप कर प्रक्रिया को रोकता और उचित समय व सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करता, तो यह स्थिति नहीं बनती। अब स्थिति यह है कि अवैध प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है, जिससे लोकतांत्रिक अधिकारों को नुकसान हो सकता है।

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