भारतीय रेलवे का संकट: बिना बजट कैसे होगा आधुनिकरण?
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भारतीय रेलवे का संकट: बिना बजट कैसे होगा आधुनिकरण?

रेलवे बजट का खत्म होना आज भारतीय रेलवे की राष्ट्रीय प्राथमिकता में कमी का प्रतीक बन गया है। 100 साल पुराने इस स्वतंत्र बजट के बंद होने के बाद, रेलवे के निवेश, क्षमता विस्तार और सुरक्षा सुधारों पर नकारात्मक असर पड़ा है।


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100 साल पहले ब्रिटिश राज में भारतीय रेलवे के लिए अलग बजट की शुरुआत हुई थी। इसका मकसद केवल आर्थिक नहीं था, बल्कि सेना की आवाजाही और रणनीतिक नियंत्रण भी था। स्वतंत्रता के बाद यह प्रथा दो उद्देश्यों से जारी रही – राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर पर विशेष ध्यान और रेल के आधुनिकीकरण के लिए अलग निवेश योजना। लेकिन 2017 में नरेंद्र मोदी सरकार ने रेलवे बजट को खत्म कर दिया। तब से रेलवे को संसदीय और वित्तीय निगरानी से अलग रखा गया है और इसके प्रभाव अब साफ दिखने लगे हैं।

रेलवे बजट खत्म होने के बाद स्थिति

अब भारतीय रेलवे को सभी मंत्रालयों के साथ फंड के लिए प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। दीर्घकालिक निवेश योजनाओं का कोई निश्चित प्रावधान नहीं है। संसद और जनता के सामने वित्तीय निगरानी कमजोर हुई है। क्षमता विस्तार के कार्य अक्सर अल्पकालिक वित्तीय दबावों के कारण रुक जाते हैं। कर्ज पर बढ़ती निर्भरता वास्तविक निवेश को छिपाती है। हाल के वर्षों में कई रेल हादसों के बावजूद वित्तीय सुधार नहीं हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रेलवे बजट जारी होता तो इसके भौतिक और वित्तीय प्रदर्शन पर विस्तृत विवरण जनता और संसद के सामने होता, जिससे इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में गंभीरता से लिया जाता।

रेलवे पर निवेश की चुनौतियां

रेलवे मंत्रालय अब फंड आवंटन की पूर्ण अस्थिरता के तहत काम करता है। इससे रेलवे की लंबी अवधि की योजनाओं पर असर पड़ा है। दुनिया के विकसित देशों जैसे जापान, जर्मनी और फ्रांस में रेलवे बजट नहीं है, लेकिन वहां समर्पित वित्त और निगरानी प्रणाली मौजूद है। भारत में 2017 के बाद न तो कोई समर्पित बजट है और न ही कोई प्रभावी निगरानी। संसद में Pink Book जैसी रिपोर्ट्स बजट सत्र के बाद ही प्रस्तुत की जाती हैं। रेलवे भारत की सबसे बड़ी सार्वजनिक इकाई और सेना के बाद सबसे बड़ा नियोक्ता है।

रेलवे की क्षमता और निवेश का संकट

2014-15 के आर्थिक सर्वेक्षण ने रेलवे की गंभीर क्षमता सीमा को रेखांकित किया था। रेल यातायात की हिस्सेदारी लगातार घट रही है, जबकि सड़क और अन्य परिवहन माध्यम बढ़ रहे हैं। सर्वेक्षण ने कहा कि रेलवे में निवेश का मल्टीप्लायर प्रभाव 5.74 गुना तक उत्पादन बढ़ा सकता है। उद्योग को अकेले 3.22 गुना लाभ हो सकता है। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले दो बजट भाषणों में रेलवे का उल्लेख नहीं किया, जिससे यह प्रतीत होता है कि इस सेक्टर को नजरअंदाज किया जा रहा है।

पूंजीगत व्यय और कर्ज का जाल

रेलवे का आधा नेटवर्क High Density Network (HDN) और Highly Utilised Network पर है, जो कुल यातायात का 80% संभालते हैं। 80% HDN नेटवर्क अपनी क्षमता से अधिक लोड उठा रहा है। बजट आवंटन भले ही बढ़े (2025-26 में ₹2.75 लाख करोड़), लेकिन IRFC बॉन्ड और कर्ज के कारण वास्तविक निवेश सीमित है। PPP मॉडल का योगदान नगण्य रहा।

माल ढुलाई और सॉफ़्टवेयर समस्याएं

Dedicated Freight Corridors (DFC) बनने में 20 साल लगे और कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। पश्चिमी DFC में उत्पादन-आयात माल के लिए बेहतर व्यवस्था है, लेकिन अंतिम मील कनेक्टिविटी अधूरी है। रेलवे का मोडल शेयर केवल 25% है, जो 2030 में 40% लक्ष्य से काफी कम है।

ट्रेन संचालन और मानव संसाधन चुनौतियां

Vande Bharat ट्रेनों की संख्या अचानक बढ़ी, जिससे अन्य यात्री और माल गाड़ियां प्रभावित हुईं। ट्रैक की भीड़ और धीमी ट्रेनों के कारण सेवा गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। रेलवे हादसों की जांच में कर्मचारी प्रशिक्षण और कार्य परिस्थितियों की कमी सामने आई।

बढ़ती लागत और मैन्युफैक्चरिंग दबाव

ट्रैक नवीनीकरण की लागत 2022-23 में ₹4.66 करोड़ प्रति किमी से बढ़कर 2025-26 में ₹6.45 करोड़ प्रति किमी हो गई। नई लाइन निर्माण की लागत ₹13 करोड़ से बढ़कर ₹46 करोड़ प्रति किमी हुई। रेलवे के लिए आवंटित कुल बजट अब संघीय बजट का केवल 5.29% है, जो रेलवे बजट समाप्त होने के पहले से भी कम है।

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