PSLV-C62 असफल, सवालों का आकाश, ISRO कैसे संभाले भरोसे की परीक्षा?
x

PSLV-C62 असफल, सवालों का आकाश, ISRO कैसे संभाले भरोसे की परीक्षा?

PSLV-C62 मिशन की विफलता से 15 भारतीय-विदेशी उपग्रह नष्ट हुए। KID कैप्सूल की आंशिक सफलता के बीच ISRO और निजी स्पेस सेक्टर को बड़ा झटका लगा।


भारत का वर्ष 2026 का पहला अंतरिक्ष प्रक्षेपण, PSLV-C62 मिशन, 12 जनवरी को असफल हो गया। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की सबसे भरोसेमंद रीढ़ माने जाने वाले पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) को उड़ान के तीसरे चरण में तकनीकी खामी का सामना करना पड़ा। इस विफलता के कारण भारत और विदेशों के कुल 15 उपग्रह नष्ट हो गए, जिनमें रक्षा से जुड़ा एक अहम पृथ्वी अवलोकन उपग्रह भी शामिल था। यह मई 2025 में हुई नाकामी के बाद PSLV की लगातार दूसरी विफलता है।

हालांकि इस निराशाजनक मिशन के बीच एक अप्रत्याशित सफलता भी सामने आई। स्पेन की एक री-एंट्री कैप्सूल KID (Kestrel Initial Demonstrator) लॉन्च व्हीकल से अलग होने में सफल रही और उसने डेटा ट्रांसमिट भी किया। इसके निर्माताओं ने इसे “तमाम मुश्किलों के बावजूद मिली सफलता” बताया। यह उपलब्धि एक अन्यथा असफल मिशन में एक असामान्य लेकिन महत्वपूर्ण फुटनोट के रूप में दर्ज हुई।

PSLV-C62 की विफलता सिर्फ इसलिए अहम नहीं है कि एक प्रक्षेपण असफल हुआ। अंतरिक्ष अभियानों में ऐसी घटनाएं असामान्य नहीं होतीं बल्कि इसलिए भी कि इस मिशन में क्या-क्या ले जाया जा रहा था, किन-किन हितधारकों पर इसका असर पड़ा और यह भारत की व्यावसायिक लॉन्च प्रदाता बनने की महत्वाकांक्षा के लिए क्या मायने रखता है।

मिशन में क्या था खास

PSLV-C62 ने श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 10:18 बजे उड़ान भरी थी। यह कुल 16 पेलोड लेकर गया था 15 उपग्रह और एक री-एंट्री कैप्सूल। इसका मुख्य पेलोड था EOS-N1 (अन्वेषा), जो रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के लिए विकसित एक हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट था। इसका उद्देश्य रणनीतिक निगरानी, भू-भाग विश्लेषण और सैन्य गतिविधियों पर नजर रखना था। इस उपग्रह का नुकसान भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और टोही क्षमताओं के लिए एक बड़ा झटका है।

इसके अलावा, मिशन में भारत के उभरते निजी अंतरिक्ष क्षेत्र और विदेशी ग्राहकों के कई उपग्रह शामिल थे। बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप OrbitAID का AyulSat भी इसमें था, जिसका उद्देश्य कक्षा में उपग्रहों की ईंधन भराई (इन-ऑर्बिट रीफ्यूलिंग) तकनीक का प्रदर्शन करना था। एक ऐसी क्षमता जो उपग्रहों की आयु को काफी बढ़ा सकती है।

इसके साथ ही Dhruva Space, Eon Space Labs और TakeMe2Space जैसे भारतीय स्टार्टअप्स के छह अन्य उपग्रह भी थे। इनमें से कई छोटे क्यूबसैट थे, जिनका इस्तेमाल अगली पीढ़ी की पृथ्वी अवलोकन और कक्षा में डेटा प्रोसेसिंग तकनीकों के परीक्षण के लिए किया जाना था। नेपाल, ब्राजील, थाईलैंड, ब्रिटेन और स्पेन के भी अकादमिक और व्यावसायिक छोटे उपग्रह इस मिशन का हिस्सा थे।

KID कैप्सूल: असफलता के बीच एक सफलता

इस मिशन की एकमात्र सकारात्मक खबर स्पेन की स्टार्टअप Orbital Paradigm द्वारा विकसित KID कैप्सूल से आई। कंपनी ने पुष्टि की कि कैप्सूल सफलतापूर्वक लॉन्च व्हीकल से अलग हुई, सक्रिय हुई और टेलीमेट्री डेटा भेजने में सफल रही। इसने वायुमंडलीय री-एंट्री तकनीक के परीक्षण का अपना मुख्य उद्देश्य हासिल कर लिया, भले ही पूरा मिशन विफल रहा।

ISRO ने क्या कहा

ISRO ने पुष्टि की है कि PSLV के पहले दो चरण सामान्य रूप से चले। गड़बड़ी तीसरे चरण (PS3) में आई, जब रॉकेट को उसकी निर्धारित कक्षा की ओर ले जाया जा रहा था। ISRO प्रमुख वी. नारायणन के अनुसार, इस चरण में उड़ान पथ में विचलन और अस्थिरता देखी गई, जिससे वाहन आवश्यक वेग और संतुलन हासिल नहीं कर सका।

PSLV का तीसरा चरण एक ठोस ईंधन वाला रॉकेट मोटर होता है, जो चौथे चरण से पहले अंतिम बड़ा वेग प्रदान करता है। इस चरण में गड़बड़ी होने पर सुधार की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।

ISRO ने टेलीमेट्री और उड़ान डेटा का विस्तृत विश्लेषण शुरू कर दिया है। फिलहाल किसी बाहरी हस्तक्षेप के संकेत नहीं मिले हैं और यह विफलता प्रणोदन, मार्गदर्शन या नियंत्रण प्रणाली से जुड़ी तकनीकी समस्या जैसी प्रतीत होती है।

अंतरिक्ष मलबे की चिंता

हर लॉन्च विफलता के बाद एक अहम सवाल यह होता है कि नष्ट हुआ हार्डवेयर अंतरिक्ष मलबा बनकर खतरा तो नहीं बढ़ा रहा। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि रॉकेट कक्षीय वेग हासिल नहीं कर पाया, तो अधिकांश मलबा वायुमंडल में जलकर नष्ट हो गया होगा। दूसरी संभावना यह है कि वह कुछ समय के लिए अनजाने में कक्षा में रहा हो और फिर वायुमंडलीय घर्षण के कारण गिर गया हो।

ISRO ने अभी तक इस पर स्पष्ट जानकारी नहीं दी है। इतिहास बताता है कि भारत को दोनों तरह के अनुभव हुए हैं। 2001 के PSLV-C3 मिशन में मलबा कक्षा में बिखर गया था, जबकि 2023 में PSLV से जुड़ा मलबा ऑस्ट्रेलिया के समुद्र तट तक पहुंच गया था।

अंतरिक्ष मलबे को लेकर वैश्विक नियम कमजोर हैं। कोई बाध्यकारी दंड नहीं, न ही अनिवार्य सफाई व्यवस्था। 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी अब पुरानी हो चुकी है और उसमें प्रवर्तन तंत्र का अभाव है।

निजी अंतरिक्ष क्षेत्र पर गहरा असर

PSLV-C62 की विफलता ने भारत के उभरते निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को भी गहरा झटका दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, छह भारतीय स्टार्टअप्स के उपग्रह इस मिशन में नष्ट हो गए। निजी कंपनियों के लिए बीमा एक बड़ी चुनौती है, खासकर प्रयोगात्मक मिशनों में।

OrbitAID के CEO शक्तिकुमार के अनुसार, AyulSat के लिए बीमा कराना संभव नहीं हो पाया था क्योंकि यह मिशन अपने तरह का पहला था। PSLV की लंबी सफलता के रिकॉर्ड के कारण विफलता की आशंका को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया।

भारत की साख पर असर

PSLV ने 1990 के दशक के बाद से 350 से अधिक उपग्रह लॉन्च किए हैं और भारत को एक किफायती और भरोसेमंद लॉन्च प्रदाता के रूप में स्थापित किया है। हालांकि, 2026 की यह विफलता इसलिए खास है क्योंकि पहली बार विदेशी ग्राहकों के उपग्रह भी नष्ट हुए हैं। वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में यह फर्क मायने रखता है।

अल्पकाल में PSLV मिशनों के लिए बीमा प्रीमियम बढ़ सकते हैं, विदेशी ग्राहक सतर्क हो सकते हैं और ISRO की व्यावसायिक शाखा NSIL पर जवाबदेही का दबाव बढ़ेगा।

PSLV-C62 की विफलता एक गंभीर झटका है, लेकिन यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के अस्तित्व पर सवाल नहीं खड़ा करती। अंतरिक्ष उड़ान में विफलताएं होती रही हैं चाहे वह SpaceX हो या यूरोप का Ariane कार्यक्रम। असली कसौटी यह है कि किसी देश की एजेंसी विफलता से कितनी पारदर्शिता, तकनीकी दक्षता और जिम्मेदारी के साथ सीख लेती है।

यदि ISRO इस संकट को खुलेपन, तकनीकी कठोरता और प्रभावित स्टार्टअप्स के प्रति संवेदनशीलता के साथ संभालता है, तो यह असफलता भी एक सीखने का अवसर बन सकती है जो भविष्य में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को और मजबूत करेगा।

Read More
Next Story