राजस्थान हाईकोर्ट का ट्रांसजेंडर आरक्षण में संशोधन, उपसंहार में बदलाव
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29 मार्च को लखनऊ, उत्तर प्रदेश के बेगम हज़रत महल पार्क में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 के खिलाफ विरोध प्रदर्शन। फोटो: पीटीआई

राजस्थान हाईकोर्ट का ट्रांसजेंडर आरक्षण में संशोधन, उपसंहार में बदलाव

राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर आरक्षण फैसले में संशोधन करते हुए, आत्म-पहचान को संवैधानिक अधिकार माना है और इसी के अनुसार उपसंहार में परिवर्तन हुआ...


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राजस्थान उच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर आरक्षण पर अपने हालिया फैसले के उपसंहार (एपिलॉग) में संशोधन किया है, जहां उसने पहले ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 पर प्रतिकूल टिप्पणी की थी और कहा था कि इसने लिंग की आत्म-पहचान के अधिकार को कम कर दिया है। न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार पुरोहित की पीठ ने उपसंहार को पूरी तरह से हटाने से इनकार करते हुए स्वीकार किया कि कुछ हिस्सों को इसमें शामिल नहीं किया जाना चाहिए था।

एक 29 वर्षीय ट्रांसजेंडर याचिकाकर्ता, जिसने उपसंहार पर स्पष्टीकरण मांगा था, इनकी ओर से पेश विवेक माथुर ने कहा, "अदालत ने स्पष्ट किया है और कुछ टेक्स्ट को हटाने का आदेश दिया है, जिसके बारे में अदालत ने कहा कि यह गलती से आया था और न तो वांछित था और न ही आवश्यक।"

संदर्भ और पिछला दृष्टिकोण

यह घटनाक्रम अदालत के 30 मार्च के उस फैसले के बाद आया है, जिसमें 2023 के राज्य के उस नोटिफिकेशन को चुनौती दी गई थी,जिसने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को एक अलग आरक्षण संरचना प्रदान किए बिना ओबीसी सूची के तहत वर्गीकृत किया था। यह संशोधन अदालत के 30 मार्च के उस फैसले के तीन दिन बाद आया है, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को बिना किसी अलग आरक्षण ढांचे के ओबीसी श्रेणी में रखने वाली 2023 की राज्य अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की गई थी।

मूल आदेश में क्या कहा गया था

अपने मूल निर्णय में,अदालत ने एक उपसंहार जोड़ा था, जिसमें चिंता व्यक्त की गई थी कि साल 2026 का संशोधन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त आत्म-अनुभूत लिंग पहचान के संवैधानिक सिद्धांत से अलग होने का संकेत देता है। अब हटाए गए हिस्सों में चेतावनी दी गई थी कि कानूनी लिंग मान्यता को प्रमाणन या प्रशासनिक जांच पर निर्भर करना, व्यक्तित्व के एक ऐसे पहलू को जिसका उलंघन नहीं किया जा सकता, राज्य-मध्यस्थता वाली पात्रता में बदलने का जोखिम पैदा करता है। अदालत ने उन वैधानिक विकासों के खिलाफ भी आगाह किया था, जो संवैधानिक गारंटियों को कमजोर कर सकते हैं या प्रक्रियात्मक बाधाओं द्वारा ट्रांसजेंडर अधिकारों को काल्पनिक बना सकते हैं।

संशोधित स्थिति और निर्देश

हालांकि, अपने संशोधित आदेश में, उच्च न्यायालय ने इन टिप्पणियों को हटा दिया और स्पष्ट किया कि मामले के न्यायनिर्णयन के लिए ये आवश्यक नहीं थीं। ताजा सूचना के साथ तैयार उपसंहार एक अधिक संयमित लहजा अपनाता है, जिसमें संशोधन को बदलते कानूनी परिदृश्य के हिस्से के रूप में वर्णित किया गया है, जबकि इस बात पर जोर दिया गया है कि मुख्य निर्णय में जारी निर्देश फैसले की तारीख पर मौजूद कानूनी स्थिति पर आधारित रहेंगे। साथ ही, अदालत ने लिंग पहचान की संवैधानिक नींव की पुष्टि करते हुए कहा कि अपने लिंग की आत्म-पहचान करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 21 के तहत गरिमा, स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक आंतरिक पहलू है और इस बात पर जोर दिया कि स्वयं की पहचान रियायत का मामला नहीं है, यह अधिकार का मामला है।

विधायी समयरेखा और परिणाम

पीठ ने आगे निर्देश दिया कि अपने फैसले के अनुपालन में राजस्थान सरकार द्वारा विकसित कोई भी नीतिगत ढांचा 30 मार्च, 2026 को मौजूद कानून के दायरे में ही रहना चाहिए। ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, साल 2026 को 24 मार्च को लोकसभा द्वारा पारित किया गया था और अगले दिन राज्यसभा की मंजूरी मिली थी। इसे 30 मार्च को राष्ट्रपति की सहमति मिली थी।

उच्च न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि निर्णय के पुराने संस्करण को संशोधित संस्करण से बदल दिया जाए। हालांकि, फैसले के मुख्य निर्देश अपरिवर्तित रहे हैं, जिसमें सार्वजनिक रोजगार और शैक्षिक प्रवेश में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को अंकों में 3 प्रतिशत अतिरिक्त वेटेज देना और उनके हाशिए पर होने की जांच करने और एक उचित आरक्षण ढांचे की सिफारिश करने के लिए एक समिति का गठन शामिल है।

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