
हिंद स्वराज से हत्या तक, गांधी और RSS की वैचारिक दूरी
RSS के 100 साल पूरे होने पर तुषार गांधी ने गांधी-RSS टकराव, सावरकर से वैचारिक मतभेद और आज गांधी को हिंदुत्व में ढालने की कोशिशों पर तीखा सवाल उठाया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे करने जा रहा है। ऐसे समय में उसके वैचारिक स्रोतों और महात्मा गांधी के साथ उसके जटिल और टकरावपूर्ण रिश्ते को लेकर बहस तेज़ हो गई है। इस साक्षात्कार में लेखक तुषार गांधी महात्मा गांधी के प्रपौत्र उस ऐतिहासिक टूट के मूल कारणों को रेखांकित करते हैं। वे गांधी की विनायक दामोदर सावरकर से शुरुआती मुलाक़ात, संकीर्ण राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ उनकी चेतावनियों और उस निरंतर शत्रुता की पड़ताल करते हैं, जो अंततः गांधी की हत्या पर समाप्त हुई। यह बातचीत इतिहास की ओर लौटकर आज के उन प्रयासों को सवालों के घेरे में खड़ा करती है, जिनके तहत गांधी को हिंदुत्व की वैचारिक धारा में समाहित करने की कोशिश की जा रही है।
गांधी और RSS का रिश्ता: शुरुआत कहां से हुई?
महात्मा गांधी और RSS के बीच संबंधों को समझने के लिए हमें बीसवीं सदी के आरंभ में, वर्ष 1906 में लंदन में हुई गांधी और वी.डी. सावरकर की मुलाकात से शुरुआत करनी होगी। इसी मुलाकात के बाद, दक्षिण अफ्रीका लौटते समय समुद्री यात्रा में गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ लिखा। उन्होंने इसे विचारों की डायरी कहा था, जिसे उन्होंने एक ही प्रवाह में लिखा दिलचस्प बात यह है कि जब एक हाथ थक जाता था तो वे दूसरे हाथ से लिखने लगते थे।
‘हिंद स्वराज’ संवाद शैली में लिखा गया ग्रंथ है। कई विश्लेषकों का मानना है कि इसमें संवाद की दूसरी आवाज़ सावरकर के दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती है, जो उस लंदन बैठक से उपजी थी। कुछ अन्य विद्वान इसे गांधी की अपनी आंतरिक आवाज़ मानते हैं, जो समय के साथ और मुखर होती गई। बहस चाहे जो हो, इसमें कोई संदेह नहीं कि उस मुलाकात ने गांधी के भीतर गहरे वैचारिक मंथन को जन्म दिया।
समावेशिता बनाम संकीर्ण राष्ट्रवाद
‘हिंद स्वराज’ में गांधी बार-बार समावेशिता और समानता पर ज़ोर देते हैं वही विचार जो आगे चलकर भारतीय संविधान की आत्मा बने। इसी दौर में गांधी को यह एहसास हुआ कि सावरकर द्वारा प्रतिनिधित्व की जाने वाली ताक़तें भारत के लिए औपनिवेशिक शासन से भी बड़ा ख़तरा हैं। उनका मानना था कि अंग्रेज़ों को हराया जा सकता है क्योंकि भारत उनका घर नहीं है, लेकिन घृणा, विभाजन और दमन पर आधारित कोई विचारधारा आज़ादी के बाद भी भारत को लगातार नुकसान पहुंचाएगी।
दक्षिण अफ्रीका से ही गांधी की राजनीति समावेशिता पर आधारित थी। वे अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष करते थे, लेकिन उत्पीड़क को दुश्मन नहीं मानते थे। भारत लौटने के बाद यह विश्वास और मज़बूत हुआ। गांधी का मानना था कि भारत तभी टिक सकता है जब वह एकजुट, समान और न्यायपूर्ण रहेगा। जो भी विचारधारा इन मूल्यों को कमजोर करती है, वह राष्ट्र के लिए घातक है।
गांधी की चेतावनियां और आज का संदर्भ
गांधी का यह डर आज के संदर्भ में और प्रासंगिक लगता है। पिछले दो-तीन दशकों में जिस तरह का विशिष्टतावादी और बहिष्करणकारी चिंतन बढ़ा है, उसने समाज को गहरी क्षति पहुंचाई है। गांधी की समावेशिता का अर्थ यह था कि समाज में कोई ऊँच-नीच नहीं हो सकती। उन्होंने इसे परिवार के उदाहरण से समझाया परिवार में आप कुछ सदस्यों को स्वीकार कर और कुछ को ठुकरा नहीं सकते।
इसके विपरीत, आज की राजनीति लगातार दूसरे की पहचान गढ़ रही है। यह प्रक्रिया RSS की राजनीतिक शाखा, भारतीय जनता पार्टी (BJP), द्वारा संचालित की जा रही है। गांधी ने चेताया था कि जैसे ही समावेशिता खत्म होती है, राष्ट्र खतरे में पड़ जाता है।
RSS और गांधी: आपसी सम्मान का दावा?
RSS अक्सर यह दावा करता है कि उसके और गांधी के बीच आपसी सम्मान था। तुषार गांधी इस दावे को सिरे से खारिज करते हैं। उनके अनुसार, पिछले 78 वर्षों में RSS ने दो समानांतर अभियान चलाए हैं — एक, गांधी की हत्या को सही ठहराने का और दूसरा, उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमामंडन करने का। तुषार गांधी जानबूझकर “हत्या” शब्द का प्रयोग करते हैं, क्योंकि असैसिनेशन शब्द इसे वैचारिक अनिवार्यता का झूठा आवरण देता है। यह हत्या इसलिए हुई क्योंकि गांधी को एक ख़तरे के रूप में देखा गया।
यह सिलसिला गांधी पर ही नहीं रुका। नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी और गौरी लंकेश सभी इसी वैचारिक हिंसा के शिकार बने। यह विचारधारात्मक हत्या असहमति को दबाने का औज़ार बन गई।
गांधी और RSS: दूरी के प्रमाण
अगर कोई आरएसएस के अंग्रेज़ी मुखपत्र ऑर्गनाइज़र में छपे लेखों को पढ़े जैसा कि इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने बताया है उसके मुताबिक गांधी के जीवनकाल में ही उन्हें खुलेआम धमकियां दी गईं और गालियां दी गईं। आपसी सम्मान का दावा उतना ही खोखला है, जितना हिंदू ख़तरे में है का मिथक।
गांधी RSS की शाखा में केवल एक बार गए थे, वह भी दबाव में, यह देखने के लिए कि क्या संगठन बदल रहा है। उस समय RSS के कार्यकर्ता उनकी सर्वधर्म प्रार्थना में व्यवधान डाल रहे थे। गांधी की RSS के प्रति सतर्कता उनके सहयोगियों प्यारेलाल और सुषिला नायर के लेखन में साफ़ दिखाई देती है।
अनुशासन का मिथक
यह भी कहा जाता है कि गांधी RSS के अनुशासन से प्रभावित थे। तुषार गांधी इसे गांधी की पूरी समझ का गलत आकलन बताते हैं। गांधी ने अनुशासन ब्रिटिश सेना में, यूरोप के फासीवादियों में और जर्मनी के नाज़ियों में भी देखा था। अनुशासन अपने आप में उन्हें कभी प्रभावित नहीं करता था।
कांग्रेस के पास भी सेवादल के रूप में एक अनुशासित संगठन था, जिसकी जड़ें सेवा और विनम्रता में थीं। इसके विपरीत, RSS की सेवा में आत्मप्रचार और अहंकार झलकता है। गांधी इसे भलीभांति समझते थे।
सावरकर और दया याचिकाओं का सच
सावरकर के लिए गांधी द्वारा दया याचिका की सलाह दिए जाने के दावे भी तुषार गांधी के अनुसार निराधार हैं। सावरकर ने अंडमान की सेल्युलर जेल से कई बार दया याचिकाएं लिखीं, जबकि अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने ऐसा नहीं किया। RSS इन पत्रों से इनकार नहीं करता, बल्कि गांधी को बीच में घसीटकर ध्यान भटकाता है।
यह कल्पना ही हास्यास्पद है कि अंग्रेज़ सरकार सावरकर और गांधी के बीच गुप्त संवाद की अनुमति देती। ऐसे दावे यह परखने की कोशिश हैं कि कितनी असत्य बातें समाज में सामान्य बनाई जा सकती हैं।
गांधी की हत्या की साजिश कब शुरू हुई?
भारत में गांधी पर पहला जानलेवा हमला 1934 में पुणे में हुआ, जब उनकी कार पर बम फेंका गया। यह घटना विभाजन और पाकिस्तान से बहुत पहले की है। उस समय गांधी हरिजन यात्राएं कर रहे थे और दलितों के लिए मंदिरों और कुओं के दरवाज़े खुलवा रहे थे। यह जातिगत वर्चस्व के लिए सीधी चुनौती थी। यहीं से उनके खिलाफ नफरत का संगठित अभियान शुरू हुआ।
एक ही वैचारिक धारा
नाथूराम गोडसे, हिंदू महासभा और RSS अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही वैचारिक बीज से उपजे हैं। गोडसे के भाई गोपाल गोडसे ने स्वयं कहा था कि पूरा परिवार RSS से जुड़ा था। RSS की सदस्यता प्रणाली का अभाव उसे जवाबदेही से बचने का अवसर देता है, निर्दोष होने का प्रमाण नहीं।
गांधी को अपनाने की नई कोशिशें
आज गांधी को अपनाने के प्रयास, दरअसल, उनके विचारों को खोखला करने की कोशिश हैं। साबरमती आश्रम के पुनर्विकास में एक संशोधित, RSS-अनुकूल गांधी को प्रस्तुत किया जा रहा है खाकी में ढला, निष्प्रभावी गांधी। असली खतरा गांधी का विरोध नहीं, बल्कि उनका विकृतिकरण है।तुषार गांधी के अनुसार, आने वाली पीढ़ियों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की जा रही है कि गांधी RSS के विरोधी नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक परंपरा का हिस्सा थे। यही सबसे बड़ा खतरा है।

