‘हिंदू’ सिर्फ संज्ञा नहीं विशेषण, पहचान पर मोहन भागवत की नई व्याख्या
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‘हिंदू’ सिर्फ संज्ञा नहीं विशेषण, पहचान पर मोहन भागवत की नई व्याख्या

आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि जाति से ऊपर उठकर हिंदू समाज के संगठन पर ध्यान देना चाहिए। सहिष्णुता और समन्वय ही भारतीय संस्कृति की पहचान है।


यह विडंबना है कि सभी सियासी चेहरे जोरशोर से कहते हैं कि जाति, समाज और देश के लिए कलंक है। लेकिन कथनी और करनी में अंतर साफ नजर आता है। यूजीसी के मुद्दे पर इस समय देश में समर्थन और विरोध में बहस छिड़ी हुई है। कभी यूजीसी विरोधी तो कभी समर्थक सड़कों पर उतर रहे हैं। देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश भी अछूता नहीं है। इन सबके बीच आरएसए प्रमुख मोहन भागवत का कहना है कि जो भूल गए हैं उन्हें बताना है कि वे हिंदू हैं। यही नहीं जाति की चिंता छोड़ हिंदू समाज के लिए काम करें।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि जो लोग अपनी पहचान भूल गए हैं, उन्हें यह स्मरण कराना आवश्यक है कि वे हिंदू हैं, ताकि हिंदू समाज संगठित होकर खड़ा हो सके। उनका कहना था कि संघ हिंदू समाज की बात इसलिए करता है क्योंकि इस देश में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा है।

गोरखपुर के योगिराज बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में आयोजित प्रबुद्धजन संगोष्ठी में अपने प्रवास के दूसरे दिन संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि हिंदू समाज का मूल विचार यह है कि “हमारा मार्ग भी सही है और आपका भी।” अलग-अलग पंथ और संप्रदाय हो सकते हैं, रास्ते भिन्न हो सकते हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू शब्द केवल संज्ञा नहीं, बल्कि एक विशेषण है जो गुण और आचरण को व्यक्त करता है। उनके अनुसार समाज सहिष्णुता और समन्वय से चलता है। स्वार्थ के बजाय परहित की भावना ही भारतीय संस्कृति का मूल है और इसी सत्य की पहचान से शाश्वत आनंद की प्राप्ति होती है।

भारतीय चिंतन और संस्कृति पर जोर

भागवत ने कहा कि भारत एक धर्मप्राण राष्ट्र है, जहां धर्म आचरण का हिस्सा है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित हुए संस्कारों से ही संस्कृति बनी और उसी आधार पर राष्ट्र का निर्माण हुआ। संघ की दृष्टि पूरी तरह भारतीय चिंतन पद्धति से विकसित हुई है। उन्होंने कहा कि आज विश्व समाज को सुख और शांति देने का प्रभावी तरीका खोज रहा है और भारत की ओर आशा से देख रहा है। पाश्चात्य चिंतन ने कभी भारतीय ज्ञान परंपरा को चुनौती देने का प्रयास किया, लेकिन वह अधूरा साबित हुआ। भारतीय चिंतन ही सामाजिक शंकाओं का समाधान दे सकता है।

सामाजिक सद्भाव पर बल

संगोष्ठी के बाद भागवत ने सवर्ण, ओबीसी और दलित समाज के प्रतिनिधियों के साथ भोजन किया। उन्होंने कहा कि समाज वही है जहां परस्पर जुड़ाव हो। केवल स्वार्थ आधारित संबंध टिकाऊ नहीं होते। उन्होंने जाति से ऊपर उठकर व्यापक हिंदू समाज के लिए काम करने का आह्वान किया। उनके अनुसार यदि समाज में सद्भाव नहीं होगा तो कानून और पुलिस भी व्यवस्था नहीं चला सकते।

भागवत ने कहा कि विदेशों में संबंध अक्सर लेन-देन पर आधारित होते हैं, जबकि भारत में संबंध अपनेपन पर टिके हैं। विविधताओं के बावजूद यहां एकता है। भारत को माता के रूप में देखा जाता है और यही भाव समाज को जोड़ता है।

संगठन और जिम्मेदारी

संघ के 100 वर्ष पूरे होने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह उत्सव का नहीं, आत्ममंथन का अवसर है। ब्लॉक स्तर पर वर्ष में दो-तीन बैठकें आयोजित कर समाज के विभिन्न वर्गों को साथ लाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि समाज को स्वयं आगे बढ़कर जिम्मेदारी लेनी चाहिए, केवल संघ पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। देश मजबूत रहेगा तो समाज और व्यक्ति भी सुरक्षित रहेंगे। संघ सहयोग करेगा, लेकिन पहल समाज को करनी होगी।

हाल के प्रमुख बयान

13 दिसंबर (अंडमान): भारत के लिए जीने का समय है, मरने का नहीं।

1 दिसंबर (पुणे): भारत को विश्व मंच पर उचित स्थान मिल रहा है।

18 नवंबर (गुवाहाटी): भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की आवश्यकता नहीं, उसकी सभ्यता स्वयं इसकी पहचान है।


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