वाम, दक्षिण और केंद्र के 100 साल: भारतीय राजनीति की आगे की राह क्या? टॉकिंग सेंस विद श्रीनी
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वाम, दक्षिण और केंद्र के 100 साल: भारतीय राजनीति की आगे की राह क्या? टॉकिंग सेंस विद श्रीनी

द फेडरल के एडिटर इन चीफ के अनुसार, सबसे अहम सवाल यह है कि क्या भारत का राजनीतिक वर्ग तेजी से बदलते समाज के अनुरूप इन परंपराओं को ढाल पाएगा, बिना लोकतांत्रिक विमर्श को खोखला किए।


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जैसे-जैसे भारत इस महीने अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाने की ओर बढ़ रहा है, देश के राजनीतिक इतिहास में एक असामान्य वैचारिक संयोग उभर कर सामने आ रहा है। भारत की राजनीति को दिशा देने वाली तीन प्रमुख विचारधाराएं कम्युनिस्ट वाम, हिंदू राष्ट्रवादी दक्षिण और मध्यमार्गी कांग्रेस परंपरा लगभग एक सदी का सफर तय कर चुकी हैं। यह पल इस बात का मूल्यांकन करने का अवसर प्रदान करता है कि इन प्रतिस्पर्धी विचारधाराओं ने भारतीय गणराज्य को कैसे आकार दिया, क्यों कुछ कमजोर पड़ीं, जबकि कुछ ने गति पकड़ी और मौजूदा शक्ति संतुलन भारत के राजनीतिक भविष्य के बारे में क्या संकेत देता है।

इसी विषय पर 'द फेडरल' के प्रधान संपादक एस. श्रीनिवासन ने 'टॉकिंग सेंस विद श्रीनी' कार्यक्रम में चर्चा का नेतृत्व किया। मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में रिकॉर्ड किया गया यह एपिसोड शो का 50वां संस्करण था। श्रीनिवासन ने स्वतंत्रता के बाद से लेकर वर्तमान तक भारतीय राजनीति के वैचारिक सफर को रेखांकित किया—एक ऐसा दौर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दक्षिणपंथ स्पष्ट रूप से मजबूत स्थिति में दिखाई देता है।

भारत ने बीच का रास्ता क्यों चुना?

श्रीनिवासन के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद भारत द्वारा मध्यमार्गी रास्ता अपनाना न तो संयोग था और न ही अपरिहार्य। यह महात्मा गांधी के राजनीतिक प्रभुत्व और कांग्रेस पार्टी की उस असाधारण क्षमता का परिणाम था, जिसके जरिए वह क्षेत्र, जाति और धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर जनसमर्थन जुटा सकी। उन्होंने कहा कि 1947 से पहले वाम और दक्षिण—दोनों सक्रिय थे, लेकिन गांधी एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में उभरे जो सभी पर भारी पड़े। जहां कम्युनिस्ट समूह भूमि सुधार और किसान आंदोलनों जैसे वर्ग आधारित संघर्षों पर केंद्रित थे और हिंदू राष्ट्रवादी ताकतें भारत की सभ्यतागत पहचान को सामने रख रही थीं, वहीं गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने व्यापक मध्य मार्ग पर कब्जा किया।


श्रीनिवासन के मुताबिक, गांधी की राजनीति न तो सिद्धांतवादी जड़ता में बंधी थी और न ही बहिष्करणकारी। उनका धर्मनिरपेक्षता का विचार पश्चिमी ‘चर्च और राज्य के पृथक्करण’ से अलग था—यह भारत की गहरी सामाजिक जटिलताओं को साधने का एक समावेशी ढांचा था। उन्होंने कहा कि भारत एक बेहद जटिल देश है—धर्म, क्षेत्र, जाति, भाषा। गांधी इसे समझते थे और एक जोड़ने वाली शक्ति की तरह काम करते थे। इसी सोच का असर स्वतंत्रता के बाद के चुनावों में दिखा। गांधी द्वारा चुने गए पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस मध्यमार्गी दृष्टि को आगे बढ़ाया—राजनीतिक लोकतंत्र को राज्य-नियोजित अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुधारों के साथ जोड़ते हुए।

वामपंथ का उदय और पतन

आज की सीमांत स्थिति के विपरीत भारतीय वामपंथ कभी कांग्रेस के लिए एक गंभीर चुनौती था। 1951–52 के पहले आम चुनावों में कम्युनिस्ट दल संसद में दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरे थे। उनकी शक्ति भूमि पुनर्वितरण, श्रमिक अधिकारों और सामाजिक न्याय से जुड़े जमीनी आंदोलनों में निहित थी। हालांकि, श्रीनिवासन का तर्क है कि वामपंथ का पतन भारतीय वास्तविकताओं के अनुरूप खुद को ढालने में उसकी विफलता का नतीजा था। उन्होंने कहा कि उनका दृष्टिकोण बहुत अधिक सिद्धांतवादी था। वे मार्क्सवादी दर्शन से चिपके रहे और भारतीय परिस्थितियों के अनुसार खुद को फिर से गढ़ नहीं पाए। एक बड़ी चूक जाति के प्रश्न से दूरी बनाए रखना था। भारत में जाति एक राजनीतिक सच्चाई है। चुनावी राजनीति में आप इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।

संगठनात्मक कठोरता ने समस्या को और बढ़ाया। फैसले शक्तिशाली पोलितब्यूरो तक सीमित रहे, जिससे क्षेत्रीय लचीलापन खत्म हो गया। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में लंबे शासन ने ठहराव को जन्म दिया—जहां जमीनी हिंसा, नेतृत्व का अभाव और नीतिगत जड़ता दिखाई दी। आंतरिक गुटबाजी ने भी वाम आंदोलन को कमजोर किया। CPI, CPI(M) और बाद की टूट ने एकता को तोड़ दिया। श्रीनिवासन ने टिप्पणी की कि 100 साल बाद भी वे एक साथ नहीं आ पाए और इसकी तुलना दक्षिणपंथ की संगठनात्मक एकजुटता से की।

दक्षिणपंथ को कैसे मिला उसका समय

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के नेतृत्व वाला वैचारिक दक्षिणपंथ सत्ता तक एक अलग रास्ते से पहुंचा। स्वतंत्रता के बाद दशकों तक RSS ने चुनावी राजनीति के बजाय सामाजिक संगठन और चरित्र निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया। गांधी की हत्या और उसके बाद लगे प्रतिबंध ने संगठन को लंबे समय तक राजनीतिक निष्क्रियता में धकेल दिया। श्रीनिवासन के अनुसार, निर्णायक मोड़ 1970 के दशक के उत्तरार्ध और 1980 के दशक की शुरुआत में आया। आपातकाल, तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में बड़े पैमाने पर धार्मिक धर्मांतरण, जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक अस्थिरता और शाह बानो मामला—इन घटनाओं ने हिंदू राष्ट्रवादी समूहों में यह भावना पैदा की कि धर्मनिरपेक्ष राजनीति बहुसंख्यक समाज की चिंताओं को संबोधित करने में विफल रही है।

1980 और 1990 के दशक के राम जन्मभूमि आंदोलन ने व्यापक जन लामबंदी का मंच प्रदान किया। हालांकि, श्रीनिवासन ने इसे एकमात्र कारण मानने से आगाह किया।उन्होंने कहा कि यह कई घटनाओं का संचय था—कांग्रेस की विफलताओं और वामपंथ द्वारा छोड़े गए खाली स्थान के साथ। साल 2014 के बाद मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने इस वैचारिक गति को एक “शासन परिवर्तन” में बदल दिया। राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और मजबूत नेतृत्व अब शासन की प्रमुख विशेषताएं बन चुकी हैं।

केंद्र का खोखलापन

जहां दक्षिणपंथ का उदय उसकी संगठनात्मक ताकत को दर्शाता है, वहीं यह कांग्रेस पार्टी के दीर्घकालिक पतन को भी उजागर करता है। कभी सेवा दल जैसे जमीनी नेटवर्क पर आधारित जनआंदोलन रही कांग्रेस धीरे-धीरे नेता-केंद्रित और जन लामबंदी से कटी हुई पार्टी बन गई। श्रीनिवासन ने कहा कि कांग्रेस अब कार्यकर्ताओं की नहीं, नेताओं की पार्टी बन गई है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) के दौर के भ्रष्टाचार घोटाले, वंशवादी राजनीति और उदारीकरण के बाद की आकांक्षाओं के अनुरूप खुद को ढालने में असमर्थता ने उसकी साख को और कमजोर किया।

फिर भी, श्रीनिवासन ने इस धारणा को खारिज किया कि मध्यमार्गी राजनीति अप्रासंगिक हो चुकी है। उन्होंने कहा कि भाजपा को अब भी लगभग 40–45 प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिलता है, जिससे विकल्पों के लिए पर्याप्त जगह बनी रहती है। मुद्दों की कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि कमी है उन्हें संगठित करने की क्षमता की। ध्रुवीकृत माहौल में मध्यमार्गी सोच इसलिए संघर्ष करती है क्योंकि उसमें बारीकियां होती हैं। मध्यमार्गी स्थिति परतदार होती है। इसमें धैर्य और समझ की ज़रूरत होती है, जबकि चरम रुख त्वरित और निर्णायक उत्तर देते हैं।

आगे क्या?

भविष्य की ओर देखते हुए श्रीनिवासन का मानना है कि वैचारिक सीमाएं अब धुंधली होती जा रही हैं। वैश्वीकरण ने दक्षिणपंथी सरकारों को भी उन कल्याणकारी नीतियों को अपनाने के लिए मजबूर किया है, जिन्हें कभी समाजवाद से जोड़ा जाता था। वहीं, आम आदमी पार्टी जैसे उत्तर-वैचारिक राजनीतिक प्रयोग पारंपरिक वर्गीकरण को और जटिल बनाते हैं। फिलहाल, दक्षिणपंथ का वर्चस्व बना हुआ है—जिसे संगठनात्मक अनुशासन और विपक्ष की बिखरी हुई स्थिति से बल मिलता है।

उन्होंने कहा कि दक्षिणपंथ की ताकत दरअसल विपक्ष की असफलता को भी साफ तौर पर दिखाती है। भारत में वैचारिक संघर्ष के एक सदी पूरे होने के मौके पर श्रीनिवासन के अनुसार सबसे अहम सवाल यह है कि क्या भारत का राजनीतिक वर्ग तेजी से बदलते समाज के अनुरूप इन परंपराओं को ढाल पाएगा—बिना लोकतांत्रिक विमर्श को खोखला किए।

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