सबरीमाला सुनवाई: ‘छुआछूत’ से तुलना पर तीखी बहस, पहले दिन गरमाया माहौल
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सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले में पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई की। फोटो: PTI

सबरीमाला सुनवाई: ‘छुआछूत’ से तुलना पर तीखी बहस, पहले दिन गरमाया माहौल

नौ-न्यायाधीशों की सुनवाई के पहले दिन इस बात पर तीखी बहस हुई कि किसी धर्म में क्या पवित्र माना जाएगा, इसका फैसला कौन करेगा>


सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले में पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ में पहले ही दिन तीखी बहस देखने को मिली।

सुनवाई के दौरान सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि क्या महिलाओं के प्रवेश पर रोक को ‘अस्पृश्यता’ के बराबर माना जा सकता है? इसी मुद्दे पर कोर्ट में सबसे तीखी बहस हुई। साथ ही, अदालत बार-बार एक अहम सवाल पर लौटती रही—धार्मिक मामलों में अदालतों का दखल कितनी सीमा तक होना चाहिए?

मामला क्या है?

सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ 2018 के सबरीमाला फैसले से जुड़े मुद्दों की समीक्षा कर रही है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म आयु की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी।

हालांकि, वर्तमान पीठ उस फैसले को सीधे नहीं बदल रही है। 2018 का फैसला अभी भी लागू है। अब कोर्ट यह तय कर रहा है कि अदालतें धार्मिक परंपराओं में कितनी दखल दे सकती हैं? किसी धर्म की “आवश्यक प्रथा” क्या है, यह कौन तय करेगा?

पीठ में कौन-कौन?

इस नौ-सदस्यीय संविधान पीठ की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्य कांत कर रहे हैं।

उनके साथ पीठ में शामिल हैं जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंद्रेश,जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ए.जी. मसीह, जस्टिस आर. महादेवन, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले और जस्टिस जॉयमाल्या बागची

‘अस्पृश्यता’ पर सबसे तीखी बहस

सबसे ज्यादा विवाद उस टिप्पणी को लेकर हुआ जिसमें 2018 के फैसले में महिलाओं के साथ व्यवहार की तुलना ‘अस्पृश्यता’ से की गई थी। सरकार की ओर से दलील रखते हुए तुषार मेहता ने इसका कड़ा विरोध किया।

उन्होंने कहा, “भारत में महिलाओं को हमेशा बराबरी ही नहीं, बल्कि ऊंचा स्थान दिया गया है। हम देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक—हम महिलाओं के सामने नतमस्तक होते हैं। इसलिए ‘पितृसत्ता’ या ‘जेंडर स्टीरियोटाइप’ जैसे विचारों को यहां थोपना सही नहीं है।”

केंद्र सरकार ने कहा कि वह किसी एक पक्ष में नहीं है। उनका मुख्य तर्क कि अदालतें धर्म को परिभाषित करने के लिए सक्षम नहीं हैं। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या विद्वानों का काम है, न्यायाधीशों का नहीं। अगर अदालतें सख्त परिभाषा तय करेंगी तो हिंदू धर्म की विविधता सीमित हो जाएगी

अनुच्छेद 17 पर जस्टिस नागरत्ना की आपत्ति

जस्टिस बी. वी. नागरत्ना, जो इस पीठ की इकलौती महिला न्यायाधीश हैं, ने इस मामले में अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता) लागू करने पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान भारत में जाति-आधारित अस्पृश्यता के ऐतिहासिक संदर्भ में बनाया गया था, और इसकी प्रासंगिकता यहां संदिग्ध है।

उन्होंने टिप्पणी की, “सबरीमाला के संदर्भ में अनुच्छेद 17 कैसे लागू होगा, यह समझ नहीं आता। एक महिला के तौर पर कहूं तो हर महीने तीन दिन अस्पृश्यता और चौथे दिन नहीं—ऐसा नहीं हो सकता।”

सरकार का जवाब

इस पर सरकार के वकील तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि उनका तर्क मासिक धर्म (menstruation) पर आधारित नहीं है। उन्होंने कहा, सबरीमाला में प्रतिबंध अशुद्धता नहीं, बल्कि उम्र (age group) पर आधारित है। वे बोले- “मैं सबरीमाला का बचाव अपने तरीके से करूंगा—यह चार दिनों का मुद्दा नहीं, बल्कि एक विशेष आयु वर्ग का है।”

उन्होंने यह भी कहा कि सबरीमाला मंदिर एक sui generis (अद्वितीय) संस्था है, जिसकी अपनी अलग परंपराएं हैं। साथ ही अन्य अयप्पा मंदिरों में महिलाओं का प्रवेश खुला है। धार्मिक परंपराओं का सम्मान होना चाहिए जैसे मज़ार या गुरुद्वारे में सिर ढकना जरूरी होता है, वैसे ही नियमों को स्वतः गरिमा या अधिकारों के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जा सकता।

अदालत बनाम संसद: धर्म कानून कौन तय करेगा?

दिन की सुनवाई का एक बड़ा मुद्दा यह भी रहा कि धार्मिक कानून तय करने का अधिकार किसके पास होना चाहिए—अदालत या संसद?

तुषार मेहता ने कहा कि संविधान संतुलन की मांग करता है। सीमित प्रतिबंध और पूर्ण प्रतिबंध (blanket ban) में अंतर होना चाहिए। उनके अनुसार, अगर किसी विशेष धार्मिक संस्था में सीमित वर्ग पर रोक है, तो उसे धार्मिक विविधता के नजरिए से देखना चाहिए लेकिन सभी जगहों पर पूरी तरह प्रतिबंध हो, तो अलग कसौटी लागू होगी।

उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा: “सभी व्यक्ति” का मतलब सभी वर्ग और समुदाय हैं। एक निश्चित आयु वर्ग की महिलाओं पर प्रतिबंध को सीधे भेदभाव नहीं कहा जा सकता।

अदालत की भूमिका पर बहस

मेहता ने कहा कि अदालतें धर्म में सुधार करने का सही मंच नहीं हैं। “सामाजिक सुधार” का काम संसद का है। बदलाव समाज या धर्म के भीतर से आना चाहिए, न कि न्यायिक आदेश से। उन्होंने यह भी जोड़ा कि संसद बेहतर मंच है क्योंकि वह जनता के विभिन्न विचारों का प्रतिनिधित्व करती है

जजों के सवाल

पीठ ने इस तर्क पर सवाल उठाए। जस्टिस संजय करोल बागची ने पूछा, क्या पूजा और मोक्ष से जुड़े विश्वासों को समानता के पैमाने पर परखा जा सकता है?

इस पर मेहता ने कहा: धर्म को सिर्फ सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर नियंत्रित किया जा सकता है या तब, जब यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करे।

उन्होंने चेतावनी दी कि अदालतों को धार्मिक आस्थाओं के मूल तत्वों की जांच से बचना चाहिए। यहां तक कि “देवता के गुणों” की भी न्यायिक समीक्षा नहीं होनी चाहिए

आगे क्या होगा?

इस मामले में याचिकाकर्ताओं की दलीलें 9 अप्रैल तक चलेंगी। उसके बाद विरोधी पक्ष की दलीलें 14–16 अप्रैल तक और अंतिम बहस होगी 22 अप्रैल को। इस मामले में फैसला 2026 के मध्य से पहले आने की संभावना नहीं है।

यह फैसला सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर इन मुद्दों पर भी पड़ेगा जैसे मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं का प्रवेश, पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला जननांग विकृति (FGM)।

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