सिंह के अर्थशास्त्री ने बताईं ‘विकसित भारत’ के लिए दो अहम चीजें
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पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू से 'द फेडरल' की बातचीत

'सिंह' के अर्थशास्त्री ने बताईं ‘विकसित भारत’ के लिए दो अहम चीजें

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके अर्थशास्त्री संजय बारू का कहना है कि मजबूत शिक्षा, सामाजिक एकता और स्वतंत्र वैश्विक रणनीति के बिना ये..


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अर्थशास्त्री संजय बारू का मानना है कि मजबूत शिक्षा, सामाजिक एकता और स्वतंत्र वैश्विक रणनीति के बिना भारत “विकसित भारत” (Viksit Bharat) और “आत्मनिर्भर भारत” (Atmanirbhar Bharat) के लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकता।

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके बारू का कहना है कि समावेशी विकास यानी हर भारतीय को इस यात्रा का हिस्सा बनाना और स्पष्ट राष्ट्रीय प्राथमिकताएं, विकसित भारत की सफलता के लिए बेहद जरूरी हैं। “ऑफ द बीटन ट्रैक” के इस एपिसोड में द फेडरल ने वरिष्ठ पत्रकार और 'द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर' के लेखक संजय बारू से बात की कि क्या भारत 2047 तक एक विकसित देश बनने की सही दिशा में है।


विकसित भारत की अवधारणा को आप कैसे देखते हैं?

बारू के अनुसार, विकसित अर्थव्यवस्था बनने और आत्मनिर्भर होने का विचार नया नहीं है। इसकी जड़ें भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और संविधान में ही हैं। शुरुआत से ही भारत ने खुद को एक प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्था के रूप में पुनः स्थापित करने का लक्ष्य रखा।

उन्होंने कहा कि लगभग 200 वर्षों के औपनिवेशिक शासन के बाद भारत का उद्देश्य आर्थिक, औद्योगिक, कृषि और बौद्धिक रूप से खुद को फिर से खड़ा करना था। आत्मनिर्भरता का अर्थ है, हर क्षेत्र में अपनी आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करने की क्षमता।

ऐतिहासिक रूप से 1700 में भारत वैश्विक आय का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा था, जो 1950 तक घटकर 5 प्रतिशत से भी कम रह गया। स्वतंत्रता के बाद से ही इस हिस्सेदारी को वापस पाने का प्रयास जारी है। बारू के मुताबिक, “विकसित भारत” कोई नई सोच नहीं बल्कि एक लंबी राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इसमें तेजी लाने की आवश्यकता महसूस हो रही है।


क्या वर्तमान सरकार सही दिशा में आगे बढ़ रही है?

बारू का कहना है कि पीवी नरसिम्हाराव से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और अब नरेंद्र मोदी तक, सभी सरकारों ने भारत की आर्थिक क्षमता को मजबूत करने का प्रयास किया है।

विकास दर के संदर्भ में उन्होंने बताया कि 1900 से 1950 के बीच भारत की वृद्धि दर लगभग शून्य थी, जो 1950 से 1980 के बीच 3.5 प्रतिशत हुई। 2000 तक यह 5.5 प्रतिशत और 2000 से 2015 के बीच लगभग 7.5 प्रतिशत तक पहुंची। हालांकि पिछले दशक में यह घटकर करीब 6.5 प्रतिशत रह गई है। उनके अनुसार, असली सवाल यह है कि विकास की रफ्तार क्यों धीमी हुई, इस पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है।


वैश्विक नीति और अमेरिका के साथ संबंध

विदेश नीति पर बारू ने कहा कि भारत पारंपरिक रूप से गुटनिरपेक्ष रहा, लेकिन अब “मल्टी-अलाइनमेंट” की ओर बढ़ा है। हालांकि उनका मानना है कि भारत यूनाइटेड स्टेट के साथ जरूरत से ज्यादा जुड़ता जा रहा है, जो दीर्घकाल में संतुलन बिगाड़ सकता है।


क्या हम ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के लिए पर्याप्त निवेश कर रहे हैं?

बारू के अनुसार, यह भारत की सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां शिक्षा, शोध और मानव संसाधन पर भारी निवेश किया गया, जिसका बड़ा लाभ मिला।

इसके विपरीत भारत में शिक्षा और अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश कमजोर रहा है। जब तक हम कौशल, ज्ञान और मानव विकास में निवेश नहीं बढ़ाएंगे, तब तक न आत्मनिर्भरता हासिल होगी और न ही विकसित राष्ट्र का दर्जा।

उन्होंने “ब्रेन ड्रेन” (प्रतिभा पलायन) और “वेल्थ ड्रेन” (पूंजी पलायन) को भी बड़ी चिंता बताया, जहां शिक्षित लोग और वित्तीय संसाधन देश से बाहर जा रहे हैं।


सामाजिक एकता कितनी जरूरी है?

बारू का स्पष्ट कहना है कि भारत के सामने दोहरी चुनौती हमेशा रही है, आर्थिक विकास और विविधता का प्रबंधन। अलग-अलग धर्म, भाषा, जाति और पहचान वाले देश में अगर कोई वर्ग खुद को अलग-थलग महसूस करता है तो विकास संभव नहीं है।

उन्होंने कहा कि उत्तर-पूर्व, कश्मीर या दक्षिण हर क्षेत्र के लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि वे इस राष्ट्रीय परियोजना का हिस्सा हैं। समावेशी समाज ही विकसित अर्थव्यवस्था की नींव है।


क्या बिना सामाजिक एकता के विकसित भारत संभव है?

बारू मानते हैं कि अल्पकाल में शायद संभव हो लेकिन दीर्घकाल में आंतरिक विभाजन शासन की लागत बढ़ा देते हैं, निर्णय लेने की प्रक्रिया को धीमा करते हैं और विकास को महंगा व कम प्रभावी बना देते हैं।


राजनीतिक विमर्श और इतिहास

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का अलग-अलग दृष्टिकोण होना स्वाभाविक है। लेकिन यह भी जरूरी है कि पिछले 80 वर्षों में हर सरकार के योगदान को स्वीकार किया जाए।

बारू ने जवाहर लाल नेहरु और इंदिरा गांधी जैसे नेताओं के साहस और वैश्विक चुनौतियों से निपटने की क्षमता का उल्लेख किया।


भारत की वैश्विक रणनीति

बारू ने चिंता जताई कि यूनाइटेड स्टेट आज वैश्विक वर्चस्व की नीति पर काम कर रहा है और भारत को किसी भी बड़े शक्ति-गुट के साथ अत्यधिक जुड़ाव से बचना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया जैसे क्षेत्रों में चल रहे संघर्ष विकासशील देशों को तेल कीमतों और व्यापार बाधाओं के जरिए प्रभावित कर रहे हैं और भारत को इन मुद्दों पर अधिक स्पष्ट आवाज उठानी चाहिए।

विकसित भारत का मूल मंत्र

अंत में बारू ने कहा कि भारत को विकसित और आत्मनिर्भर बनाने के लिए तीन चीजें अनिवार्य हैं समावेशी विकास, शिक्षा और ज्ञान में निवेश और वैश्विक स्तर पर अपने राष्ट्रीय हितों को मजबूती से रखना।

उनके अनुसार, “हम आंतरिक विभाजन और बाहरी निर्भरता दोनों का जोखिम नहीं उठा सकते। विकास व्यापक होना चाहिए और हर भारतीय को यह महसूस होना चाहिए कि वह इस यात्रा का हिस्सा है।”


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