हरीश राणा मामला: SC का ऐतिहासिक फैसला, लेकिन 8 साल क्यों लगे?
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हरीश राणा मामला: SC का ऐतिहासिक फैसला, लेकिन 8 साल क्यों लगे?

सुप्रीम कोर्ट ने 12 साल से कोमा में पड़े Harish Rana की फीडिंग ट्यूब हटाने की अनुमति दी, ‘गरिमा के साथ मृत्यु’ के अधिकार का यह पहला व्यावहारिक मामला है।


बुधवार (11 मार्च) को दिए गए Supreme Court of India के फैसले ने भारत में “गरिमा के साथ मरने के अधिकार” (Right to Die with Dignity) को पहली बार व्यवहार में लागू किया है। यह अधिकार आठ साल पहले मान्यता प्राप्त कर चुका था, लेकिन अब पहली बार किसी मामले में इसका इस्तेमाल हुआ है। आइए समझते हैं कि अदालत ने क्या फैसला दिया, यह क्यों महत्वपूर्ण है और कानून क्या अनुमति देता है तथा क्या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने एक परिवार को अपने 32 वर्षीय बेटे Harish Rana को जीवित रखने वाली फीडिंग ट्यूब हटाने की अनुमति दी है।हरीश राणा 2013 में गिरने के बाद गंभीर और अपरिवर्तनीय मस्तिष्क क्षति के कारण पिछले 12 वर्षों से कोमा में हैं।वह न हिल सकते हैं, न बोल सकते हैं, न सुन सकते हैं, न देख सकते हैं और न ही किसी को पहचान सकते हैं।नई दिल्ली के All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) के डॉक्टरों ने पुष्टि की कि उनके ठीक होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है।

अदालत ने निर्देश दिया कि हरीश को एम्स के पैलियेटिव केयर विभाग में भर्ती किया जाए, जहां चिकित्सकीय निगरानी में धीरे-धीरे उपचार हटाया जाएगा ताकि उनकी गरिमा बनी रहे।

इतना समय क्यों लगा?

2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच-जजों की पीठ ने Common Cause v Union of India मामले में फैसला दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में “गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार” भी शामिल है।अदालत ने कहा था कि यदि कोई व्यक्ति स्थायी वेजिटेटिव अवस्था (Permanent Vegetative State) में है—यानी वह जैविक रूप से जीवित है लेकिन उसे न चेतना है, न संवाद की क्षमता और न ही ठीक होने की संभावना—तो उसका परिवार अदालत से जीवन रक्षक उपचार हटाने की अनुमति मांग सकता है।2023 में अदालत ने इस प्रक्रिया को आसान भी किया था।

फिर भी, पिछले आठ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा एक भी आवेदन मंजूर नहीं किया था। बुधवार का फैसला पहला उदाहरण है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले क्यों ठुकराया?

राणा परिवार ने 2024 में पहले Delhi High Court का रुख किया था।हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि हरीश वेंटिलेटर पर नहीं हैं और उनके फेफड़े खुद काम कर रहे हैं, इसलिए वे बाहरी चिकित्सा सहायता के बिना भी जीवित रह सकते हैं।असल में हरीश को जीवित रखने के लिए उनके पेट में PEG ट्यूब लगाई गई थी, जिसके जरिए तरल पोषण दिया जाता था। हाईकोर्ट ने इसे सामान्य भोजन की तरह माना, न कि चिकित्सा हस्तक्षेप के रूप में। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से गलत बताया है।

PEG ट्यूब क्या होती है?

PEG का मतलब है Percutaneous Endoscopic Gastrostomy। इस प्रक्रिया में सर्जन त्वचा और पेट की दीवार में छोटा चीरा लगाकर एक लचीली ट्यूब डालते हैं। इस ट्यूब के माध्यम से तरल पोषण सीधे पेट में पहुंचाया जाता है। इसे हर दो महीने में अस्पताल में बदलना पड़ता हैगलत प्रबंधन से गंभीर संक्रमण हो सकता है पेट में संक्रमण (Peritonitis) या फेफड़ों में तरल जाने से निमोनिया हो सकता है।इसमें पोषण की मात्रा और गति को इलेक्ट्रॉनिक पंप से नियंत्रित करना पड़ता है।

अदालत ने कानूनी सवाल कैसे सुलझाया?

सबसे बड़ा कानूनी सवाल यह था कि PEG ट्यूब सिर्फ भोजन देने का तरीका है या चिकित्सा उपचार। इसका जवाब महत्वपूर्ण है। यदि इसे केवल भोजन माना जाए तो इसे हटाना किसी मरीज को भूखा मारने जैसा माना जा सकता है, जो अपराध है। लेकिन यदि यह चिकित्सा हस्तक्षेप है, तो इसे हटाना उसी तरह है जैसे किसी अन्य उपचार को बंद करना। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्लिनिकल पोषण और हाइड्रेशन भी चिकित्सा उपचार ही है।इसे हटाना हत्या नहीं है, बल्कि ऐसा उपचार रोकना है जिसका अब कोई चिकित्सकीय उद्देश्य नहीं बचा।

सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु में अंतर

सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) का मतलब है किसी मरीज की मृत्यु जानबूझकर किसी क्रिया के जरिए करना—जैसे घातक इंजेक्शन देना। भारत में यह अवैध है और इसे आपराधिक अपराध माना जाता है। निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) का अर्थ है उपचार रोक देना और बीमारी को प्राकृतिक रूप से अपना असर दिखाने देना। कानून इसे “चिकित्सकीय उपचार को वापस लेना या रोकना” कहता है। भारत में सही कानूनी प्रक्रिया का पालन करने पर यह संवैधानिक रूप से स्वीकार्य है।

मरीज के हित कैसे तय किए जाते हैं?

जब मरीज स्वयं निर्णय नहीं ले सकता, तो अदालत “बेस्ट इंटरेस्ट” (Best Interest) सिद्धांत लागू करती है। इसमें दो पक्षों का संतुलन देखा जाता है:उपचार जारी रखने से होने वाले लाभ, उपचार से होने वाला दर्द, अपमान और निरर्थकता। जिस पक्ष का वजन ज्यादा होता है, उसी के आधार पर फैसला लिया जाता है। इसके अलावा Substituted Judgment भी लागू होता है—यानी यह सोचा जाता है कि मरीज खुद क्या चाहता।

अदालत ने कहा कि हरीश पहले एक सक्रिय युवक थे जिन्हें फुटबॉल और जिम पसंद था। परिवार का मानना था कि ऐसी स्थिति में वह खुद भी उपचार जारी रखना नहीं चाहते।

अदालत ने सवाल बदल दिया

पहले अदालत पूछती थी क्या मरीज को मरने देना उसके हित में है? अब नया सवाल है क्या मरीज के हित में उपचार जारी रखना जरूरी है? इस बदलाव से उपचार जारी रखने के पक्ष को ही अब खुद को सही ठहराना होगा।

सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था है?

कानून दुरुपयोग रोकने के लिए कई स्तर की जांच तय करता है। तीन शर्तें जरूरी हैं। मरीज स्थायी वेजिटेटिव अवस्था या अंतिम अवस्था की बीमारी में हो। उपचार लंबे समय से चल रहा हो। ठीक होने की कोई संभावना न हो इसके बाद दो स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड मरीज का मूल्यांकन करते हैं एक अस्पताल का बोर्ड, दूसरा जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा नामित डॉक्टरों का बोर्डपरिवार की लिखित सहमति अनिवार्य है। इसके बाद भी 30 दिन की प्रतीक्षा अवधि रखी जाती है ताकि कोई आपत्ति दर्ज करा सके।

क्या मुद्दे अभी भी बाकी हैं?

इन स्पष्टताओं के बावजूद यह प्रक्रिया अभी भी जटिल है।इसमें कानूनी सहायता, समय और संसाधनों की जरूरत होती है जो अधिकांश भारतीय परिवारों के पास नहीं होते।राणा परिवार को दो अदालतों में दो साल से अधिक समय तक लड़ाई लड़नी पड़ी।

कानून अभी भी अधूरा

भारतीय संसद ने अभी तक “गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार” पर कोई कानून नहीं बनाया है। हालांकि 2006 में विधि आयोग 2018 में सुप्रीम कोर्ट और अब 2026 में फिर से कानून बनाने की सिफारिश की जा चुकी है।अदालत ने भी कहा कि कानून के अभाव में जीवन के अंतिम फैसले कई बार परिवार की आर्थिक थकान से प्रभावित हो सकते हैं, न कि मरीज के वास्तविक हित से।सुप्रीम कोर्ट अधिकार घोषित कर सकता है और प्रक्रिया स्पष्ट कर सकता है, लेकिन कानून बनाना संसद का काम है।करीब दो दशकों से संसद ने इस मुद्दे पर कदम नहीं उठाया है।इसलिए “गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार” अभी भी पूरी तरह स्पष्ट कानूनी ढांचे का इंतजार कर रहा है।

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