
‘ले लो या छोड़ दो’, व्हाट्सऐप मॉडल पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सऐप की 2021 प्राइवेसी पॉलिसी पर सवाल उठाते हुए पूछा कि डेटा शेयरिंग या ऐप छोड़ने का विकल्प क्या सच में ‘चॉइस’ है।
3 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा सवाल उठाया, जो वर्षों से करोड़ों यूज़र्स के मन में है जब व्हाट्सऐप कहता है कि आपके पास डेटा शेयरिंग को लेकर “चॉइस” है, लेकिन दूसरा विकल्प ऐप को पूरी तरह छोड़ना है, तो क्या इसे सच में चॉइस कहा जा सकता है? यही सवाल 2021 की व्हाट्सऐप प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर चल रही पांच साल पुरानी कानूनी लड़ाई के केंद्र में है, जो अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच चुकी है। इसके निहितार्थ केवल भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह तय करेंगे कि लोकतांत्रिक देश डिजिटल मोनोपॉली को कैसे रेगुलेट करें।
जनवरी 2021 में व्हाट्सऐप ने अपनी प्राइवेसी पॉलिसी अपडेट की थी, जिसके तहत भारतीय यूज़र्स को मेटा की कंपनियों फेसबुक और इंस्टाग्राम के साथ विस्तारित डेटा शेयरिंग स्वीकार करनी थी या फिर ऐप का इस्तेमाल बंद करना था। 2016 की नीति में जहां यूज़र्स को ऑप्ट-आउट का विकल्प दिया गया था, वहीं 2021 की पॉलिसी में यह विकल्प पूरी तरह खत्म कर दिया गया।
इस नीति के तहत जिन जानकारियों को साझा किया जाना था, उनमें फोन नंबर, लेनदेन से जुड़ा विवरण, बिज़नेस इंटरैक्शन और उन वेबसाइट्स की जानकारी शामिल थी, जहां व्हाट्सऐप की सुविधाएं इस्तेमाल होती हैं। यूज़र्स को प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) के शब्दों में ‘ले लो या छोड़ दो’ (take-it-or-leave-it) जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा—या तो शर्तें मानो या ऐप छोड़ दो।
CCI की आपत्ति और जांच
हालांकि बाद में व्हाट्सऐप ने यह घोषणा की कि अपडेट न मानने पर भी यूज़र्स की सुविधाएं बंद नहीं होंगी, लेकिन CCI ने पाया कि इस घोषणा से नई सेवा शर्तें और प्राइवेसी पॉलिसी वापस नहीं ली गईं। 2021 की पॉलिसी अब भी लागू है और यह व्हाट्सऐप को किसी भी समय एकतरफा तरीके से डेटा शेयरिंग बढ़ाने का अधिकार देती है, बिना यूज़र्स को कोई विकल्प दिए। CCI ने इसे “अत्यंत असुरक्षित स्थिति” करार दिया।
मार्च 2021 में CCI ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जांच शुरू की। आयोग को चिंता थी कि 80 प्रतिशत से अधिक बाज़ार हिस्सेदारी रखने वाला व्हाट्सऐप अपने प्रभुत्व का अनुचित लाभ उठा रहा है। नवंबर 2024 में विस्तृत जांच के बाद CCI ने पाया कि व्हाट्सऐप ने ‘शोषणकारी’ (exploitative) और ‘बहिष्करणकारी’ (exclusionary) दोनों तरह के दुरुपयोग किए हैं। यह भारत के उन शुरुआती मामलों में से एक था, जहां एक ही साथ दोनों तरह की जिम्मेदारी तय की गई।
CCI ने माना कि मैसेजिंग सेवाओं में “पॉजिटिव डायरेक्ट नेटवर्क इफेक्ट्स” होते हैं—जितने ज़्यादा यूज़र, सेवा उतनी ही ज़्यादा उपयोगी। इससे बाज़ार में एकाग्रता बढ़ती है और नए प्रतिस्पर्धियों के लिए प्रवेश मुश्किल हो जाता है।
प्राइवेसी को प्रतिस्पर्धा का हिस्सा मानने की नई सोच
CCI का विश्लेषण इसलिए भी अहम था क्योंकि इसने “प्राइवेसी को प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण गैर-मूल्य (non-price) पैरामीटर” माना। आयोग ने यूरोपीय आयोग और जर्मनी के प्रतिस्पर्धा प्राधिकरण (Bundeskartellamt) के फैसलों सहित अंतरराष्ट्रीय मिसालों का हवाला देते हुए कहा कि प्राइवेसी पर प्रतिस्पर्धा भी प्रतिस्पर्धा का ही एक रूप है।
CCI ने व्हाट्सऐप पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया और आदेश दिया कि यूज़र्स को स्पष्ट ऑप्ट-इन/ऑप्ट-आउट विकल्प दिए जाएं। साथ ही, पांच वर्षों के लिए मेटा के साथ विज्ञापन उद्देश्यों के लिए डेटा शेयरिंग पर रोक लगा दी गई।
NCLAT का संतुलित फैसला
मेटा और व्हाट्सऐप ने इस आदेश के खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में अपील की। नवंबर 2025 में NCLAT ने जुर्माना बरकरार रखा, लेकिन यह निष्कर्ष पलट दिया कि मेटा ने मैसेजिंग में अपनी पकड़ का इस्तेमाल विज्ञापन बाज़ार में प्रभुत्व बढ़ाने के लिए किया। ट्रिब्यूनल ने पांच साल का प्रतिबंध हटाते हुए कहा कि इससे व्हाट्सऐप का फ्री मॉडल खतरे में पड़ सकता है, हालांकि पारदर्शिता और यूज़र चॉइस से जुड़े प्रावधान कायम रखे गए।
दिसंबर 2025 में NCLAT ने स्पष्ट किया कि CCI द्वारा तय सुरक्षा उपाय—डिस्क्लोज़र, ऑप्ट-आउट अधिकार और उद्देश्य की सीमा—विज्ञापन और गैर-विज्ञापन, दोनों तरह की डेटा शेयरिंग पर समान रूप से लागू होंगे।
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
इस महीने जब दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने प्राइवेसी पॉलिसी को “निजी जानकारी की चोरी करने का एक सभ्य तरीका” बताया। अदालत ने सवाल उठाया कि आम भारतीय—फल बेचने वाला या घरेलू कामगार—इतनी जटिल कानूनी शर्तों को कैसे समझेगा।
सीजेआई ने कहा, “चॉइस क्या है? आपके पास पूरा मोनोपॉली है और आप कह रहे हैं कि हम चॉइस दे रहे हैं। या तो आप ऐप छोड़ दीजिए या हम डेटा शेयर करेंगे।” अदालत ने अंतरिम तौर पर डेटा शेयरिंग पर रोक लगाने की बात कही और अंतिम सुनवाई 15 अप्रैल तय की।
यूरोप से सीख और आगे का रास्ता
CCI और NCLAT दोनों ने यूरोपीय मामलों का सहारा लिया, खासकर 2019 के जर्मन फैसले और 2023 के यूरोपीय कोर्ट ऑफ जस्टिस के निर्णय का, जिसमें कहा गया कि अत्यधिक डेटा प्रोसेसिंग और प्राइवेसी में कटौती प्रतिस्पर्धा कानून के तहत दुरुपयोग मानी जा सकती है।
यह मामला सिर्फ व्हाट्सऐप तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि जब कुछ गिनी-चुनी कंपनियां मानव संवाद और डिजिटल अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करती हैं, तो नियम कौन बनाएगा? दशकों तक कंपनियां शर्तें तय करती रहीं और यूज़र्स के पास या तो मानने या डिजिटल दुनिया से बाहर होने का विकल्प था। यह केस उस व्यवस्था को चुनौती देता है।
करीब 50 करोड़ भारतीय व्हाट्सऐप यूज़र्स और दुनिया भर के अरबों लोगों के लिए, यह फैसला तय करेगा कि डिजिटल युग में उन्हें वास्तविक विकल्प मिलेगा या सिर्फ “चॉइस का भ्रम”, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने इतना तीखा सवाल उठाया है।

