SIR पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल: क्या मतदाता सूची संशोधन का उद्देश्य नागरिकता तय करना था?
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कोर्ट ने कहा कि अगर आयोग अंतर-राज्यीय प्रवास या गलत प्रविष्टियों के आधार पर इस संशोधन का बचाव कर रहा है तो फिर नागरिकता का बड़ा मुद्दा इसमें कहीं फिट नहीं बैठता।

SIR पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल: क्या मतदाता सूची संशोधन का उद्देश्य नागरिकता तय करना था?

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि SIR आदेश में यह साफ तौर पर नहीं कहा गया है कि इस अभ्यास को करने के कारणों में नागरिकता का सत्यापन भी शामिल है।


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सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग (ECI) की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। गुरुवार को अदालत ने आयोग से सीधे तौर पर पूछा कि क्या इस पूरी कवायद की शुरुआत करते समय नागरिकता का निर्धारण उसका मुख्य उद्देश्य था।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ बिहार में 24 जून को जारी अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसके तहत राज्य की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर संशोधन किया गया।

प्रवास बनाम नागरिकता पर कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान पीठ ने आयोग द्वारा ‘प्रवास’ (Migration) को आधार बनाए जाने पर सवाल खड़े किए। अदालत ने कहा कि आम तौर पर प्रवास का अर्थ कानूनी रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना होता है और एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना संवैधानिक अधिकार है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि आयोग की अधिसूचना में सीमा पार या अवैध प्रवास का कहीं उल्लेख नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि आयोग अंतर-राज्यीय प्रवास या गलत प्रविष्टियों के आधार पर इस संशोधन को सही ठहरा रहा है, तो फिर नागरिकता का मुद्दा इसमें स्वाभाविक रूप से फिट नहीं बैठता।

20 साल बाद SIR क्यों?

चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी और मनिंदर सिंह ने दलील दी कि बिहार में 2003 के बाद कोई विशेष गहन पुनरीक्षण नहीं हुआ था। उनके अनुसार, बीते 20 वर्षों में केवल सारांश संशोधन किए गए, जिनमें मतदाता की स्व-घोषणा को ही नागरिकता का आधार मान लिया जाता था और किसी तरह की गहन जांच नहीं होती थी।

आयोग ने तर्क दिया कि इस दौरान शहरीकरण और बड़े पैमाने पर प्रवास के चलते जनसांख्यिकीय संरचना में व्यापक बदलाव आए हैं, इसलिए विशेष गहन पुनरीक्षण आवश्यक हो गया था।

2003 के नागरिकता संशोधन का संदर्भ

आयोग के वकीलों ने नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 का भी हवाला दिया। उन्होंने बताया कि इस कानून के तहत नागरिकता साबित करने के लिए माता-पिता की नागरिकता जैसे कड़े प्रमाणों की व्यवस्था की गई थी। आयोग के अनुसार, मौजूदा पुनरीक्षण इस बदले हुए कानूनी ढांचे को लागू करने का उपयुक्त अवसर था।

हालांकि, जब कोर्ट ने पूछा कि क्या यही कानून इस पूरी प्रक्रिया का मुख्य आधार था, तो आयोग ने स्वीकार किया कि इस संशोधन ने नए कानूनी ढांचे को ध्यान में रखने का अवसर जरूर दिया।

66 लाख नाम हटे, फिर कोई शिकायत क्यों नहीं?

चुनाव आयोग ने याचिकाकर्ताओं, कुछ NGO और राजनेताओं, की मंशा पर भी सवाल उठाए। आयोग ने कहा कि SIR के दौरान बिहार में 66 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, लेकिन इनमें से किसी भी व्यक्ति ने न तो चुनाव आयोग और न ही किसी अदालत का दरवाजा खटखटाया।

आयोग ने इसे ‘रोविंग एंड फिशिंग इंक्वायरी’ करार देते हुए कहा कि ADR और PUCL जैसे संगठनों के कहने पर पूरी प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।

कोर्ट का रुख और अगली सुनवाई

अदालत ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि अब तक किसी प्रभावित व्यक्ति ने औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई है, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि कोर्ट का उद्देश्य केवल यह समझना है कि इस व्यापक संशोधन के पीछे चुनाव आयोग की वास्तविक मंशा क्या थी।

मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।

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