
क्या SIR है NRC का पिछला दरवाज़ा? कार्यकर्ताओं ने उठाए सवाल
SIR पर विवाद गहराया, चुनाव आयोग ने RTI में रिकॉर्ड न होने का दावा किया। कार्यकर्ताओं ने पारदर्शिता पर सवाल उठाए, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की मांग हो रही है।
विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। चुनाव आयोग (ECI) द्वारा इस प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज़ साझा करने से इनकार करने पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कैपिटल बीट के इस एपिसोड में पारदर्शिता कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने नीलू व्यास से बातचीत में अपने आरटीआई आवेदन, आयोग की प्रतिक्रियाएँ और लोकतंत्र पर इसके असर पर चर्चा की।
'RTI में मांगे दस्तावेज़, मिला सिर्फ़ आदेश'
अंजलि भारद्वाज ने बताया कि उन्होंने चुनाव आयोग को दो आरटीआई आवेदन दिए थे। पहले आवेदन में उन्होंने देशभर में SIR शुरू करने के फैसले के पीछे किसी स्वतंत्र अध्ययन या मूल्यांकन की कॉपी, संबंधित फाइलें, नोटिंग्स और पत्राचार मांगा था। जवाब में आयोग ने केवल 24 जून 2025 का आदेश साझा किया और उसे ही “स्वतः स्पष्ट” बताते हुए कहा कि उनके रिकॉर्ड में और कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
दूसरे आरटीआई में भारद्वाज ने 2003 में बिहार में हुए गहन संशोधन के आदेश और दिशानिर्देश मांगे। लेकिन आयोग ने दोबारा सिर्फ़ 2025 का आदेश ही भेज दिया। यह चौंकाने वाला है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में चुनाव आयोग ने खुद कहा था कि SIR किसी स्वतंत्र मूल्यांकन पर आधारित है। लेकिन आरटीआई में वे कहते हैं कि उनके पास ऐसे कोई रिकॉर्ड नहीं हैं।
'2003 के दिशानिर्देश क्यों अहम?'
चुनाव आयोग का दावा है कि 2003 की मतदाता सूची में नाम दर्ज करा चुके लोगों को अपनी पात्रता साबित करने के लिए दोबारा दस्तावेज़ देने की ज़रूरत नहीं होगी, क्योंकि उनकी नागरिकता और पात्रता उस समय पहले ही सत्यापित हो चुकी थी। लेकिन यदि ऐसा है तो आयोग को 2003 की प्रक्रिया और उपयोग किए गए दस्तावेज़ों से जुड़े दिशानिर्देश दिखाने चाहिए। बिना रिकॉर्ड के यह विश्वास करना मुश्किल है कि उस समय वास्तव में कोई जाँच हुई थी। इन दस्तावेज़ों को साझा करने से इनकार करना इस दावे पर संदेह पैदा करता है और यह आशंका मजबूत करता है कि आयोग गुमराह कर रहा है।
'क्या बिना आधार के हुआ SIR?'
भारद्वाज का कहना है कि चुनाव आयोग के जन सूचना अधिकारी का यह कहना कि कोई फाइल मौजूद नहीं है, दो संभावनाएँ पैदा करता है या तो आयोग सच नहीं बोल रहा, या फिर इतना बड़ा फैसला बिना किसी विचार-विमर्श और रिकॉर्ड के लिया गया। दोनों ही स्थितियाँ गंभीर हैं और एक संवैधानिक संस्था पर भरोसे को कमजोर करती हैं।
'सूचना के अधिकार पर सीधा हमला'
अंजलि भारद्वाज ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार नागरिकों के ‘जानने के अधिकार’ को मान्यता दी है चाहे वह एस.पी. गुप्ता मामला हो या फिर इलेक्टोरल बॉन्ड्स का फैसला। लेकिन चुनाव आयोग, जो एक संवैधानिक संस्था है, बुनियादी रिकॉर्ड तक देने से इंकार कर रहा है। उन्होंने कहा, “जब मैंने इलेक्टोरल बॉन्ड्स पर आरटीआई दाखिल की थी, तब फाइलें दी गई थीं। लेकिन यहाँ आयोग पूरी तरह से इनकार कर रहा है। यह न सिर्फ सूचना के अधिकार कानून का उल्लंघन है बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही पर भी चोट है।”
'सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की ज़रूरत'
भारद्वाज का मानना है कि आरटीआई जवाब सुप्रीम कोर्ट के लिए हस्तक्षेप का आधार बन सकता है। पहले से ही अदालत में दाखिल याचिकाओं में कहा गया है कि SIR गुप्त रूप से घोषित किया गया था, बिना किसी परामर्श या ठोस कारणों के। अब आरटीआई जवाबों से यह साफ होता है कि आयोग के पास इस निर्णय का कोई रिकॉर्ड नहीं है। उन्होंने कहा, “यह दलील को और मजबूत करता है कि यह प्रक्रिया मनमानी और अपारदर्शी है। मुझे उम्मीद है कि सितंबर की शुरुआत में होने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट इसे गंभीरता से लेगा।”
'NRC की तरह आशंका'
कुछ कार्यकर्ताओं का आरोप है कि SIR, एनआरसी (NRC) को पिछे के दरवाज़े से लागू करने जैसा है। इस पर भारद्वाज ने कहा, “यह संदेह बढ़ रहा है। आयोग कहता है कि यह एनआरसी नहीं है और 2003 जैसी जांच पहले भी हुई थी। लेकिन जब उनसे 2003 के दिशानिर्देश मांगे जाते हैं तो वे उन्हें देने से इनकार कर देते हैं। यदि आयोग ने रिकॉर्ड पहले ही सार्वजनिक कर दिए होते तो विवाद खत्म हो जाता। जानकारी छुपाकर आयोग लोगों की आशंकाओं को और पुख्ता कर रहा है।”
'सुप्रीम कोर्ट से क्या उम्मीद?'
अंत में भारद्वाज ने कहा कि उम्मीद है सुप्रीम कोर्ट आयोग को जवाबदेह ठहराएगा। यदि आयोग स्वतंत्र मूल्यांकन या 2003 के रिकॉर्ड नहीं दिखा पाता तो यह साफ हो जाएगा कि SIR का कोई आधार नहीं है। उन्होंने कहा, “संभव है कि अदालत SIR को रोकने का आदेश दे। कम से कम आयोग को संविधान की सीमाओं में रहते हुए नागरिकों को जानकारी देना ही होगा। हम भी आरटीआई की प्रथम और द्वितीय अपील दायर कर इस इनकार को चुनौती देंगे।”