खामेनेई की हत्या पर मोदी सरकार की चुप्पी शर्मनाक : सोनिया गाँधी
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खामेनेई की हत्या पर मोदी सरकार की चुप्पी शर्मनाक : सोनिया गाँधी

सोनिया गांधी ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की हत्या पर केंद्र की चुप्पी को विदेश नीति की विफलता बताया है। उन्होंने संसद में इस मुद्दे पर बहस की मांग की।


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Politics In India Over USA Iran War : कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के मामले में मोदी सरकार के रुख की तीखी आलोचना की है। उन्होंने मंगलवार को कहा कि इस लक्षित हत्या पर भारत सरकार की चुप्पी महज तटस्थता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से भागना है। सोनिया गांधी के अनुसार, यह चुप्पी भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। उन्होंने 'द इंडियन एक्सप्रेस' में लिखे अपने लेख में जोर दिया कि जब बजट सत्र का दूसरा हिस्सा शुरू हो, तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के टूटने और सरकार की इस 'परेशान करने वाली चुप्पी' पर संसद में खुली बहस होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का इस वैश्विक घटना पर मौन रहना अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के क्षरण को सामान्य बनाने जैसा है।


खामेनेई की हत्या और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन
सोनिया गांधी ने अपने लेख में 1 मार्च की उस रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें ईरान ने पुष्टि की थी कि उसके सर्वोच्च नेता खामेनेई की अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों में हत्या कर दी गई है। गांधी ने कहा कि बातचीत के बीच में एक मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की हत्या अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक बड़ा घाव है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2 (4) का जिक्र करते हुए कहा कि यह किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ बल प्रयोग को रोकता है। कांग्रेस नेता ने सवाल उठाया कि बिना युद्ध की औपचारिक घोषणा के ऐसी हत्याएं वैश्विक नियमों के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा कि यदि भारत जैसे देश इन सिद्धांतों की रक्षा नहीं करेंगे, तो अंतरराष्ट्रीय कानूनों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

पीएम मोदी की इजरायल यात्रा और समय पर सवाल
सोनिया गांधी ने इस घटनाक्रम के समय (Timing) पर भी गहरी चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि इस हत्या से ठीक 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल की यात्रा से लौटे थे। वहां उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के प्रति अटूट समर्थन दोहराया था। गांधी ने आलोचना करते हुए कहा कि गाजा संघर्ष में नागरिकों की भारी मौतों के बावजूद भारत का यह रुख ग्लोबल साउथ के देशों से अलग है। रूस, चीन और ब्रिक्स के अन्य सहयोगियों ने इस मामले में दूरी बनाई है, लेकिन भारत का उच्च-स्तरीय राजनीतिक समर्थन बिना नैतिक स्पष्टता के एक 'परेशान करने वाला' बदलाव है। उन्होंने कहा कि इससे भारत की छवि एक स्वतंत्र विदेश नीति वाले देश के बजाय किसी खास गुट के समर्थक की बन रही है।

विरासत और वाजपेयी सरकार का हवाला
सरकार को आईना दिखाते हुए सोनिया गांधी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि अप्रैल 2001 में वाजपेयी ने तेहरान की यात्रा के दौरान ईरान के साथ भारत के गहरे और सभ्यतागत संबंधों को गर्मजोशी से पुष्ट किया था। गांधी ने अफसोस जताया कि वर्तमान सरकार के लिए वाजपेयी द्वारा स्वीकार किए गए उन पुराने संबंधों की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है। उन्होंने कांग्रेस के रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि उनकी पार्टी ने ईरानी धरती पर बमबारी और हत्याओं की स्पष्ट निंदा की है। कांग्रेस ने ईरानी लोगों और दुनिया भर के शिया समुदायों के प्रति संवेदना व्यक्त की है, क्योंकि भारत की विदेश नीति हमेशा विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर आधारित रही है।

संसद में बहस और नैतिक शक्ति की मांग
सोनिया गांधी ने मांग की है कि बजट सत्र के दौरान इस मुद्दे पर सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता भारत के रणनीतिक हितों से सीधे जुड़ी हुई है। उन्होंने 'वसुधैव कुटुंबकम' के नारे को याद दिलाते हुए कहा कि यह केवल समारोहों के लिए नहीं, बल्कि न्याय और संयम के प्रति प्रतिबद्धता के लिए होना चाहिए। गांधी के अनुसार, भारत लंबे समय से दुनिया का 'विवेक रक्षक' बनने की आकांक्षा रखता है, लेकिन इसके लिए असुविधाजनक क्षणों में भी शांति और न्याय के पक्ष में बोलने की हिम्मत चाहिए। उन्होंने देश से आह्वान किया कि वह अपनी उस नैतिक शक्ति को फिर से खोजे और स्पष्टता के साथ वैश्विक मंच पर अपनी बात रखे।

(हेडलाइन को छोड़कर, इस स्टोरी को द फेडरल स्टाफ ने एडिट नहीं किया है और यह सिंडिकेटेड फ़ीड से ऑटो-पब्लिश की गई है।)



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