ओम बिरला का दांव या विपक्ष के लिए जाल? फ्रेंडशिप ग्रुप्स को लेकर कांग्रेस सांसदों में बेचैनी
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ओम बिरला का दांव या विपक्ष के लिए जाल? 'फ्रेंडशिप ग्रुप्स' को लेकर कांग्रेस सांसदों में बेचैनी

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के संसदीय मैत्री समूह के फैसले ने कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक बहस और इजराइल–फिलिस्तीन मुद्दे पर संवेदनशील स्थिति पैदा कर दी है।


ओम बिरला द्वारा 64 देशों के साथ 'विधायी संवाद को गहरा करने' और 'संसद से संसद के बीच सहयोग मजबूत करने' के लिए पार्लियामेंट्री फ्रेंडशिप ग्रुप्स बनाने का फैसला कांग्रेस पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर रहा है। इन 64 समूहों में लोकसभा और राज्यसभा के अलग-अलग दलों के सांसद शामिल हैं। ये लगभग उसी तरह के बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के बाद करीब 50 देशों में भेजा था। लेकिन जैसे मोदी सरकार की उस पहल पर देश में राजनीतिक विवाद हुआ था, वैसे ही अब बिरला के इन फ्रेंडशिप ग्रुप्स को लेकर भी सियासी हलचल शुरू हो गई है।

कांग्रेस के कई सांसदों ने कहा है कि बिरला का यह अचानक लिया गया फैसला संदिग्ध समय पर आया है। संसद का बजट सत्र दो हफ्ते बाद फिर से शुरू होने वाला है। उसी दौरान लोकसभा में एक प्रस्ताव लाया जा सकता है, जिसे कांग्रेस के कहने पर विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर कर पेश किया है। इस प्रस्ताव में लोकसभा स्पीकर को हटाने की मांग की गई है और उन पर सदन की कार्यवाही को 'खुले तौर पर पक्षपातपूर्ण तरीके से' चलाने का आरोप लगाया गया है।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ राज्यसभा सांसद ने कहा, 'जैसे ही हमने स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव का नोटिस दिया, उन्होंने (ओम बिरला) ने सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता करना बंद कर दिया। मीडिया में यह खबरें भी फैलाई गईं कि वह तभी अपनी कुर्सी पर लौटेंगे जब सदन में इस प्रस्ताव पर चर्चा हो जाएगी। संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू ने कहा है कि यह प्रस्ताव 9 मार्च को, यानी अवकाश के बाद सत्र के पहले दिन, चर्चा के लिए लिया जाएगा। इसी बीच स्पीकर ने ये बहुदलीय समूह बना दिए, ताकि वह दिखा सकें कि वह निष्पक्ष और सभी दलों को साथ लेकर चलने वाले हैं। जब इस प्रस्ताव पर चर्चा होगी, तो बीजेपी इसे कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल करेगी। वे पूछेंगे कि अगर स्पीकर पक्षपाती होते, तो क्या वे सभी दलों के सांसदों को भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए विदेश भेजने जैसा ऐतिहासिक कदम उठाते?”

अभी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं

कांग्रेस और विपक्षी INDIA गठबंधन के सांसदों को यह बात समझ में आ रही है कि लोकसभा सचिवालय के बयान में क्यों खास तौर पर कहा गया कि यह कदम भारतीय लोकतंत्र के 'समावेशी, प्रतिनिधि और बहुलतावादी चरित्र' को दिखाता है। बयान में यह भी जोर दिया गया कि इन समूहों की अगुवाई अलग-अलग पार्टियों के नेता करेंगे, जिससे दुनिया के मंच पर भारत की एकजुट और मजबूत लोकतांत्रिक आवाज पेश होगी।

एक कांग्रेस सांसद ने कहा, 'मैं इस समय अपने क्षेत्र में हूँ। आपसे ही मुझे पता चल रहा है कि मेरा नाम उस सूची में है। मुझे समझ नहीं आ रहा क्या कहूँ, क्योंकि न तो मैंने इस समूह में जाने की इच्छा जताई थी और न ही मेरी सहमति ली गई थी।' दरअसल, कांग्रेस की परेशानी सिर्फ इस फैसले तक सीमित नहीं है। पार्टी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। इसकी एक वजह यह भी मानी जा रही है कि इन 64 समूहों में से कम से कम दो समूह बहुत सोच-समझकर बनाए गए हैं और उनके अलग-अलग राजनीतिक असर हो सकते हैं।

पहला समूह 11 सदस्यों का है, जिसे फिलीपींस यात्रा के लिए बनाया गया है। इस समूह में बीजेपी के कृति देवी देबबर्मन, भोजराज नाग, अनंत नायक और धैर्यशील पाटिल, जेएमएम के नलिन सोरेन, डीएमके की रानी श्रीकुमार, टीडीपी के डी. प्रसादा राव, कांग्रेस की जोथिमणि और निर्दलीय सांसद कार्तिकेय शर्मा शामिल हैं। इस समूह का नेतृत्व कांग्रेस के लोकसभा में उपनेता और असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई करेंगे।

असम में खुशी की लहर

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला द्वारा गौरव गोगोई को फिलीपींस जाने वाले संसदीय मैत्री समूह का प्रमुख बनाए जाने से असम कांग्रेस में उत्साह है। असम में मार्च-अप्रैल में चुनाव होने हैं। वहां की कांग्रेस इकाई ने इस फैसले का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर निशाना साधा है। मुख्यमंत्री ने पहले गोगोई पर 'पाकिस्तान से संबंध' होने के आरोप लगाए थे। अब कांग्रेस का कहना है कि यह नियुक्ति उन आरोपों का जवाब है और गोगोई की साख को मजबूत करती है।

मंगलवार (24 फरवरी) को जैसे ही संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू ने X (पूर्व में ट्विटर) पर अलग-अलग संसदीय मैत्री समूहों की सूची साझा की, असम कांग्रेस ने भी X पर एक पत्र पोस्ट किया। यह पत्र लोकसभा सचिवालय की ओर से गौरव गोगोई को भेजा गया था, जिसमें उन्हें उनकी नई जिम्मेदारी के बारे में बताया गया था।

असम कांग्रेस ने अपने पोस्ट में लिखा,'माननीय लोकसभा अध्यक्ष द्वारा श्री गौरव गोगोई जी को ‘इंडिया–फिलीपींस संसदीय मैत्री समूह’ का अध्यक्ष नामित किया गया है। यह ऐसे समय में हुआ है जब असम के मुख्यमंत्री हमारे नेता के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण अभियान चला रहे हैं और उन्हें ‘पाकिस्तानी एजेंट’ तक कह चुके हैं (एक आरोप जिसे खुद हिमंत बिस्वा सरमा ने 8 फरवरी की तथाकथित ‘ऐतिहासिक’ सुपर फ्लॉप प्रेस कॉन्फ्रेंस में कमजोर कर दिया था)। असम की जनता समय आने पर मुख्यमंत्री को उचित जवाब देगी। तब तक सच उन्हें परेशान करता रहेगा।'

गोगोई ने नहीं दी प्रतिक्रिया

हालांकि गौरव गोगोई ने अभी तक इस जिम्मेदारी पर व्यक्तिगत रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है। असम कांग्रेस के प्रवक्ता रीतेम सिंह ने कहा, 'यह नियुक्ति, जो भारत की संसद के अधिकार के तहत की गई है, गौरव गोगोई की ईमानदारी और संसदीय प्रतिष्ठा को सीधे और साफ तौर पर सही साबित करती है। इससे साफ होता है कि बिस्वा सरमा द्वारा लगाए गए पाकिस्तान से संबंधों के आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं।'

रीतेम सिंह ने कहा,'यह फैसला दिखाता है कि देश की सबसे बड़ी विधायी संस्था को गौरव गोगोई पर पूरा भरोसा है।' उन्होंने यह भी कहा कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला द्वारा असम कांग्रेस अध्यक्ष को दी गई यह जिम्मेदारी उनके राष्ट्रीय सेवा और संसदीय कूटनीति के प्रति समर्पण की सही पहचान है।

इजराइल दौरा कांग्रेस के लिए मुश्किल

जहां एक तरफ असम कांग्रेस इस फैसले से खुश है, वहीं दूसरी तरफ केरल (जहां जल्द चुनाव होने हैं) और अन्य जगहों पर कांग्रेस स्पीकर के एक अन्य फैसले को लेकर असहज नजर आ रही है। स्पीकर ने इजराइल जाने वाले संसदीय मैत्री समूह में कांग्रेस के तीन सांसदों को शामिल किया है। इस समूह का नेतृत्व वरिष्ठ बीजेपी सांसद भर्तृहरि महताब करेंगे।

इजराइल जाने वाले इस समूह में कांग्रेस के वडकारा से सांसद शफी परंबिल, मयिलादुथुरै से सांसद आर. सुधा और राज्यसभा के वरिष्ठ सांसद शक्तिसिंह गोहिल शामिल हैं। इनके अलावा अभिनेता-राजनेता कमल हसन, समाजवादी पार्टी के नीरज मौर्य, जेडीयू के सुनील कुमार और बीजेपी के कमलजीत सहरावत, सीएन मंजूनाथ, बसवराज बोम्मई और बंसीलाल गुर्जर भी इस दल में शामिल हैं।

'यह नियुक्ति, जो भारत की संसद के अधिकार के तहत की गई है, सीधे और साफ तौर पर गौरव गोगोई की ईमानदारी और संसदीय प्रतिष्ठा को सही साबित करती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा उन पर लगाए गए पाकिस्तान से संबंधों के आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं।'

सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस इस बात पर 'गंभीरता से विचार' कर रही है कि इजराइल जाने वाले समूह में शामिल उसके तीन सांसद या तो खुद को इस दल से अलग कर लें या फिर स्पीकर से अनुरोध करें कि उन्हें किसी और देश जाने वाले समूह में नामित किया जाए।

कांग्रेस की चिंता की वजह साफ है। पार्टी, खासकर वायनाड की सांसद प्रियंका गांधी, गाजा में फिलिस्तीनियों के खिलाफ इजराइल की कार्रवाई की खुलकर और बार-बार आलोचना कर चुकी हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर मोदी सरकार की चुप्पी पर भी सवाल उठाए हैं और इसे हत्याओं का मौन समर्थन बताया है।

दरअसल, संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू द्वारा संसदीय मैत्री समूहों की सूची सार्वजनिक करने से कुछ घंटे पहले, कांग्रेस के संचार प्रमुख जयराम रमेश ने X पर लिखा था,'कब्जे वाले वेस्ट बैंक में हजारों फिलिस्तीनियों को बेदखल और विस्थापित करने की इजराइल की कार्रवाई तेज हो गई है और दुनिया भर में इसकी निंदा हो रही है। गाजा में आम नागरिकों पर इजराइल के हमले बेरहमी से जारी हैं। इजराइल और अमेरिका ईरान पर हवाई हमले की योजना बना रहे हैं।'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 फरवरी (बुधवार) को इजराइल की एक और आधिकारिक यात्रा पर जाने वाले हैं। इस पर जयराम रमेश ने कहा कि मोदी सरकार फिलिस्तीन के मुद्दे पर 'दिखावटी और दोहरी बातें' करती है, लेकिन हकीकत में उसने फिलिस्तीन का साथ छोड़ दिया है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भारत 18 नवंबर 1988 को फिलिस्तीन को मान्यता देने वाले शुरुआती देशों में से एक था।

इजराइल जाने वाले दल में कोई वामपंथी सांसद नहीं

इजराइल जाने वाले संसदीय मैत्री समूह में वामपंथी दलों का कोई भी सांसद शामिल नहीं है। वाम दल भारत में उन शुरुआती विपक्षी पार्टियों में रहे हैं जिन्होंने इजराइल को खुलकर 'दुष्ट राष्ट्र' कहा और प्रधानमंत्री नेतन्याहू को 'युद्ध अपराधी' बताया। कांग्रेस को यह भी समझ में आ रहा है कि अगर उसके सांसद इजराइल जाने वाले इस समूह में शामिल होते हैं, तो इसका पार्टी को देश में नुकसान हो सकता है। खासकर केरल में, जहां एक महीने बाद असम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के साथ चुनाव होने हैं। केरल में बड़ी संख्या में मतदाता, खासकर मुस्लिम समुदाय, फिलिस्तीन के मुद्दे को भावनात्मक रूप से देखते हैं। ऐसे में इजराइल के साथ जुड़े किसी कदम का राजनीतिक असर पड़ सकता है।

पार्टी करेगी आखिरी फैसला

कांग्रेस ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि वह अपने सांसदों को इजराइल जाने वाले समूह में शामिल होने देगी या नहीं। इस समूह में शामिल एक कांग्रेस सांसद ने कहा, 'मैं अभी अपने क्षेत्र में हूँ। आपसे ही मुझे पता चल रहा है कि मेरा नाम उस सूची में है। मुझे समझ नहीं आ रहा क्या कहूँ, क्योंकि न तो मैंने इस समूह में जाने की इच्छा जताई थी और न ही मेरी सहमति ली गई थी। मैं जाऊँगा या नहीं, यह मेरा फैसला नहीं है। मैं अपनी पार्टी नेतृत्व से निर्देश लूँगा।' उन्होंने आगे कहा,'मुझे नहीं लगता कि किसी फ्रेंडशिप ग्रुप के तहत इजराइल जाने का सवाल ही उठता है, लेकिन फिर भी मैं अपने हाईकमान से निर्देश लूँगा।'

इजराइल जाने वाले समूह में शामिल एक अन्य कांग्रेस सांसद ने कहा,'मेरे लिए इस पर टिप्पणी करना ठीक नहीं होगा, क्योंकि मुझे अभी तक स्पीकर, लोकसभा सचिवालय या संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू की ओर से कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है। मैंने सिर्फ मीडिया रिपोर्ट में अपना नाम देखा है। जब तक मुझे आधिकारिक जानकारी नहीं मिलती, मैं इस पर औपचारिक रूप से कुछ नहीं कह सकता।' उन्होंने आगे कहा, 'गाजा में इजराइल जो कर रहा है- महिलाओं, बच्चों और निर्दोष फिलिस्तीनियों की हत्या- उस पर हमारी पार्टी का रुख आप सब जानते हैं। प्रिंका गांधी ने कई बार यह मुद्दा उठाया है, राहुल गांधी ने भी, और आज जयराम रमेश ने भी इजराइल पर पार्टी का रुख साफ किया है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि फ्रेंडशिप ग्रुप के तहत इजराइल जाने का सवाल उठता है। फिर भी मैं अपने पार्टी नेतृत्व से निर्देश लूँगा और उसके बाद लोकसभा स्पीकर को और फिर मीडिया को सूचित करूँगा।'

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