संयोग, संघर्ष और सितारे, सुनीता विलियम्स की अनदेखी उड़ान
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संयोग, संघर्ष और सितारे, सुनीता विलियम्स की अनदेखी उड़ान

सुनीता विलियम्स की जीवन-यात्रा बताती है कि असफलताएं और संयोग कैसे मिलकर एक साधारण सपने को असाधारण अंतरिक्ष उपलब्धि में बदल देते हैं।


जीवन की यात्रा, ठीक उसी तरह जैसे चाँद या मंगल की ओर बढ़ता कोई अंतरिक्ष यान, शायद ही कभी सीधी रेखा में चलती है। यह इरादों की आग से प्रेरित होती है, लेकिन अनदेखे गुरुत्वाकर्षण बल अनपेक्षित घटनाओं और परिस्थितियों इसे लगातार मोड़ते रहते हैं। 27 दिसंबर 2025 को नासा से सेवानिवृत्त हुईं सुनीता विलियम्स की जीवन-यात्रा को यदि एक शब्द में समेटा जाए, तो वह होगा—संयोग। अंतरिक्ष तक पहुँचने और एक वैश्विक पहचान बनने का उनका रास्ता लगातार मोड़ों से भरा रहा, जहाँ हर अस्वीकृति ने चुपचाप एक बड़ी और अर्थपूर्ण सफलता की ज़मीन तैयार की।

ओहायो के यूक्लिड शहर में जन्मी सुनीता “सूनी” विलियम्स के पिता भारतीय मूल के डॉ. दीपक पंड्या थे और माँ स्लोवेनियाई-अमेरिकी उर्सुलिन बोनी पंड्या (पूर्व नाम ज़ालोकर)। बचपन में ही उनकी तीन गहरी रुचियाँ स्पष्ट थीं—पालतू जानवर, तैराकी और विज्ञान। उनका भविष्य जैसे पहले से तय दिखता था। न्यूरोएनाटॉमी जैसे उभरते क्षेत्र में शोध के लिए प्रसिद्ध पिता और जिज्ञासु दिमाग को प्रोत्साहित करने वाले शिक्षक—सब कुछ इस ओर इशारा करता था कि वे विज्ञान की राह चुनेंगी। जानवरों के प्रति उनके गहरे प्रेम के कारण उनका सपना पशु चिकित्सक बनने का था। विज्ञान में रुचि और जानवरों के लिए करुणा—यह सपना पूरी तरह तार्किक लगता था।

स्कूल से स्नातक होने के बाद, अपेक्षा के अनुरूप, सुनीता ने पशु चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई के लिए कई विश्वविद्यालयों में आवेदन किया, जिनमें प्रतिष्ठित कोलंबिया विश्वविद्यालय भी शामिल था। लेकिन ज़िंदगी ने कुछ और ही योजना बना रखी थी। उनके भाई जे का यूनाइटेड स्टेट्स नेवल अकादमी (यूएसएनए) से स्नातक होने के अवसर पर परिवार की एनापोलिस, मैरीलैंड यात्रा ने पहला अप्रत्याशित मोड़ दिया। वहाँ की भव्य खेल सुविधाएँ, खासकर तैराकी पूल, सजी-संवरी वर्दियाँ और भाई जे का प्रेरक आग्रह—इन सबने सुनीता को आकर्षित किया। यह एक ऐसी दुनिया थी जहाँ तैराकी के प्रति उनका प्रेम और सख़्त शैक्षणिक अनुशासन एक साथ चल सकते थे।

लेकिन इस राह की कीमत थी। यूएसएनए में प्रवेश का मतलब था पशु चिकित्सक बनने के सपने को छोड़ना और नौसेना के नियमों के अनुसार लंबे बाल कटवाना। 1980 के दशक के मध्य में, जब अकादमी ने हाल ही में महिलाओं के लिए अपने द्वार खोले थे, वहाँ कुछ गिनी-चुनी महिला कैडेट ही थीं। सुनीता उसी शुरुआती बैच का हिस्सा बनीं। बाद में एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “मैं पशु चिकित्सक बनना चाहती थी, लेकिन जिन विश्वविद्यालयों में मैं जाना चाहती थी, वहाँ मेरा चयन नहीं हुआ। फिर अपने बड़े भाई के प्रभाव और मार्गदर्शन में मैं नेवल अकादमी चली गई।”

1987 में यूएसएनए से स्नातक होने के बाद उनके सामने एक और चौराहा था। उन्होंने याद किया कि प्रशिक्षण पूरा होने के बाद वे सोच रही थीं कि आगे क्या करें। तैराकी की पृष्ठभूमि को देखते हुए उन्होंने नौसेना गोताखोर बनने का लक्ष्य रखा। लेकिन केवल एक ही स्थान उपलब्ध था और उनका चयन नहीं हुआ—यह उनकी पहली अस्वीकृति थी। उन्होंने कहा, “मैं न तो सबसे ऊपर थी, न सबसे नीचे, बीच में कहीं थी। मैं गोताखोर बनना चाहती थी क्योंकि मैं तैराक थी, लेकिन वह मौका नहीं मिला। उसी समय ‘टॉप गन’ फिल्म आई, तो मैंने सोचा मैं टॉम क्रूज़ बनूँगी और विमान उड़ाऊँगी।”

उन्होंने नौसैनिक विमानन की ओर रुख किया, लेकिन यहाँ भी पहली पसंद पूरी नहीं हुई। “टॉप गन का दौर था, मैं जेट पायलट बनना चाहती थी। वह भी नहीं हो पाया और मैं हेलिकॉप्टर पायलट बनी,” उन्होंने कहा। जेट पायलट के लिए चयन न होने पर उन्हें दूसरी पसंद—हेलिकॉप्टर पायलट—को स्वीकार करना पड़ा।

प्रशिक्षण के बाद वे हेलिकॉप्टर कॉम्बैट सपोर्ट स्क्वाड्रन के साथ जुड़ीं और खाड़ी युद्ध के दौरान सऊदी अरब और इराक में मिशनों पर तैनात रहीं। इसके बाद उन्होंने और ऊँचा लक्ष्य साधा और 1993 में नेवल टेस्ट पायलट स्कूल में दाख़िला लिया। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद वे टेस्ट पायलट बनीं—ऐसी पायलट जो नए और अपरीक्षित विमानों को उनकी सीमाओं तक ले जाती हैं। उन्होंने 30 से अधिक विभिन्न उड़ान मशीनों का परीक्षण किया। यही अनुभव आगे चलकर उन्हें बोइंग द्वारा विकसित नए अंतरिक्ष यान की टेस्ट पायलट बनने में मददगार साबित हुआ। बाद में वे टेस्ट पायलट प्रशिक्षक भी बनीं।

इसी दौर में, नेवल टेस्ट पायलट के रूप में, एक अनिवार्य ओरिएंटेशन यात्रा के तहत वे ह्यूस्टन स्थित जॉनसन स्पेस सेंटर पहुँचीं। वहीं उनकी बिखरी हुई यात्रा के टुकड़े अचानक एक सुस्पष्ट चित्र में जुड़ गए। वक्ता थे जॉन यंग—एक किंवदंती, जो दो बार चाँद पर उतरे और छह बार अंतरिक्ष गए। अपने संबोधन में उन्होंने संयोगवश बताया कि चंद्र लैंडिंग मॉड्यूल के अभ्यास के लिए उन्होंने हेलिकॉप्टर उड़ाना सीखा था। उस शांत सभागार में सुनीता के मन में एक चिंगारी जली—“मैं हेलिकॉप्टर उड़ाती हूँ। शायद मैं भी अंतरिक्ष जा सकती हूँ।”

इसके बाद सुनीता की ज़िंदगी पहले जैसी नहीं रही। उन्होंने तुरंत नासा में आवेदन किया—और उतनी ही जल्दी अस्वीकृति भी मिली। लेकिन इस बार वे निराश नहीं हुईं। उन्होंने अपना बायोडाटा और मज़बूत करने का फैसला किया। उन्होंने इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री शुरू की, डाइविंग स्कूल जॉइन किया और गहरे समुद्र की गोताखोर बनीं। दो साल बाद वे एक साथ इंजीनियर, गोताखोर, हेलिकॉप्टर पायलट और टेस्ट पायलट प्रशिक्षक थीं, जिनके पास 3,000 से अधिक उड़ान घंटे थे। 1998 में जब उन्होंने दोबारा आवेदन किया, तो नासा के पास ‘हाँ’ कहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। पहली पसंद बार-बार न मिलने वाली वही “संयोगवश” बनी हेलिकॉप्टर पायलट अब एक बहुप्रतीक्षित प्रशिक्षु अंतरिक्ष यात्री बन चुकी थीं।

शायद पूरा ब्रह्मांड ही उनकी मदद में जुटा था। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक पहुँचने वाले अपने टेढ़े-मेढ़े रास्ते को याद करते हुए उन्होंने कहा था, “असफल होने से डरिए मत। जब आपकी पहली पसंद नहीं मिलती, तो आप अपने बारे में और जान पाते हैं। फिर आपको वह चीज़ मिलती है, जिसे आप सच में पसंद करते हैं। जब आप किसी काम को पसंद करते हैं, तो आप उसे बेहतर करते हैं और अंत में उसका फल भी मिलता है।”

1998 में जब नासा से वह बहुप्रतीक्षित कॉल आया, तब अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) का निर्माण बस शुरू ही हुआ था। नवंबर 1998 में रूसी ज़ार्या मॉड्यूल के प्रक्षेपण के साथ इसके संयोजन का चरण शुरू हुआ। इस विशाल परियोजना के लिए अमेरिका का मुख्य वाहन स्पेस शटल था, जो अंतरिक्ष यात्रियों और ज़रूरी हिस्सों को कक्षा में ले जाता था। सुनीता, अपने 17 सह-प्रशिक्षुओं के साथ, अब ढाई साल के कठोर प्रशिक्षण में जुट गईं।

‘अस्ट्रोनॉट कैंडिडेट ट्रेनिंग’ हर संभावित स्थिति के लिए तैयार करने वाला कठिन कार्यक्रम था। इसकी शुरुआत परिचयात्मक ब्रीफिंग और दौरों से हुई, जो जल्द ही वैज्ञानिक और तकनीकी व्याख्यानों में बदल गए। प्रशिक्षुओं को स्पेस शटल और विकसित हो रहे आईएसएस प्रणालियों का गहन प्रशिक्षण दिया गया। शारीरिक क्षमता बढ़ाने के लिए कठोर अभ्यास हुए और उन्हें टी-38 जेट उड़ाने की ट्रेनिंग दी गई। जल और जंगल में जीवित रहने के विशेष पाठ्यक्रम भी अनिवार्य थे। एक परीक्षा में उन्हें फ्लाइट सूट और जूते पहनकर बिना रुके 75 मीटर तैरना होता था।

कक्षा में उन्होंने कक्षीय यांत्रिकी और अंतरिक्ष विज्ञान पढ़ा और फिर सिमुलेटर में उसका अभ्यास किया। आईएसएस के हर उपकरण—माइक्रोवेव ओवन से लेकर जीवन रक्षक प्रणालियों तक—को ठीक करना और उनकी खामियाँ दूर करना उन्होंने सीखा।

चूँकि आईएसएस एक संयुक्त अमेरिकी-रूसी परियोजना थी, इसलिए प्रशिक्षण का बड़ा हिस्सा मॉस्को के पास स्थित यूरी गागरिन कॉस्मोनॉट ट्रेनिंग सेंटर, स्टार सिटी में हुआ। महीनों तक उन्होंने सोयूज़ अंतरिक्ष यान चलाना सीखा, जो स्टेशन की “लाइफबोट” है। साथ ही उन्होंने रूसी भाषा भी इतनी सीखी कि बिना किसी बाधा के साथ काम कर सकें। सुनीता ने यहाँ भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।

प्रशिक्षण के अंत के करीब नासा ने एक बड़ी खबर दी—उन्हें 2003 में प्रस्तावित एक मिशन के लिए औपचारिक रूप से नियुक्त किया गया। ऐसा लगा कि अंतरिक्ष तक पहुँचने का उनका सफ़र अब सचमुच सुनिश्चित हो गया है।

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