NCERT पाठ्यपुस्तक विवाद: 3 अधिकारियों को हटाने के SC आदेश पर ‘न्यायिक अतिक्रमण’ का आरोप
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हाल ही में कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में एक अध्याय को लेकर हुए विवाद के बाद तीन एनसीईआरटी अधिकारियों को सभी सरकारों और सार्वजनिक संस्थानों से अलग करने के सुप्रीम कोर्ट के कड़े आदेश की कई पक्षों से तीखी आलोचना हो रही है।

NCERT पाठ्यपुस्तक विवाद: 3 अधिकारियों को हटाने के SC आदेश पर ‘न्यायिक अतिक्रमण’ का आरोप

कानूनी विशेषज्ञों और शिक्षा विशेषज्ञों ने इस आदेश की आलोचना की है। यह मुद्दा 13 मार्च को संसद में भी उठाया गया।


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एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ से जुड़े अध्याय को तैयार करने में शामिल तीन लोगों से केंद्र, राज्यों और सरकारी वित्त पोषित संस्थानों को दूरी बनाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कानूनी विशेषज्ञों और शिक्षा जगत में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। शुक्रवार (13 मार्च) को संसद में भी यह मुद्दा उठाया गया।

इससे पहले भी अदालत इस विवाद में हस्तक्षेप कर चुकी है और विवादित अध्याय वाली किताब को वापस लेने तथा उसके आगे वितरण पर रोक लगाने का आदेश दिया था। एनसीईआरटी ने भी इस मामले में सार्वजनिक रूप से माफी मांगी थी। इसके बावजूद बुधवार (11 मार्च) को सुप्रीम कोर्ट ने उस अध्याय के लेखन में शामिल लोगों को निशाना बनाते हुए नया निर्देश जारी किया।

‘या तो जानकारी नहीं थी या जानबूझकर किया गया’

अदालत ने कहा, “हमें यह मानने का कोई कारण नहीं है कि प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुश्री सुपर्णा दिवाकर और श्री आलोक प्रसन्न कुमार को भारतीय न्यायपालिका के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी, या फिर उन्होंने जानबूझकर और समझबूझकर तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया ताकि कक्षा 8 के उन छात्रों के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश की जा सके जो प्रभाव ग्रहण करने की उम्र में हैं। ऐसी स्थिति में कोई कारण नहीं है कि ऐसे लोग भविष्य की पीढ़ियों के लिए पाठ्यक्रम या पाठ्यपुस्तक तैयार करने की प्रक्रिया से किसी भी तरह जुड़े रहें।”

अदालत ने आगे कहा, “हम केंद्र सरकार, सभी राज्यों और राज्य के धन से चलने वाले सभी संस्थानों को निर्देश देते हैं कि वे इन व्यक्तियों को किसी भी ऐसी सेवा से अलग करें जिसमें उन्हें सार्वजनिक धन से भुगतान किया जाता हो। हालांकि, वे अपना पक्ष रखते हुए आदेश में संशोधन के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।”

फ्रांस में जन्मे विद्वान मिशेल डैनिनो एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों के लिए पाठ्यक्रम क्षेत्र समूह के अध्यक्ष रहे हैं। दिवाकर और कुमार उनके सहयोगी हैं।

‘न्यायिक अतिक्रमण’ का आरोप

इस आदेश के बाद “न्यायिक अतिक्रमण” के आरोप भी लगे हैं।

शुक्रवार को राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने अदालत के आदेश के प्रभावों पर सवाल उठाए और संस्थागत अतिक्रमण के खिलाफ चेतावनी दी।

उन्होंने कहा, “जब राजनेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं तो जांच होती है और कार्रवाई की जाती है। यही बात पुलिस, नौकरशाही, आम नागरिकों और कंपनियों पर भी लागू होती है। लेकिन जब न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की चर्चा होती है तो वह बेहद संवेदनशील हो जाती है।”

उन्होंने आगे कहा, “हाल ही में एक मौजूदा हाई कोर्ट जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, जब उनके घर से कथित तौर पर करोड़ों रुपये नकद मिलने की खबर आई थी। मामला अभी संसद में चर्चा में है और उस जज को केवल स्थानांतरित किया गया है, अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।”

चतुर्वेदी ने कहा, “मेरा मानना है कि शासन की तीनों शाखाएं कानून के सामने समान होनी चाहिए, जवाबदेह होनी चाहिए और जांच के लिए खुली होनी चाहिए। यदि किसी एक को दूसरों पर श्रेष्ठता मिलती है तो देश के लिए समस्या पैदा हो सकती है। इसलिए मैं कानून मंत्री से अनुरोध करती हूं कि भविष्य में किसी प्रकार की न्यायिक तानाशाही या न्यायिक अतिक्रमण की स्थिति न बने।”

‘कठोर और दमनकारी आदेश’

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी इस आदेश को “कठोर और दमनकारी” बताया।

उन्होंने कहा, “इतना कठोर आदेश बिना उन्हें सुने, बिना नोटिस दिए पारित नहीं किया जाना चाहिए था। यह अदालत की ओर से अत्यधिक अतिक्रमण जैसा लगता है। जैसा कि मैंने अपने ट्वीट में कहा था, यह अपने ही खिलाफ गोल करने जैसा है क्योंकि इससे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर और ज्यादा चर्चा होगी।”

संवैधानिक वकील गौतम भाटिया ने भी अपने ब्लॉग “क्या सुप्रीम कोर्ट किसी व्यक्ति पर प्रतिबंध लगा सकता है?” में इस आदेश के संवैधानिक आधार पर सवाल उठाए।

उन्होंने लिखा कि “संविधान न्यायिक आदेशों के जरिए मौलिक अधिकारों को सीमित करने की अनुमति नहीं देता। मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध केवल कानून के माध्यम से लगाए जा सकते हैं, और न्यायिक आदेश मौलिक अधिकारों के अध्याय के संदर्भ में ‘कानून’ नहीं माने जाते।”

भूषण की तरह भाटिया ने भी कहा कि “तीनों व्यक्तियों को यह स्पष्ट किए बिना दंडित किया गया कि उन्होंने कौन सा कानून तोड़ा है। न कोई आरोप, न मुकदमा, न सुनवाई और न ही कोई फैसला।”

उन्होंने लिखा, “किताबों या व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाना संवैधानिक अदालतों का काम नहीं है। चाहे अदालत को कोई किताब कितनी भी आपत्तिजनक क्यों न लगे या कोई व्यक्ति कितना भी अस्वीकार्य क्यों न लगे, न्यायिक आक्रोश संवैधानिक व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकता। ऐसा करना कानून के शासन और संवैधानिकता दोनों को कमजोर करेगा।”

भूषण ने कहा कि उन्होंने विवादित अध्याय पढ़ा है और उसमें उन्हें कुछ भी मानहानिकारक या तथ्यात्मक रूप से गलत नहीं लगा।

अरुणा रॉय मामले का जिक्र

भूषण ने कहा, “न्यायपालिका को यह तय करने में नहीं पड़ना चाहिए कि स्कूलों में क्या पढ़ाया जाना चाहिए, जब तक कि उसमें बहुत गंभीर गलती न हो। कई साल पहले जब अरुणा रॉय ने एनसीईआरटी की पुस्तकों में बदलाव के खिलाफ याचिका दायर की थी, तब अदालत ने कहा था कि यह कार्यपालिका और विशेषज्ञों का मामला है।”

कानूनी विद्वान फैजान मुस्तफा ने भी रॉय मामले का जिक्र करते हुए कहा कि यह विवाद पाठ्यपुस्तकों के लेखन की प्रक्रिया में गहरी समस्याओं को उजागर करता है।

उन्होंने कहा, “कई लोग लंबे समय से कह रहे थे कि पाठ्यपुस्तकों का लेखन राजनीतिक परियोजना बन गया है, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब जब इन लेखकों ने न्यायपालिका पर टिप्पणी की तो अचानक आक्रोश सामने आ गया। शिक्षा किसी भी सरकार के वैचारिक एजेंडे का उपकरण नहीं बननी चाहिए। पाठ्यपुस्तक लेखन पूरी तरह वस्तुनिष्ठ और स्वतंत्र होना चाहिए।”

‘जो करेंगे, वही लौटकर आएगा’

मुस्तफा ने कहा, “जो आप करते हैं, वह अंततः आपके पास लौटकर आता है। वाजपेयी सरकार के समय भी अरुणा रॉय जैसे लोग सुप्रीम कोर्ट गए थे, लेकिन तब अदालत ने इस मुद्दे पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। कुल मिलाकर भारतीय न्यायपालिका ने अच्छा काम किया है, हालांकि कुछ अपवाद भी रहे हैं और कुछ व्यक्तिगत न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार के मामले भी सामने आए हैं। लेकिन इतने संवेदनशील विषय पर चर्चा अधिक संतुलित ढंग से की जानी चाहिए ताकि बच्चों के मन में न्यायपालिका की पूरी तरह नकारात्मक छवि न बने।”

शिक्षाविद अनीता रामपाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं, लेकिन इसे पाठ्यपुस्तक विकास की पूरी प्रक्रिया की भी जांच करनी चाहिए थी।

उन्होंने कहा, “अदालत ने पाठ्यपुस्तक तैयार करने की प्रक्रिया, समितियों के गठन और मंजूरी की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, जो महत्वपूर्ण है। लेकिन ऐसा लगता है कि यह अचानक रुक गया और केवल तीन नामों पर ध्यान केंद्रित कर दिया गया।”

उन्होंने सवाल उठाया, “किताबों को मंजूरी देने वाले लोग कौन थे? समिति का गठन कैसे हुआ? केवल कानूनी ज्ञान के क्षेत्र पर ही इतना ध्यान क्यों दिया गया? क्या अन्य क्षेत्र बच्चों के विकास के लिए कम महत्वपूर्ण हैं?”

रामपाल ने कहा कि “इस अध्याय का मसौदा केवल एक या दो लोगों ने नहीं बनाया था। इसे पूरी पाठ्यपुस्तक विकास समिति और समीक्षकों ने मिलकर चर्चा के बाद तैयार किया था। फिर अदालत ने पूरी प्रक्रिया की जांच करने के बजाय केवल कुछ नामों को ही क्यों चुना?”

हालांकि एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें तैयार करने में शामिल रहे एक वरिष्ठ प्रोफेसर ने थोड़ा संतुलित दृष्टिकोण पेश किया।

उन्होंने कहा, “नई एनसीईआरटी किताबों की सामग्री में कई समस्याएं हैं, लेकिन इन पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए। पाठ्यपुस्तकों पर न्यायिक प्रतिबंध समस्या का उचित समाधान नहीं है—जब तक कि किताबों में कही गई बातें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं का उल्लंघन न करती हों। वास्तव में, न्यायपालिका के बारे में एनसीईआरटी की किताब में कही गई बातें अक्सर सेवानिवृत्त न्यायाधीश भी कहते रहे हैं।”

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