भारतीय अदालतों में AI की समस्या और सुप्रीम कोर्ट का कड़ा ऐतराज
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भारतीय अदालतों में AI की समस्या और सुप्रीम कोर्ट का कड़ा ऐतराज

जब एक ट्रायल कोर्ट ने चार फैसलों का हवाला दिया कि AI ने वहम किया, तो SC ने इसे गलत काम कहा, जिससे लीगल रिसर्च चेन में वेरिफिकेशन की सिस्टमिक नाकामी सामने आई।


आज के दौर में कामकाज के तरीकों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ा है। भारतीय कानूनी प्रणाली में भी अब यह एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहाँ सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी। हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने एक ऐसी घटना पर गौर किया जिसने सबको हैरान कर दिया। मामला यह था कि एक निचली अदालत (Trial Court) ने अपना फैसला सुनाते वक्त "AI हेलुसिनेशन" यानी AI द्वारा गढ़े गए ऐसे फैसलों का उदाहरण दे दिया, जिनका असल दुनिया में कोई अस्तित्व ही नहीं था। ये पूरी तरह से बनावटी और नकली फैसले थे।


यह गंभीर मुद्दा एक दीवानी मुकदमे (Civil Case) की सुनवाई के दौरान सामने आया। यह घटना सिर्फ वकीलों या जजों के लिए नहीं, बल्कि हर उस पेशे के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो आँख बंद करके ऑटोमेटेड तकनीक या मशीनी दिमाग पर भरोसा करते हैं। यह स्थिति दिखाती है कि जहाँ एक तरफ आधुनिक AI टूल्स काम को आसान बनाने का लालच देते हैं, वहीं दूसरी तरफ अदालती कार्यवाही में सच्चाई और तथ्यों की जो कड़ी जरूरत है, उसके साथ यह तकनीक कैसे टकरा रही है।

बनावटी फैसलों की पूरी कहानी
इस पूरे विवाद की जड़ 'गुम्माडी उषा रानी बनाम सुरे मल्लिकार्जुन राव' नाम की एक याचिका (Special Leave Petition) है। इसकी सुनवाई इसी साल 27 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने की, जिसमें जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे शामिल थे।

इस मामले में याचिकाकर्ता वे लोग हैं जो एक जमीन से जुड़े विवाद (Injunction Suit) में प्रतिवादी (Defendants) थे। जब यह मुकदमा अदालत में चल रहा था, तब ट्रायल कोर्ट ने जमीन की असली स्थिति और भौतिक विशेषताओं को नोट करने के लिए एक 'एडवोकेट कमिश्नर' की नियुक्ति की थी। याचिकाकर्ताओं को उस एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट पर कुछ बुनियादी आपत्तियाँ थीं, जिसे उन्होंने कोर्ट के सामने रखा।

19 अगस्त, 2025 को ट्रायल कोर्ट ने इन तमाम आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया। अब यहाँ से असली खेल शुरू हुआ। अपने इस फैसले को कानूनी रूप से सही ठहराने के लिए ट्रायल कोर्ट ने चार पुराने अदालती फैसलों (Precedents) का सहारा लिया। उनमें से एक प्रमुख हवाला था: 'लक्ष्मी देवी बनाम के. प्रभा (2006) 5 SCC 551'।

याचिकाकर्ताओं ने जब इस आदेश को देखा तो वे दंग रह गए। उन्होंने कोर्ट के इस फैसले को चुनौती दी और तर्क दिया कि जिन फैसलों का जिक्र जज साहब ने अपने आर्डर में किया है, वे पूरी तरह से फर्जी और काल्पनिक हैं। जब यह मामला आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट पहुँचा, तो कोर्ट ने इस आपत्ति की जाँच की। जाँच में यह कड़वा सच सामने आया कि वे चारों फैसले वाकई AI द्वारा तैयार किए गए नकली फैसले थे। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि हाई कोर्ट ने सिर्फ एक मामूली चेतावनी देकर बात रफा-दफा कर दी और निचली अदालत के फैसले को ही सही मान लिया।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा और सख्त रुख
हाई कोर्ट से राहत न मिलने पर याचिकाकर्ताओं को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को तुरंत भाँप लिया। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि यह मामला सिर्फ एक जमीन के विवाद का नहीं है, बल्कि यह "गंभीर संस्थागत चिंता" का विषय है। कोर्ट का मानना था कि यहाँ समस्या यह नहीं है कि फैसला क्या आया, बल्कि समस्या उस गलत और त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया (Flawed Process) में है जिसके जरिए फैसला लिया गया।

ट्रायल कोर्ट द्वारा इन बनावटी और 'सिंथेटिक' फैसलों का इस्तेमाल करने पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह की हरकत से पूरी न्यायिक प्रक्रिया की साख पर सवाल खड़े होते हैं। इस मामले में आगे और नुकसान न हो, इसके लिए कोर्ट ने तुरंत आदेश दिया कि जब तक इस याचिका का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक ट्रायल कोर्ट उस विवादित 'एडवोकेट कमिश्नर' की रिपोर्ट के आधार पर कोई कदम नहीं उठाएगा।

क्या यह सिर्फ एक गलती है या कोई बड़ा कदाचार?
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी बात बहुत ही साफ लहजे में कही। कोर्ट ने कहा कि ऐसे नकली और मनगढ़ंत फैसलों पर आधारित कोई भी निर्णय सिर्फ "फैसला लेने की एक सामान्य गलती" (Error in decision making) नहीं हो सकता। बल्कि कोर्ट ने इसे "कदाचार" (Misconduct) घोषित किया और कहा कि इसके कानूनी परिणाम भुगतने होंगे।

सीधी सी बात है कि चाहे आप इसे मानवीय भूल कहें या तकनीकी गड़बड़ी, अगर आपके कानूनी तर्क की बुनियाद ही झूठ या फर्जी डेटा पर टिकी है, तो पूरा न्याय ही खतरे में पड़ जाता है। इस मामले की गहराई तक पहुँचने के लिए और यह तय करने के लिए कि इसमें किसकी कितनी जवाबदेही है, सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया है। कोर्ट ने देश के सबसे बड़े कानूनी विशेषज्ञों—अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर उनकी मदद माँगी है।

यह समझना जरूरी है कि ट्रायल कोर्ट का कोई भी जज अकेले काम नहीं करता। उनके पास रिसर्च और सहायता के लिए एक पूरा तंत्र होता है।

इंसानी हाथों की जिम्मेदारी (The Human Chain)
भारतीय अदालतों में जजों को रिसर्च के लिए काफी मदद मिलती है। इसमें कोर्ट का स्टाफ, लॉ क्लर्क और आजकल बढ़ते हुए चलन के साथ 'AI-बेस्ड लीगल रिसर्च टूल्स' शामिल हैं। ये AI टूल्स कोई साधारण सॉफ्टवेयर नहीं हैं, बल्कि ये बड़े-बड़े कमर्शियल प्लेटफॉर्म्स हैं जो सीधे तौर पर जजों और वकीलों को बेचे जा रहे हैं।

इस मामले के मुख्य बिंदु जो ध्यान देने योग्य हैं:

नकली AI रेफरेंस देना एक 'कदाचार' है, न कि कोई मामूली अदालती गलती।

रिसर्च की पूरी श्रृंखला में हर स्तर पर वेरिफिकेशन (सत्यापन) का काम फेल रहा।

ट्रायल कोर्ट को उस गलत रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ने से रोक दिया गया है।

कोर्ट में फर्जी हवाले देना 'एडवोकेट्स एक्ट' का खुला उल्लंघन है।

AI से मिली किसी भी कानूनी जानकारी को स्वतंत्र रूप से चेक करना अब अनिवार्य है।

देखा जाए तो AI टूल से जानकारी निकलने और उसे कोर्ट के फाइनल आर्डर में छपने के बीच कई इंसानी हाथ शामिल होते हैं। सबसे पहले क्लर्क या स्टाफ रिसर्च करता है, फिर उसकी एक लिस्ट बनती है, फिर उसे ड्राफ्ट पैराग्राफ में बदला जाता है और अंत में जज उस पर साइन करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान हर कदम पर उस जानकारी को चेक करने का मौका मौजूद था। लेकिन अफ़सोस कि इसे किसी ने नहीं परखा।

पूरे सिस्टम की विफलता
हर स्तर पर वेरिफिकेशन का यह मौका हाथ से निकल जाना यह बताता है कि हमारे अदालती माहौल में पेशेवर सावधानी (Due Diligence) की कितनी कमी आ गई है। यह पूरे सिस्टम की एक बड़ी विफलता है। 'एडवोकेट्स एक्ट' के नियम बहुत स्पष्ट हैं—अदालत में कोई भी गलत या भ्रामक बयान देना पेशेवर कदाचार के दायरे में आता है। और फर्जी फैसला पेश करना तो सीधे तौर पर अनुशासनहीनता की कार्रवाई के लिए काफी है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पेचीदा मामले में मदद के लिए वरिष्ठ वकील श्याम दीवान को भी नियुक्त किया है। कोर्ट का इरादा साफ है: वे न्यायिक बिरादरी के लिए ऐसी गाइडलाइंस तैयार करना चाहते हैं जिससे यह पक्का हो सके कि भविष्य में कोई भी डेटा फर्जी न हो।

तकनीक: एक दोधारी तलवार
आजकल AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है क्योंकि यह उबाऊ कामों को आसान बना देता है। डेटा को सजाना और विश्लेषण करना इसका काम है, लेकिन इसकी बनावट ऐसी है कि इसमें गलतियाँ (Errors) बहुत आसानी से घुस सकती हैं। कभी-कभी तो लोग जानबूझकर भी गलत जानकारी फैलाने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की यह पहल असल में उस लड़ाई का हिस्सा है जो भारतीय न्यायपालिका "AI हेलुसिनेशन" के खिलाफ लड़ रही है। नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक 'श्वेत पत्र' (White Paper) जारी किया था, जिसमें साफ कहा गया था कि AI के जरिए मनगढ़ंत केस तैयार करना न्याय के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

कानूनी 'डीप फेक्स' से बचना जरूरी
जैसे आजकल चेहरों के 'डीप फेक्स' बन रहे हैं, वैसे ही अब "लीगल डीप फेक्स" (नकली कानून) का खतरा बढ़ गया है। कुछ समय पहले जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने भी चेतावनी दी थी कि किसी भी फैसले के संदर्भ को क्रॉस-चेक करना हर वकील का बुनियादी कर्तव्य है। कोर्ट किसी भी तरह की लापरवाही या नकली डेटा को स्वीकार नहीं करेगा।

यही बात दिल्ली हाई कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में दोहराई थी कि बिना जाँच के पुराने फैसलों का हवाला देना कोर्ट को गुमराह करने जैसा है।

अंत में: यह सिर्फ अदालतों की बात नहीं है
यह खतरा सिर्फ वकीलों या जजों तक सीमित नहीं है। हर वह पेशा जहाँ तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, उसे इन गड़बड़ियों के प्रति सचेत रहना होगा। चाहे आप डेटा सोर्स चेक करें या फाइनल प्रोडक्ट की समीक्षा, सावधानी हर स्तर पर जरूरी है। जब तक ऐसी तकनीक नहीं आ जाती जो खुद ही झूठ और सच की पहचान कर सके, तब तक इंसानी सतर्कता ही हमारा सबसे बड़ा हथियार है।


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