महिला आरक्षण पर सुप्रीम सुनवाई: क्या विशेष सत्र से पहले होगा बदलाव?
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महिला आरक्षण पर 'सुप्रीम' सुनवाई: क्या विशेष सत्र से पहले होगा बदलाव?

कांग्रेस नेता द्वारा दायर इस याचिका में मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया गया है कि महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का लाभ भविष्य की अनिश्चितताओं पर नहीं...


संसद के आगामी विशेष सत्र की शुरुआत से पहले महिला आरक्षण विधेयक को तत्काल प्रभाव से लागू करने की मांग ने कानूनी और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। देश की सर्वोच्च अदालत आज उस महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करने के लिए तैयार है, जिसमें नारी शक्ति वंदन अधिनियम के प्रावधानों को बिना किसी देरी के जमीन पर उतारने का आग्रह किया गया है। यह याचिका कांग्रेस नेता जया ठाकुर की ओर से दायर की गई है, जो ऐसे समय में चर्चा का विषय बनी है जब सरकार और विपक्ष इस मुद्दे पर आमने-सामने हैं। शीर्ष अदालत की कार्यसूची के मुताबिक, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इस पर विस्तार से दलीलें सुनेगी।

याचिका में त्वरित कार्यान्वयन का तर्क

कांग्रेस नेता द्वारा दायर इस याचिका में मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया गया है कि महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का लाभ भविष्य की अनिश्चितताओं पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी कोटा देने का जो प्रावधान किया गया है, उसे जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन की शर्त के साथ जोड़कर रोकना अनुचित है। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि चूंकि सीटों की संख्या और चुनावी ढांचा पहले से ही व्यवस्थित है। इसलिए इन पूर्व शर्तों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। वर्तमान में निर्वाचित निकायों में महिलाओं की कम भागीदारी को देखते हुए इसे तत्काल लागू करना लोकतंत्र के हित में बताया गया है।

पूर्व की टिप्पणियां और कानूनी पेंच

इस मामले की कानूनी पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की थी। उस समय अदालत ने माना था कि कानून में मौजूद उस विशेष प्रावधान को खारिज करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होगा, जिसमें यह निर्धारित है कि महिला आरक्षण का कार्यान्वयन अगली जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही संभव हो पाएगा। हालांकि, याचिकाकर्ता पक्ष का निरंतर यह तर्क रहा है कि देश की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं को उनके संवैधानिक हक के लिए जनगणना जैसी लंबी प्रक्रियाओं का इंतजार नहीं करना चाहिए। क्योंकि इससे उनके राजनीतिक सशक्तिकरण में अनावश्यक देरी हो रही है।

प्रधानमंत्री का पत्र और विशेष सत्र की रूपरेखा

सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई राजनीतिक लिहाज से भी बेहद संवेदनशील मोड़ पर हो रही है। 16 अप्रैल से संसद का विशेष सत्र शुरू होने जा रहा है, जिसमें महिला आरक्षण (संशोधन) विधेयक पर गहन चर्चा की संभावना है। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के दोनों सदनों के सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को एक पत्र लिखकर अपना रुख स्पष्ट किया है। अपने पत्र में प्रधानमंत्री ने वर्ष 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले इस कानून के कार्यान्वयन को सुगम बनाने के लिए सभी दलों से सर्वसम्मति और सहयोग की अपील की है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा है कि भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में विधायी निकायों में महिलाओं की सक्रिय और बड़ी भागीदारी एक अनिवार्य शर्त है।

विपक्ष की आपत्ति और सत्र की टाइमिंग पर सवाल

एक तरफ जहां सरकार इसे ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने संसद के इस विशेष सत्र के समय पर कड़े सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान इस तरह का सत्र बुलाना आदर्श आचार संहिता का सीधा उल्लंघन है। विपक्षी खेमे की ओर से यह मांग भी उठाई जा रही है कि महिला आरक्षण के कार्यान्वयन की दिशा में किसी भी विधायी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले सरकार को परिसीमन के जटिल मुद्दे पर एक सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए। ताकि सभी पक्षों की चिंताओं का समाधान हो सके।

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