
धर्म बदलने से अनुसूचित जनजाति का दर्जा समाप्त नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट
अब शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि ST के मामले में SC जैसी स्थिति नहीं है। क्योंकि इस श्रेणी में जाति कोई निर्धारणकारी कारक नहीं होती। क्या है पूरा मामला जानें
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति (SC) को लेकर दिए गए अपने हालिया अवलोकन अनुसूचित जनजाति (ST) पर लागू नहीं होंगे। कोर्ट ने कुछ ही घंटों पहले कहा था कि केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से जुड़े लोग ही SC का दर्जा पा सकते हैं और किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने पर यह दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है। हालांकि, अब शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि ST के मामले में ऐसा नहीं है। क्योंकि इस श्रेणी में जाति कोई निर्धारणकारी कारक नहीं होती।
अदालत ने यह भी कहा कि केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति ने अपनी जनजातीय सदस्यता खो दी है या नहीं। कोर्ट के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जनजातीय जीवनशैली से पूरी तरह अलग हो जाए और उसे समुदाय की मान्यता भी न मिले, तभी उसका ST दर्जा समाप्त माना जा सकता है।
यह स्पष्टीकरण जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने एक पादरी पर कथित हमले से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान दिया। यह पूरा घटनाक्रम मंगलवार (24 मार्च) का है, जब पहले अवलोकन और फिर स्पष्टीकरण सामने आया।
ST के लिए धर्म आधारित रोक नहीं
पीठ ने कहा कि अनुसूचित जनजाति के संदर्भ में संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में किसी धर्म के आधार पर बहिष्कार का प्रावधान नहीं है, जबकि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में ऐसा प्रावधान मौजूद है। इसलिए ST का दर्जा तय करते समय केवल धर्म परिवर्तन को आधार नहीं बनाया जा सकता। यह देखा जाएगा कि संबंधित व्यक्ति में जनजातीय पहचान के मूल तत्व जैसे, परंपराएं, सामाजिक संरचना, सामुदायिक जीवन और समुदाय द्वारा स्वीकार्यता अब भी मौजूद हैं या नहीं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि धर्म परिवर्तन या बाद के आचरण के कारण कोई व्यक्ति जनजातीय जीवन से पूरी तरह अलग हो जाता है और उसे समुदाय की मान्यता नहीं मिलती, तो उसके ST दर्जे का आधार समाप्त हो सकता है।
पादरी हमले का मामला
यह मामला एक पादरी से जुड़ा है, जिन्होंने कुछ लोगों पर हमले का आरोप लगाते हुए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। हालांकि, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा था कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद उन्हें अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। इसलिए वे इस अधिनियम के तहत संरक्षण पाने के पात्र नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखते हुए SC और ST के मामलों में अंतर भी स्पष्ट किया।
जनजातीय पहचान और निरंतरता
अदालत ने बताया कि जनजाति एक सामाजिक समूह होता है, जिसकी पहचान साझा भाषा, एकीकृत शासन प्रणाली और सामूहिक जीवन से होती है, जैसा कि “स्टेट ऑफ केरल बनाम चंद्रमोहन (2004)” मामले में भी माना गया है।
इसी कारण, ST से जुड़ा संवैधानिक ढांचा जाति या नस्ल का उल्लेख नहीं करता। इस श्रेणी में अधिकार उस जनजाति से निरंतर जुड़ाव पर आधारित होते हैं। हालांकि, यदि धर्म परिवर्तन या लंबे समय तक परंपराओं से दूर रहने के कारण व्यक्ति की पहचान पर सवाल उठता है, तो यह तथ्यात्मक मुद्दा बन जाता है, जिसकी जांच ट्रायल के दौरान की जाएगी।
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद धीरे-धीरे अपनी जनजातीय परंपराओं, रीति-रिवाजों और जीवनशैली से पूरी तरह अलग हो जाता है और नए धर्म की प्रथाओं में पूरी तरह समाहित हो जाता है, तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह अब उस जनजाति का हिस्सा नहीं है।
केवल धर्म परिवर्तन पर्याप्त नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर ST का दर्जा खत्म नहीं किया जा सकता। यह देखा जाएगा कि व्यक्ति अब भी जनजातीय पहचान के आवश्यक तत्वों को बनाए हुए है और समुदाय उसे स्वीकार करता है या नहीं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि ये तत्व स्पष्ट रूप से मौजूद हैं या दोबारा स्थापित हो जाते हैं और समुदाय उन्हें स्वीकार कर लेता है, तो ऐसे मामलों में दावा स्वतः खारिज नहीं किया जा सकता। हर मामले का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर सक्षम प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा।
अंत में, अदालत ने बताया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़े ये दोनों संवैधानिक आदेश क्रमशः अनुच्छेद 341 और 342 के तहत राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए हैं, जिनमें संबंधित जातियों और जनजातियों की पहचान निर्धारित की गई है।

