यूजीसी रूल्स पर ब्रेक, सुप्रीम कोर्ट बोला—75 साल की प्रगति खतरे में
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यूजीसी रूल्स पर ब्रेक, सुप्रीम कोर्ट बोला—75 साल की प्रगति खतरे में

यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। कोर्ट ने भाषा अस्पष्ट बताते हुए सरकार को समीक्षा समिति बनाने और नए नियम लाने की सलाह दी।


यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नए नियमों को सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई तक के लिए रोक दिया है। इन नियमों को लेकर देशभर में विवाद चल रहा था और सवर्ण समाज के कई संगठनों ने इसका विरोध किया था। उनका आरोप था कि नियमों में सवर्ण समाज को पहले से ही दोषी मान लिया गया है और जांच समितियों में उनके प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित नहीं किया गया है।

इसके अलावा एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग को भेदभाव के दायरे में शामिल किए जाने, जबकि जनरल कैटेगरी को बाहर रखने पर भी आपत्ति जताई गई थी। इन दलीलों के साथ प्रदर्शन हुए और अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

अगले आदेश तक रोक, 2012 के नियम लागू रहेंगे

मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिलहाल यूजीसी के इन नियमों पर रोक लगाई जाए। अदालत ने केंद्र सरकार को सलाह दी है कि वह एक समिति का गठन कर इन नियमों की समीक्षा करे और भाषा को स्पष्ट करते हुए नए सिरे से नियम जारी करे। तब तक वर्ष 2012 के पुराने रेगुलेशन ही लागू रहेंगे।

कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 19 मार्च की तारीख तय की है। उस दिन केंद्र सरकार और यूजीसी को यह बताना होगा कि वे नियमों की समीक्षा को लेकर क्या कदम उठा रहे हैं। इस तरह सरकार के पास करीब 50 दिन का समय है।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: समाज में बंटवारे का खतरा

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, अगर हमने हस्तक्षेप नहीं किया तो इसके गंभीर और खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। इससे समाज में विभाजन पैदा होगा। पीठ ने प्रथम दृष्टया माना कि नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इसके दुरुपयोग की आशंका है। कोर्ट ने कहा कि विशेषज्ञों को ऐसी स्पष्ट भाषा के साथ नए नियम तैयार करने चाहिए, जिससे किसी भी वर्ग के खिलाफ बेजा इस्तेमाल न हो सके।

‘क्या हम 75 साल की सामाजिक प्रगति को पीछे ले जा रहे हैं?’

मुख्य न्यायाधीश ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई छात्र दक्षिण भारत से उत्तर भारत में या उत्तर से दक्षिण में पढ़ने जाता है, तो सांस्कृतिक टिप्पणियां दोनों को झेलनी पड़ सकती हैं। अगर जाति की पहचान ही न हो, तो ऐसे मामलों का समाधान किस नियम के तहत होगा यह भी स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत ने 75 वर्षों में वर्गहीन समाज की दिशा में लंबा सफर तय किया है, और यह देखना जरूरी है कि कहीं नए नियम उस प्रगति को उलट तो नहीं रहे।

याचिका में क्या थे मुख्य तर्क

याचिका में कहा गया था कि यूजीसी के नए नियमों में सवर्णों को भेदभाव की स्थिति में शिकायत का अधिकार नहीं दिया गया है, जबकि एससी, एसटी और ओबीसी को यह अधिकार दिया गया है। इससे यह संदेश जाता है कि जनरल कैटेगरी को पहले से ही दोषी मान लिया गया है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) के खिलाफ है।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की थी कि यदि कोई शिकायत झूठी पाई जाती है, तो झूठे आरोप लगाने वालों पर भी कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए।

सेक्शन 3(सी) पर आपत्ति

सुनवाई के दौरान वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि उनकी आपत्ति यूजीसी नियमों के सेक्शन 3(सी) को लेकर है, जिसमें जातिगत भेदभाव की परिभाषा में केवल एससी, एसटी और ओबीसी को शामिल किया गया है, जबकि जनरल कैटेगरी को पूरी तरह बाहर रखा गया है। कोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए सरकार और यूजीसी से विस्तृत जवाब मांगा है।

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