छात्र आत्महत्याओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, विश्वविद्यालयों के लिए बड़े सुधारों का आदेश
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छात्र आत्महत्याओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, विश्वविद्यालयों के लिए बड़े सुधारों का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने NTF रिपोर्ट में सिस्टमैटिक तनावों को उजागर करने के बाद मौतों की अनिवार्य रिपोर्टिंग, स्कॉलरशिप, फैकल्टी की भर्ती और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार का आदेश दिया है।


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छात्र आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों पर गंभीर रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने को देश के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के लिए कड़े निर्देश जारी किए। अदालत ने उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) को छात्रों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और संस्थागत विफलताओं के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है। ये निर्देश उस अंतरिम रिपोर्ट की समीक्षा के बाद जारी किए गए, जो पिछले साल गठित राष्ट्रीय टास्क फोर्स (NTF) ने छात्र आत्महत्याओं के कारणों का अध्ययन करने के बाद सौंपी थी। टास्क फोर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल उच्च शिक्षण संस्थानों में से करीब 65 प्रतिशत संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता (MHSP) उपलब्ध नहीं थे, जबकि 73 प्रतिशत संस्थानों में पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ ही मौजूद नहीं थे।

आत्महत्या युवाओं में मौत का बड़ा कारण

एनटीएफ रिपोर्ट में नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में आत्महत्या, पुरुषों में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण, जबकि महिलाओं में मौत का सबसे बड़ा कारण है। वहीं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, साल 2022 में ही 13,000 से अधिक छात्र आत्महत्याएं दर्ज की गईं।

हर छात्र मृत्यु की सूचना पुलिस को देना अनिवार्य

जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया कि किसी भी छात्र की आत्महत्या या अप्राकृतिक मृत्यु की जानकारी तुरंत पुलिस को दी जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नियम कैंपस, हॉस्टल, पीजी आवास या संस्थान से बाहर हुई किसी भी घटना पर लागू होगा। यह निर्देश ऑफलाइन, डिस्टेंस और ऑनलाइन शिक्षा से जुड़े सभी छात्रों पर समान रूप से लागू होगा। इसके साथ ही संस्थानों को ऐसे मामलों की वार्षिक रिपोर्ट यूजीसी (UGC) या संबंधित नियामक संस्थाओं को सौंपने का भी आदेश दिया गया।

मेडिकल सुविधा 24 घंटे जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हर आवासीय उच्च शिक्षण संस्थान में 24 घंटे योग्य चिकित्सा सहायता* उपलब्ध होनी चाहिए। यदि यह सुविधा कैंपस में संभव न हो तो एक किलोमीटर के दायरे में आपात चिकित्सा सहायता अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराई जाए।

छात्रवृत्ति भुगतान में देरी नहीं चलेगी

अदालत ने छात्रवृत्ति वितरण में देरी को भी गंभीर मुद्दा मानते हुए निर्देश दिया कि सभी लंबित छात्रवृत्तियां चार महीने के भीतर जारी की जाएं। यदि किसी कारण से भुगतान नहीं हो पा रहा है तो दो महीने के भीतर कारण बताकर छात्र और संस्थान दोनों को सूचना दी जाए। अदालत ने सख्ती से कहा कि प्रशासनिक देरी के कारण किसी भी छात्र को परीक्षा से रोका नहीं जाएगा, हॉस्टल से नहीं निकाला जाएगा, कक्षाओं में बैठने से नहीं रोका जाएगा, न ही मार्कशीट या डिग्री रोकी जाएगी।

चार महीने में खाली पद भरने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को निर्देश दिया कि शिक्षण और गैर-शिक्षण स्टाफ के सभी खाली पद चार महीने के भीतर भरे जाएं, विशेष रूप से हाशिए पर मौजूद समुदायों और दिव्यांगों (PwDs) के लिए आरक्षित पदों को प्राथमिकता दी जाए। इसके अलावा कुलपति, रजिस्ट्रार और अन्य प्रमुख प्रशासनिक पदों पर भी चार महीने के भीतर नियुक्ति करने को कहा गया है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में कोई भी पद खाली होने पर एक महीने के भीतर उसे भरने की प्रक्रिया पूरी की जाए।

रैगिंग, भेदभाव और यौन उत्पीड़न पर सख्ती

अदालत ने रैगिंग, भेदभाव, यौन उत्पीड़न और शिकायत निवारण से जुड़े मौजूदा नियमों के सख्त पालन का आदेश दिया। इसमें एंटी-रैगिंग कमेटी, समान अवसर प्रकोष्ठ, आंतरिक शिकायत समिति और छात्र शिकायत निवारण तंत्र का प्रभावी ढंग से काम करना अनिवार्य किया गया है।

संस्थान जिम्मेदारी से नहीं बच सकते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई संस्थान आत्महत्याओं के मामलों में व्यक्तिगत कारणों को जिम्मेदार ठहराकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं, जो स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि संस्थागत स्तर पर मौजूद दबाव, तनाव और व्यवस्थागत खामियों पर आत्ममंथन नहीं किया जाता। लेकिन किसी भी स्थिति में उच्च शिक्षण संस्थान अपनी यह मूल जिम्मेदारी नहीं छोड़ सकते कि वे छात्रों के लिए सुरक्षित, समान, समावेशी और अनुकूल सीखने का माहौल प्रदान करें।

पढ़ाई का दबाव भी बड़ी वजह

एनटीएफ ने छात्र तनाव के प्रमुख कारणों के रूप में बेहद सख्त उपस्थिति नियम, पाठ्यक्रम का अत्यधिक बोझ, परीक्षा मूल्यांकन प्रणाली, शिक्षकों की कमी, अतिथि शिक्षकों पर अत्यधिक निर्भरता और पारदर्शी प्लेसमेंट प्रक्रिया की कमी को जिम्मेदार ठहराया है।

टास्क फोर्स का दायरा बढ़ाया

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय टास्क फोर्स को निर्देश दिया कि वह कैंपस वेल-बीइंग ऑडिट, शिक्षकों की संवेदनशीलता ट्रेनिंग, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करे। अदालत का उद्देश्य छात्र आत्महत्या रोकथाम और कल्याण के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय ढांचा तैयार करना है।

सर्वे में कम भागीदारी पर नाराजगी

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि देश के 60,383 उच्च शिक्षण संस्थानों में से केवल 3.5 प्रतिशत ने ही एनटीएफ के सर्वे में हिस्सा लिया। अदालत ने कहा कि यह उदासीन रवैया दर्शाता है कि छात्र मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी राष्ट्रीय पहल को लागू करने में कितनी बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं।

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