
परमानेंट कमीशन से वंचित महिला अधिकारियों को मिले पेंशन: सुप्रीम कोर्ट
अधिकारियों को “मान लिया जाएगा” कि उन्होंने पेंशन के लिए आवश्यक न्यूनतम 20 वर्ष की सेवा पूरी कर ली है, भले ही उन्हें पहले ही सेवा से मुक्त कर दिया गया हो...
मंगलवार (24 मार्च) को एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सेना, नौसेना और वायु सेना की महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) अधिकारियों के पक्ष में निर्णय दिया। इन अधिकारियों को मनमाने आकलन के आधार पर परमानेंट कमीशन (PC) से वंचित किया जा रहा था। अब उन्हें पूर्ण पेंशन लाभ दिए जाएंगे।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां तथा एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि इन अधिकारियों को “मान लिया जाएगा” कि उन्होंने पेंशन के लिए आवश्यक न्यूनतम 20 वर्ष की सेवा पूरी कर ली है, भले ही उन्हें पहले ही सेवा से मुक्त कर दिया गया हो।
यह फैसला कई याचिकाओं पर आया, जिनमें विंग कमांडर सुचेता एदान और अन्य द्वारा दायर याचिकाएं भी शामिल थीं। इन याचिकाओं में 2019 की नीतिगत बदलावों और सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) के पूर्व निर्णयों के आधार पर परमानेंट कमीशन से वंचित किए जाने को चुनौती दी गई थी।
आकलन में खामियां
फैसले के मुख्य अंश पढ़ते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि महिला अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACRs) अक्सर “लापरवाही से” तैयार की जाती थीं, इस धारणा के साथ कि उन्हें करियर में आगे बढ़ने या परमानेंट कमीशन का अवसर नहीं मिलेगा।
उन्होंने कहा, “ACRs इस अनुमान के साथ लिखी गई थीं कि उन्हें करियर प्रगति नहीं मिलेगी, जिससे उनकी कुल योग्यता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।”
पीठ ने वायु सेना, नौसेना और सेना की SSC महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन से वंचित किए जाने के मुद्दों पर अलग-अलग विचार किया।
वायु सेना
वायु सेना के संदर्भ में पीठ ने पाया कि 2019 में लागू किए गए “सेवा अवधि मानदंड” और “न्यूनतम प्रदर्शन मानदंड” जल्दबाजी में लागू किए गए थे, जिससे अधिकारियों को उन्हें पूरा करने का उचित अवसर नहीं मिला।
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए, पीठ ने कहा कि एक बार के उपाय के रूप में साल 2019, 2020 और 2021 में आयोजित चयन बोर्डों में परमानेंट कमीशन के लिए विचार किए गए सभी SSC अधिकारियों को, जिसमें साल 2021 में सेवा से मुक्त किए गए अधिकारी भी शामिल हैं, इन्हें 20 वर्ष की पात्र सेवा पूरी करने वाला माना जाएगा।
अदालत ने कहा कि पेंशन इसी 20 वर्ष की मानी गई सेवा के आधार पर तय की जाएगी, जो 1 नवंबर 2025 से प्रभावी होगी।
हालांकि, अदालत ने “संचालनात्मक प्रभावशीलता” का हवाला देते हुए पुनर्नियुक्ति (reinstatement) का आदेश देने से इनकार किया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि इसे वित्तीय लाभ से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
सेना और नौसेना
सेना और नौसेना से जुड़े मामलों में भी अदालत ने आकलन प्रणाली में इसी तरह की खामियां पाईं और कहा कि मूल्यांकन मानदंडों को सार्वजनिक न करने से इन अधिकारियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। अदालत ने सेवा में न होने वाले अधिकारियों को विंग कमांडर के पद पर काल्पनिक समय-मान पदोन्नति देने की मांग को खारिज कर दिया।
विस्तृत फैसला आना अभी बाकी है।
केंद्र का पक्ष
इससे पहले केंद्र सरकार ने अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा था कि सेना की प्रक्रियाएं लैंगिक रूप से तटस्थ हैं और “बलों को युवा बनाए रखने के लिए चयन से बाहर करना नीति का हिस्सा है।”
(एजेंसी इनपुट के साथ)

