
अस्तित्व का संकट: कानून संशोधन से फिर चिंता में ट्रांसजेंडर समुदाय
राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद (NCTP) की सदस्य कल्कि सुब्रमण्यम कहती हैं, इतने महत्वपूर्ण विधेयक से पहले हमें जानकारी दी जानी चाहिए थी और हमारी राय ली...
परस डोगरा ने जीवन के बहुत शुरुआती दौर में, किशोरावस्था से पहले ही यह महसूस कर लिया था कि उनका अस्तित्व जन्म के समय उन्हें दी गई महिला पहचान के साथ मेल नहीं खाता। किशोरावस्था में उन्होंने अपने भीतर की पहचान के अनुरूप खुद को ढालने की कोशिश की। उन्हें छाती से जुड़ी असहजता (चेस्ट डिस्फोरिया) थी। यानी छाती के आकार, बनावट या स्वरूप से असंतोष, जिसके कारण वे बाइंडर का इस्तेमाल करते थे ताकि वे अपने वास्तविक स्वरूप के करीब महसूस कर सकें। जब उन्होंने अपने परिवार के सामने अपनी पहचान साझा करने की कोशिश की तो उन्हें भावनात्मक और शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा।
डोगरा, जो खुद को नॉन-बाइनरी और ट्रांसजेंडर के रूप में पहचानते हैं, बताते हैं कि “वर्षों तक अपने वास्तविक जीवन को जीने के संघर्ष के बाद मुझे घर छोड़ना पड़ा। क्योंकि मुझे पता चला कि वे मेरी शादी एक सिसजेंडर पुरुष से कराने की योजना बना रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर मैं ‘पुरुषों जैसे’ कपड़े पहनना जारी रखूंगा तो वे मेरी उच्च शिक्षा का खर्च नहीं उठाएंगे।”
साल 2019 की शुरुआत में, कुछ ऑनलाइन मित्रों की मदद और एक सरकारी संगठन के सहयोग से, डोगरा राजस्थान से भागकर केरल के एक आश्रय गृह में पहुंचे।
यह समय संयोग नहीं था। उसी वर्ष ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 लागू हुआ था, जिसने व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने का अधिकार दिया। डोगरा के लिए यह केवल एक कानूनी बदलाव नहीं था। इस अधिनियम और केरल सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के सहारे वे ऐसे दस्तावेज हासिल कर पाए, जो उनकी पहचान को दर्शाते थे।
सात साल बाद, यह संतुलन अब खतरे में है।
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026, जिसे इस महीने संसद में पेश किया गया और मंगलवार (24 मार्च) को लोकसभा में पारित कर दिया गया, स्वयं-परिचय के अधिकार से पीछे हटता है। यह कानूनी मान्यता को सीमित कर हिजड़ा, किन्नर, अरावणी या जोगती जैसी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों तक सीमित कर देता है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे बड़ी संख्या में ट्रांस पुरुषों, ट्रांस महिलाओं और नॉन-बाइनरी व्यक्तियों को कानूनी पहचान से बाहर किया जा सकता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, विधेयक पर चर्चा के दौरान सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने कहा कि यह संशोधन सुनिश्चित करता है कि “केवल वे लोग, जिन्हें जैविक कारणों से सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है,” कानून के तहत संरक्षित हों।
आरोप है कि इस विधेयक को राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद (NCTP) से परामर्श किए बिना संसद में पेश किया गया और पेश होने के बाद भी मंत्री ने परिषद के साथ बैठक में भाग नहीं लिया।
परिषद की सदस्य कल्कि सुब्रमण्यम कहती हैं, “यह मंत्रालय की ओर से गंभीर संवादहीनता को दर्शाता है। हम देशभर के प्रतिनिधि हैं, जिनमें ट्रांस समुदाय के सदस्य और विशेषज्ञ शामिल हैं। इतने महत्वपूर्ण विधेयक से पहले हमें जानकारी दी जानी चाहिए थी और हमारी राय ली जानी चाहिए थी।”
वे आगे कहती हैं, “यह पूरी तरह अस्वीकार्य है। जब हमें आपात बैठक के लिए बुलाया गया, तो मंत्री आए ही नहीं। वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार के जवाबों से स्पष्ट था कि उन्हें ट्रांस मुद्दों की समझ नहीं है।”
डोगरा के लिए यह बदलाव सीधे उनके जीवन को प्रभावित करता है, जो हाल ही में स्थिर होना शुरू हुआ था।
केरल में उन्हें केवल संस्थागत पहचान ही नहीं मिली बल्कि एक नया परिवार भी मिला। आश्रय गृह में मिली एक हिजड़ा अब उनकी “मां” हैं, जिनके साथ वे तमिलनाडु के कोयंबटूर में रहते हैं। वर्षों तक बाइंडर का उपयोग करने और डिस्फोरिया से जूझने के बाद वे टॉप सर्जरी की तैयारी कर रहे थे।
वे कहते हैं, “मेरी मां ने मेरे ऑपरेशन के लिए मेडिकल लोन लिया था। अब मुझे नहीं पता कि मैं यह सर्जरी करवा पाऊंगा या नहीं, क्योंकि मैं ट्रांस और नॉन-बाइनरी हूं और सरकार की परिभाषा में फिट नहीं बैठता। खुद को स्वीकार करने में मुझे सालों लगे। अब सरकार हमें फिर से सीमाओं में बांधना चाहती है।”
सुप्रीम कोर्ट की वकील अवनि बंसल भी इसे इसी तरह देखती हैं। “यह संशोधन स्पेक्ट्रम से हटकर लोगों को सीमित खांचों में बांधता है। यह ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स के बीच अंतर की बुनियादी समझ की कमी दिखाता है। साथ ही, यह लिंग (जेंडर) और जैविक सेक्स के अंतर को नजरअंदाज करता है।”
यह बदलाव पिछले एक दशक की यात्रा के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) बनाम भारत संघ फैसले ने लैंगिक पहचान को जन्मजात माना और स्वयं-परिचय के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया। कई लोगों के लिए यह पहली बार था जब कानून ने उनकी पहचान को मान्यता दी।
देहरादून के ट्रांस पुरुष और कार्यकर्ता शमन गुप्ता बताते हैं कि उन्होंने फेसबुक पर इस फैसले के बारे में पढ़ा था। “तब मैं समुदाय से जुड़ा नहीं था। जब मैंने पढ़ा कि पहचान जन्मजात होती है तो मुझे बहुत राहत मिली। उसी के बाद मैंने सामाजिक रूप से ट्रांजिशन करना शुरू किया और बाद में अपने परिवार को भी बताया।”
उन्होंने इस फैसले के आधार पर अपने कानूनी दस्तावेज बनवाए, यहां तक कि 2019 के अधिनियम से पहले ही।
हैदराबाद की ट्रांस महिला लिलियन होप कहती हैं कि 2019 के कानून ने उन्हें सामने आने का साहस दिया। “नालसा फैसला था, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर उसका असर नहीं दिखता था। 2019 के कानून के बाद ट्रांसजेंडर आईडी कार्ड बनवाना संभव हुआ।”
गुरुग्राम की ट्रांस महिला सोफी कहती हैं, “स्वयं-परिचय ने मुझे रोजमर्रा की जगहों पर, जैसे मेट्रो में, अपनी पहचान के साथ जीने का अधिकार दिया। इससे जीवन आसान हुआ।” लेकिन अब यह सब अनिश्चितता के घेरे में है।
नए विधेयक में कुछ अपराधों के लिए सजा बढ़ाने का प्रावधान भी है, जिसमें किसी को ट्रांसजेंडर बनने के लिए “प्रलोभन” या “मजबूर” करने पर पांच साल तक की सजा हो सकती है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह भाषा अस्पष्ट है और इससे समुदाय के लोगों या उनके सहयोगियों को भी अपराधी बनाया जा सकता है।
स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है। ट्रांसजेंडर हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सीईओ डॉ. संजय शर्मा कहते हैं कि भारत में अधिकांश डॉक्टर अभी भी लैंगिक पहचान को द्विआधारी दृष्टिकोण से देखते हैं, जिससे गैर-द्विआधारी लोगों के लिए इलाज मुश्किल हो सकता है।
वे कहते हैं, “अगर डॉक्टर नैतिक इलाज देता है तो कानून के तहत सजा का खतरा है और अगर सरकार की परिभाषा माने तो मानक इलाज से समझौता करना पड़ेगा। यह एक असंभव स्थिति है।”
मुंबई की क्वीयर थेरेपिस्ट आंचल नारंग कहती हैं कि पहले ही ट्रांजिशन की प्रक्रिया जटिल थी, ऐसे में नियम और कठोर करना तर्कसंगत नहीं है।
इस विधेयक ने पहचान के अधिकार को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इसमें ट्रांसजेंडर पहचान के लिए सर्जरी और मेडिकल बोर्ड की अनिवार्यता शामिल की गई है। समुदाय के लोग इसका विरोध कर रहे हैं।
लिलियन होप कहती हैं, “मैं तय करूंगी कि मुझे कौन-सी सर्जरी चाहिए। सरकार यह तय नहीं कर सकती।”
मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका असर दिख रहा है। कई लोग भय और चिंता में हैं, कुछ में आत्महत्या के विचार भी बढ़ रहे हैं।
सोफी कहती हैं, “मैं पिछले पांच साल से अपने दस्तावेज बनवाने में लगी हूं। अब डर है कि कहीं यह सब खत्म न हो जाए। अगर स्वयं-निर्णय का अधिकार खत्म हो गया तो क्या मैं फिर से बिना पहचान की हो जाऊंगी?”
वकील अवनि बंसल बताती हैं कि विधेयक में पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) का प्रावधान है, जिससे पहले जारी पहचान पत्र भी दोबारा जांच के दायरे में आ सकते हैं। इस बीच, विरोध भी बढ़ रहा है। कई सांसदों और संगठनों ने इस विधेयक का विरोध किया है।
डोगरा और उनके जैसे कई लोगों के लिए यह केवल कानून का सवाल नहीं बल्कि अस्तित्व, पहचान और भविष्य का सवाल बन गया है।

