अमेरिकी आयात का खेल, डेयरी फायदे में लेकिन नुकसान में सोयाबीन किसान
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अमेरिकी आयात का खेल, डेयरी फायदे में लेकिन नुकसान में सोयाबीन किसान

शेतकारी संघटना का कहना है कि अमेरिका से सस्ते DDGS आयात से डेयरी व मांस उद्योग को फायदा होगा, लेकिन सोयाबीन किसानों की आय पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका है।


अमेरिका से सूखे डिस्टिलर्स ग्रेन्स विद सॉल्यूबल्स (DDGS) का शून्य या बेहद कम आयात शुल्क पर आयात भारत के दूध और मांस उद्योग की उत्पादन लागत को तो घटाएगा। लेकिन इससे देश के सोयाबीन किसानों को बड़ा झटका लग सकता है। DDGS मक्का, ज्वार और चावल से अल्कोहल उत्पादन के दौरान बनने वाला उप-उत्पाद है, जिसमें यीस्ट या एंजाइम के जरिए स्टार्च को अल्कोहल में बदला जाता है।DDGS प्रोटीन और ऊर्जा से भरपूर होता है और इसे गाय-भैंस, सूअर, पोल्ट्री और मछलियों के लिए पसंदीदा पशु आहार माना जाता है।

DDGS की बढ़ती मांग

DDGS की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके आयात और घरेलू उत्पादन के लिए बड़ी संख्या में आवेदन जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेज़ल कमेटी (GEAC) के पास पहुंचे हैं। यह नियामक संस्था इसलिए जुड़ी है क्योंकि आयातित DDGS जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) मक्का से बनाए जाते हैं।

अमेरिका से कम या शून्य शुल्क पर अनाज आधारित पशु आहार की अनुमति देना भारतीय किसानों के लिए अनुचित होगा, क्योंकि अमेरिका अपनी कृषि को कई रूपों में भारी सब्सिडी देता है। भारत में भी यूरिया, बिजली और पानी जैसे इनपुट्स पर सब्सिडी दी जाती है, लेकिन यह अमेरिकी कृषि को मिलने वाले समर्थन के मुकाबले काफी कम है।

भारत की GM नीति और DDGS

भारत में GM मक्का के घरेलू उत्पादन की अनुमति नहीं है। हालांकि, पेट्रोल में मिलाए जाने वाले एथेनॉल के लिए मक्का या चावल से अधिक कुशल अल्कोहल उत्पादन हेतु GM यीस्ट स्ट्रेन के उपयोग की अनुमति दी गई है। भारत की जेनेटिक मॉडिफिकेशन नीति काफी सख्त रही है। DDGS के आयात को लेकर 2017 में ड्राफ्ट गाइडलाइंस तैयार की गई थीं, जिन्हें 2018 में GEAC ने मंजूरी दी थी। पिछले साल जुलाई में हुई बैठक में इन दिशानिर्देशों को अपडेट करने का फैसला लिया गया, जिन्हें भारत–अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे के तहत जल्द अधिसूचित किया जा सकता है।

अमेरिकी DDGS की गुणवत्ता को लेकर सकारात्मक राय

वेंकटेश्वरा हैचरीज के जनरल मैनेजर और नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी के सीईओ के.जी. आनंद अमेरिकी DDGS की गुणवत्ता से प्रभावित हैं। उनके मुताबिक, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल द्वारा दिखाए गए सैंपल्स में अफ्लाटॉक्सिन का स्तर कम था। उन्होंने बताया कि भारत में DDGS आमतौर पर धूप में सुखाए गए मक्के से बनता है, जबकि अमेरिका में मशीन से सुखाए गए मक्के का इस्तेमाल होता है, जिससे गुणवत्ता बेहतर रहती है।

सोयाबीन मील से सस्ता पड़ेगा DDGS

आयातित DDGS, सोयाबीन डी-ऑयल्ड केक की तुलना में सस्ता पड़ेगा। इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका में मक्का की उत्पादकता है, जो प्रति हेक्टेयर 11 टन है, जबकि भारत में औसतन 3.4 टन (तमिलनाडु में 6.7 टन) है। अमेरिकी मक्का GM होता है। हालांकि, मक्का अनाज के रूप में आयात की अनुमति नहीं होगी, लेकिन उससे बने पशु आहार को भारत–अमेरिका संयुक्त बयान के अनुसार मंजूरी दी जाएगी। इसके लिए भारत को GM अनाज उत्पादों पर अपने गैर-शुल्क बाधाओं (नॉन-टैरिफ बैरियर्स) में भी ढील देनी होगी।

सोयाबीन किसानों पर सीधा असर

DDGS के आयात से पशु आहार के दाम गिरने की आशंका है, जिससे सोयाबीन की खेती केवल सबसे कुशल किसानों के लिए ही लाभकारी रह जाएगी। भारत में लगभग 1.3 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की खेती होती है, मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में। सोयाबीन मुख्यतः पशु आहार की फसल है, हालांकि इससे तेल भी निकलता है। इसमें 36 से 56 प्रतिशत तक प्रोटीन होता है, जबकि तेल की मात्रा 18 से 22 प्रतिशत होती है। 46 प्रतिशत प्रोटीन वाला डी-ऑयल्ड सोयाबीन केक फिलहाल करीब 43 रुपये प्रति किलो बिकता है।

घरेलू और अमेरिकी DDGS की कीमत

देश में डिस्टिलरी घरेलू मक्का से बने 27 प्रतिशत प्रोटीन वाले DDGS को लगभग 24 रुपये प्रति किलो में बेच रही हैं। समान प्रोटीन देने के लिए भले ही इसकी मात्रा अधिक लगे, फिर भी यह सोयाबीन केक से सस्ता पड़ता है। अमेरिकी DDGS इससे भी सस्ता होगा। महाराष्ट्र की शेतकरी संगठन के पूर्व अध्यक्ष अनिल घनवट का कहना है कि DDGS का आयात किसानों के लिए बड़ा झटका होगा, क्योंकि सोयाबीन के दाम अब तक उसके तेल-खल (मील) की वजह से टिके हुए थे।

पहले भी झेल चुका है सोयाबीन सेक्टर झटका

सोयाबीन से 20 प्रतिशत तेल और 80 प्रतिशत खल निकलता है। 2020 से 2024 के बीच भारत में सोयाबीन की कीमतें ज्यादातर समय वैश्विक कीमतों से ऊपर रहीं। लेकिन 2021 की चौथी तिमाही में कीमतें तेजी से गिरीं, जब घरेलू कमी को पूरा करने के लिए GM सोयाबीन मील के आयात की अनुमति दी गई थी।

तेल आयात से भी बढ़ेगा दबाव

सोयाबीन के दाम पर अमेरिका से शून्य या कम शुल्क पर सोयाबीन तेल आयात का भी असर पड़ेगा। फिलहाल सोयाबीन तेल पर 16.5 प्रतिशत आयात शुल्क है। पिछले तेल वर्ष (नवंबर–अक्टूबर) में भारत के कुल खाद्य तेल आयात में सोयाबीन तेल की हिस्सेदारी 34 प्रतिशत रही, जो उससे पिछले वर्ष 22 प्रतिशत थी। पाम ऑयल सस्ता होने के कारण अब भी ज्यादा आयात होता है, लेकिन भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के लागू होते ही सोयाबीन तेल का आयात और बढ़ना तय माना जा रहा है।

क्यों इसे कहा जा रहा है अनुचित सौदा

अमेरिका से कम या शून्य शुल्क पर अनाज आधारित पशु आहार की अनुमति भारतीय किसानों के लिए अनुचित मानी जा रही है, क्योंकि अमेरिका अपनी कृषि को ऐसे तरीकों से सब्सिडी देता है, जिन्हें वह ट्रेड-डिस्टॉर्टिंग नहीं मानता।भारत भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के जरिए किसानों की मदद करता है, लेकिन इसका लाभ मुख्य रूप से गेहूं और धान किसानों तक सीमित है। इनपुट सब्सिडी भी अमेरिकी स्तर के समर्थन की बराबरी नहीं कर सकती।

इसलिए आशंका जताई जा रही है कि DDGS का सस्ता आयात भारतीय सोयाबीन किसानों की आर्थिक स्थिति को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है, जबकि डेयरी और मांस उद्योग को इससे तात्कालिक लाभ मिलेगा।

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