
रूसी तेल मुद्दे पर उठे सवाल, क्या भारत पर अमेरिका बना रहा दबाव?
रूसी तेल खरीद पर अमेरिका की अनुमति वाले बयान से भारत-अमेरिका रिश्तों पर बहस छिड़ चुकी है। विशेषज्ञ इसे दबाव, रणनीति और भारत की स्वायत्तता के सवाल से जोड़े रहे हैं।
अमेरिका द्वारा भारत को अस्थायी रूप से रूसी तेल खरीदने की “अनुमति” दिए जाने संबंधी बयान ने भारत-अमेरिका संबंधों पर नई बहस छेड़ दी है। चर्चा के दौरान एक तीखी प्रतिक्रिया सामने आई— “साझेदारी का मतलब अनुमति नहीं होता। भारत को तेल खरीदने की अनुमति देने वाले आप कौन होते हैं?”
यह प्रतिक्रिया उस समय सामने आई जब वाशिंगटन ने कहा कि उसने मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के बीच वैश्विक ऊर्जा बाज़ार को कथित रूप से बंधक बनाने की ईरान की कोशिश को रोकने के लिए भारत को अस्थायी तौर पर रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी है। साथ ही अमेरिका ने यह भी उम्मीद जताई कि भारत उसके तेल की खरीद को भी बढ़ाएगा।
इसी मुद्दे पर “AI With Sanket” कार्यक्रम में इस लेखक ने पूर्व राजदूत मनजीव पुरी, अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा और राजनीतिक विश्लेषक आकृति भाटिया के साथ एक पैनल चर्चा की। चर्चा में यह सवाल उठाया गया
कि अमेरिका के हालिया बयान और कदम क्या रणनीतिक कूटनीति का हिस्सा हैं, प्रभुत्ववादी दबाव हैं या फिर भारत के साथ संबंधों में संतुलन बनाने की जटिल कोशिश।
पैनल ने यह समझने की भी कोशिश की कि क्या वाशिंगटन का लहजा दोनों देशों के रिश्ते में किसी गहरे असंतुलन का संकेत देता है और भारत के पास क्या विकल्प हैं, जब वह आर्थिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक साझेदारियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
अमेरिका एक प्रभुत्वशाली शक्ति
पूर्व राजदूत मनजीव पुरी ने कहा कि अमेरिका के व्यवहार से भारत को हैरान नहीं होना चाहिए, क्योंकि इतिहास में वाशिंगटन अक्सर एक प्रभुत्वशाली (हेजेमोनिक) शक्ति की तरह काम करता रहा है।उन्होंने कहा, “संयुक्त राज्य अमेरिका एक प्रभुत्वशाली शक्ति है। ऐसे सिस्टम में साझेदारों को बराबरी का दर्जा शायद ही मिलता है।”
पुरी के अनुसार अमेरिका अक्सर सहयोगियों को ऐसे देशों के रूप में देखता है जो उसकी नीतियों का समर्थन करें। “वे सहयोगियों को ऐसे मानते हैं जो उनकी बात मानें। उन्हें वास्तव में बराबरी के साझेदार के रूप में नहीं देखते।”
उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई देश अमेरिका के साथ करीबी रणनीतिक संबंध बनाता है तो उसे शक्ति असंतुलन की इस वास्तविकता को भी स्वीकार करना पड़ता है।
घरेलू राजनीति का असर
पुरी ने यह भी बताया कि अमेरिका की घरेलू राजनीति भी उसकी कूटनीतिक भाषा और फैसलों को प्रभावित करती है। रूस के मुद्दे पर अमेरिका में लगभग सभी दलों की एक जैसी सोच है।उन्होंने कहा, “डोनाल्ड ट्रंप को छोड़ दें तो अमेरिका में लगभग हर राजनीतिक धड़ा रूस को दुनिया के लिए बड़ी समस्या मानता है।”
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका में लिखित दस्तावेजों और आधिकारिक बयानों का बहुत महत्व होता है। “भारत में हम व्हाट्सऐप समाज बन गए हैं, लेकिन अमेरिका में प्रणाली टेक्स्ट और ईमेल पर चलती है। लिखित शब्द बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस वजह से कई ऐसी बातें भी आधिकारिक रिकॉर्ड में आ जाती हैं, जिन्हें दूसरे देश निजी बातचीत तक सीमित रखना पसंद करते।
‘बुलिंग’ का आरोप
अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा ने अमेरिका के रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए इसे “बुलिंग” बताया। उन्होंने कहा, “हम पहले भी प्रभुत्व का सामना कर चुके हैं, लेकिन मौजूदा अमेरिकी प्रशासन का रवैया दबाव बनाने वाला है। मेहरोत्रा का मानना है कि भारत को अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं में अधिक स्पष्ट और धैर्यपूर्ण रणनीति अपनानी चाहिए। उनके अनुसार अंतरिम समझौते ऐसे दिखाई देते हैं जो अधिकतर व्हाइट हाउस के हित में हैं।
उन्होंने कहा कि भारत को जल्दबाज़ी में समझौते करने के बजाय बातचीत को लंबा खींचना चाहिए, क्योंकि इस साल नवंबर में होने वाले अमेरिकी मिडटर्म चुनाव शक्ति संतुलन को बदल सकते हैं।
ऊर्जा पर दबाव
मेहरोत्रा ने भारत के ऊर्जा आयात को लेकर भी चिंता जताई। उनके अनुसार बाहरी दबाव के कारण भारत ने रूसी तेल की खरीद पहले ही कुछ हद तक कम कर दी है। उन्होंने कहा, “हम लगभग 10 लाख मीट्रिक टन तेल आयात कर रहे थे, जो अब करीब 8 लाख मीट्रिक टन रह गया है। हालांकि कुछ कमी निजी रिफाइनरियों के निर्णयों के कारण हो सकती है, लेकिन उन्होंने सवाल उठाया कि सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरियां भी उसी दिशा में क्यों जा रही हैं।
रणनीतिक संतुलन की चुनौती
राजनीतिक विश्लेषक आकृति भाटिया ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में देखा।उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ सीमाओं की सुरक्षा नहीं है। ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा भी संप्रभु निर्णय हैं।”
भाटिया के अनुसार अमेरिका का दबाव केवल ऊर्जा आयात तक सीमित नहीं है, बल्कि रक्षा साझेदारी और भू-राजनीतिक रुख जैसे कई क्षेत्रों में दिखाई देता है।उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि पश्चिम एशिया में बदलते कूटनीतिक समीकरण भारत की स्थिति को और जटिल बना सकते हैं।
तकनीक और निवेश का महत्व
हालांकि आलोचनाओं के बावजूद मनजीव पुरी ने यह भी कहा कि भारत का अमेरिका की ओर झुकाव पूरी तरह राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक जरूरतों से भी जुड़ा है।उन्होंने कहा, “अगर भारत को तेजी से विकास करना है और अपनी क्षमता बढ़ानी है तो तकनीक और पूंजी के बिना यह संभव नहीं है।”
उनके अनुसार अमेरिका अभी भी उन्नत तकनीक और निवेश का एक बड़ा स्रोत है। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी घोषणाओं का उदाहरण देते हुए अमेज़न, गूगल और ओपनएआई जैसी कंपनियों के साथ सहयोग को महत्वपूर्ण बताया।
चीन का प्रभाव
पुरी ने यह भी कहा कि भारत-अमेरिका साझेदारी का एक बड़ा कारण चीन भी है।उनके अनुसार भारत के कई रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए अमेरिका के साथ करीबी संबंध जरूरी हैं।हालांकि उन्होंने यह भी माना कि इससे कुछ नई दुविधाएं पैदा होती हैं, खासकर तब जब अमेरिकी नीतियां भारत के स्वतंत्र हितों से टकराती हैं।
अंतिम निर्णय राजनीतिक
पुरी ने स्पष्ट किया कि इन सभी मुद्दों पर अंतिम निर्णय कूटनीतिज्ञ नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व करता है।उन्होंने कहा, “यह कूटनीति का सवाल नहीं है। यह सरकार के सर्वोच्च स्तर पर लिए जाने वाले विदेश नीति के निर्णय हैं। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका के हालिया बयानों पर भारत की ओर से किसी न किसी रूप में प्रतिक्रिया जरूर आएगी, लेकिन वह संभवतः शालीन और कूटनीतिक होगी।
साझेदारी बनाम अनुमति
चर्चा अंततः उसी विवाद पर आकर खत्म हुई—भारत को रूसी तेल खरीदने की “अनुमति” देने वाली भाषा।आलोचकों के लिए यह शब्दावली दोनों देशों के संबंधों में असंतुलन का प्रतीक है। इस बहस ने भारत के सामने खड़े एक बड़े सवाल को फिर उजागर किया है—आर्थिक रूप से उभरते हुए देश के रूप में वह वैश्विक शक्तियों के साथ साझेदारी को मजबूत करते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता कैसे बनाए रखे।
पैनल के विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में यही संतुलन भारत की कूटनीति की सबसे जटिल चुनौतियों में से एक रहेगा।

