युद्ध की कवरेज या डर का कारोबार? : टीवी चैनलों पर बड़ा सवाल, TRP पर क्यों लगी रोक?
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युद्ध की कवरेज या डर का कारोबार? : टीवी चैनलों पर बड़ा सवाल, TRP पर क्यों लगी रोक?

ईरान युद्ध के कवरेज को लेकर सरकार को आखिरकार भारतीय टीवी न्यूज चैनलों पर सख्ती करनी पड़ी है। सरकार ने टेलीविजन रेटिंग पॉइंट्स (TRP) पर फिलहाल चार हफ्ते की रोक लगा दी है। आखिर इसके मायने क्या हैं? द फेडरल के शो “AI with Sankit” में पत्रकार संकेत उपाध्याय ने द फेडरल के एडिटर-इन-चीफ एस श्रीनिवास से इस पर विस्तार से बात की।


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सरकार ने टीवी चैनलों के रेटिंग्स सिस्टम पर चार हफ्ते की रोक इसलिए लगाई क्योंकि उसने प्राइवेट टीवी न्यूज चैनलों पर युद्ध का माहौल बनाने, भ्रम फैलाने और दहशत फैलाने का आरोप लगाया है। सरकार का मानना है कि ये चैनल खासकर यूएई की स्थिति और ईरान-अमेरिका युद्ध की कवरेज के दौरान फर्जी खबरें और गलत नैरेटिव फैलाकर लोगों के साथ अन्याय कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कदम टीवी न्यूज मीडिया की समस्या को ठीक कर पाएगा?

संकेत : सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा और इसी कारण उसने टीवी रेटिंग पॉइंट्स पर रोक लगा दी, क्योंकि उसका मानना है कि लगभग सभी टीवी चैनल युद्ध का माहौल बनाने में लगे हुए हैं। सरकार के इस सर्कुलर के बारे में आपकी क्या राय है?

एस. श्रीनिवास: असल में TRP एक मापने का साधन है कि कौन-सा चैनल कितना और किस तरह का कंटेंट दिखा रहा है। यानी यह मूल रूप से एक एनालिटिकल मेट्रिक था। लेकिन समय के साथ यह इतना व्यावसायिक हो गया कि कई मामलों में यह उन लोगों के हाथों में एक हथियार बन गया जो इसका गलत इस्तेमाल कर सकते हैं। अब इसे इस तरह देखा जाने लगा है कि यह किसी न्यूज चैनल की परफॉर्मेंस तय करता है। इसका असर यह हुआ कि एडिटोरियल कंटेंट ही विकृत होने लगा। इससे एक अजीब स्थिति पैदा हो गई है, जहां हमें समझ ही नहीं आता कि पत्रकारिता की असली दिशा क्या है।

पत्रकारिता का काम लोगों को सूचित करना, शिक्षित करना और समाज में एक समझ विकसित करना होता है। इसका मतलब लोगों की सोच को बदलना नहीं बल्कि सच्चाई बताना और विश्वसनीयता बनाए रखना होता है। लेकिन अब ये सारी बातें पीछे छूट गई हैं। TRP एक तरह से विकृत रूप ले चुकी है और ये नंबर अब यह तय करने का पैमाना बन गए हैं कि कोई चैनल कितना मूल्यवान है और वह कितना राजस्व कमा सकता है।न्यूज़रूम के संपादक अब यह सोचने लगे हैं कि अगर वे ज्यादा TRP ला पाए तो वे मैनेजमेंट को खुश कर पाएंगे और चैनल को ज्यादा कमाई होगी।इसने पत्रकारिता के काम करने के पूरे तरीके को ही बदल दिया है। इसके कारण टीवी पर कई न्यूज एंकर सितारों की तरह उभर आए हैं। अगर मैं कहूं तो कई एंकर अब ग्लैडिएटर की तरह व्यवहार करते हैं।

संकेत : सवाल यह है कि न्यूज़रूम को पत्रकारिता की स्वतंत्रता और रचनात्मक स्वतंत्रता का इस्तेमाल कहां तक करना चाहिए? और किस बिंदु पर उन्हें समझना चाहिए कि इसे सीमा से ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता?

एस. श्रीनिवास: देखिए, टेलीविजन हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण जगह रखता है। यह एक जनसंचार माध्यम है। खासकर ऐसे देश में जहां लोग पढ़ने से दूर होते जा रहे हैं और स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने लगे हैं। अब लोग हर शाम यह जानना चाहते हैं कि दुनिया में क्या हो रहा है और वे इसे अपनी आंखों से देखना चाहते हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब भावनात्मक हेरफेर (Emotional Manipulation) होने लगता है। तब लोग भावनात्मक रूप से प्रभावित होने लगते हैं और यह एक दुष्चक्र (Vicious Circle) बन जाता है।

आज पत्रकारों को दोष देना आसान है, लेकिन वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर उन्हें ज्यादा TRP मिलेगी तो उनकी परफॉर्मेंस बेहतर मानी जाएगी। इसके पीछे और भी कारण हैं-जैसे मीडिया का मालिकाना ढांचा और पूरा मीडिया इकोसिस्टम। इन सबके कारण पत्रकारिता के पेशे की जो गरिमा और आदर्श थे, वे धीरे-धीरे खत्म हो गए हैं। मुझे लगता है कि यह सोचना गलत है कि दर्शक मूर्ख होते हैं। दर्शक समझते हैं और अगर आप उन्हें अच्छा कंटेंट देते हैं तो वे उसकी सराहना भी करते हैं। हालांकि यह भी सच है कि वे काफी मात्रा में सनसनीखेज सामग्री भी देखते हैं।

संकेत: अगर सरकार युद्ध भड़काने और दहशत फैलाने के लिए इन टीवी न्यूज चैनलों के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो क्या वे सचमुच बदल सकते हैं? क्योंकि उनकी संरचना ही इस तरह बदल चुकी है कि वे घटिया और सतही कंटेंट दिखाने लगे हैं। वे मनोरंजन चैनलों से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और वह भी बहुत ही सस्ते स्तर के मनोरंजन से।

एस. श्रीनिवास: टीआरपी ने क्या किया है- पहला, इसने सनसनीखेजता को बढ़ावा दिया है और दूसरा, इसने ध्रुवीकरण को बढ़ाया है। ये दोनों बहुत महत्वपूर्ण पहलू हैं। इसके अलावा न्यूज़रूम के पत्रकार भी व्यावसायिक दबावों के आगे झुक गए हैं। अगर सरकार अचानक चिंतित हो रही है, तो यह भी ध्यान रखना होगा कि समाज में लगातार ध्रुवीकरण भी हो रहा है, जो पिछले कई वर्षों से देखने को मिल रहा है। टीवी चैनलों के टैबलॉइडाइजेशन यानी उनके सनसनीखेज बनने की प्रक्रिया केवल इस सरकार के समय शुरू नहीं हुई थी। यह प्रक्रिया इससे पहले भी शुरू हो चुकी थी। कांग्रेस शासन के दौरान ही गिरावट शुरू हो गई थी।

अब सवाल यह है कि क्या सरकार इसमें हस्तक्षेप कर सकती है? क्या वह कुछ कर सकती है? मेरा मानना है कि सरकार का काम यह तय करना नहीं है कि चैनल क्या दिखाएं और कैसे दिखाएं। टीआरपी रेटिंग्स का सरकार से सीधा संबंध नहीं होता। टीआरपी दरअसल यह मापने का तरीका है कि कोई चैनल अच्छा प्रदर्शन कर रहा है या नहीं। अगर सरकार यह सोचती है कि टीआरपी दिखाना बंद कर देने से चैनल अचानक जिम्मेदार हो जाएंगे, तो यह धारणा गलत है। दूसरी बात यह है कि अगर यह कार्रवाई खाड़ी क्षेत्र में युद्ध की कवरेज तक सीमित है, तो क्या यह वास्तव में वहीं तक सीमित रहेगी? सवाल यह है कि इसकी सीमा क्या होगी? यह कहां जाकर रुकेगा?

एंकर: यह सब रूस-यूक्रेन युद्ध के समय शुरू हुआ था। क्योंकि वह रूस और यूक्रेन का युद्ध था, इसलिए लोगों में स्वाभाविक रुचि थी और सरकार ने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। फिर ऑपरेशन सिंदूर आया, जहां वही सायरन की आवाजें, वही सनसनी और कई बार फर्जी खबरें भी सामने आईं। अब एक साल के भीतर ही वही चीज फिर से दोहराई गई। इसका मतलब यह है कि मीडिया ने खुद को नहीं बदला।

एस. श्रीनिवास: मीडिया को खुद इसका आत्मनियमन करना होगा। संपादकों, पत्रकार संगठनों और मीडिया संस्थाओं को बैठकर इस पर चर्चा करनी चाहिए और समाधान निकालना चाहिए। क्योंकि अगर टीआरपी या किसी अन्य तरीके से संपादकीय सामग्री को नियंत्रित किया जाने लगा, तो अंततः यह कंटेंट को प्रभावित करेगा—यानी चैनल किस तरह की खबरें दिखा रहे हैं। अगर सरकार को लगता है कि इस नीति से कंटेंट की दिशा बदल जाएगी, तो मुझे लगता है कि यह सोच गलत है।


संकेत : अगर सरकार पारंपरिक मीडिया पर सख्ती करती है, तो क्या इससे डिजिटल पत्रकारों पर भी नियंत्रण का रास्ता नहीं खुल जाएगा? और यह एक नई समस्या बन सकती है क्योंकि यह सीधे-सीधे नियमन का मामला बन जाएगा।

एस. श्रीनिवास: हां, बिल्कुल। इसका एक प्रभाव पड़ेगा और यह डिजिटल मीडिया को भी प्रभावित करेगा। आज के समय में डिजिटल मीडिया सबसे कठिन क्षेत्र बन गया है। क्योंकि इसके पास स्थायी राजस्व का कोई निश्चित स्रोत नहीं है। शायद यहां सबसे अच्छा मॉडल पाठकों से मिलने वाला राजस्व है। इन प्लेटफॉर्म्स को बाहर से नियंत्रित किया जाता है और कंटेंट बनाने वालों को उससे बहुत कम हिस्सा मिलता है। ज्यादातर कमाई प्लेटफॉर्म्स ही ले जाते हैं। इस कारण कई डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए टिके रहना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसलिए उन पत्रकारों के लिए समय बहुत कठिन है जो संतुलित और जिम्मेदार पत्रकारिता करना चाहते हैं।

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