अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़ा गया युद्ध एक अप्रत्याशित परिणाम दे सकता है। यह युद्ध वाशिंगटन के रणनीतिक लक्ष्यों के विपरीत चीन की वैश्विक स्थिति को मजबूत कर रहा है। जैसे-जैसे दुनिया के देश ऊर्जा सुरक्षा पर पुनर्विचार कर रहे हैं, बिजली और बैटरी की ओर झुकाव बढ़ रहा है। इस क्षेत्र में चीन का दबदबा उसे पूरी दुनिया के लिए अनिवार्य बना सकता है। वरिष्ठ पत्रकार टी.के. अरुण ने 'द फेडरल' के साथ बातचीत में बताया कि कैसे यह संघर्ष डॉलर की मजबूती, तेल की कीमतों और भविष्य की ऊर्जा राजनीति को प्रभावित कर रहा है। भारत के लिए यह संकट अपनी घरेलू शोध और विकास (R&D) क्षमताओं को बढ़ाने की एक बड़ी चेतावनी है।
रुपये की गिरावट और भविष्य की चाल
युद्ध के कारण भारतीय रुपये में भारी गिरावट देखी गई है। टी.के. अरुण का मानना है कि यह गिरावट केवल अस्थायी है। रुपया अपनी खोई हुई वैल्यू का बड़ा हिस्सा वापस पा लेगा। युद्ध शुरू होने पर पूंजी सुरक्षित ठिकानों की ओर भागती है। निवेशक सुरक्षा के लिए अमेरिकी डॉलर की ओर रुख करते हैं। इसी कारण डॉलर मजबूत हुआ और अन्य मुद्राएं कमजोर हुईं।
महंगाई का दबाव और आरबीआई की भूमिका
पैनिक कम होने पर पूंजी का प्रवाह फिर से बदलेगा। इससे भारतीय रुपया एक बार फिर से मजबूती हासिल करेगा। हालांकि तेल की आपूर्ति बाधित होने से महंगाई बनी रहेगी। तेल की बढ़ती कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रही हैं। आरबीआई को अंततः ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है। इससे विकास दर धीमी होगी लेकिन रुपये को सहारा मिलेगा।
रुपये की सीमा और व्यापार घाटे की स्थिति
डॉलर के मुकाबले रुपया 95 के स्तर पार नहीं करेगा। युद्ध समाप्त होने के बाद इसमें सुधार की उम्मीद है। आरबीआई के पास बाजार में हस्तक्षेप करने की पर्याप्त क्षमता है। भारत का व्यापार और चालू खाता घाटा फिलहाल चिंताजनक नहीं है। व्यवसाय अब युद्ध के पूर्व वाले स्तर के बीच काम करेंगे। उन्हें रुपये में और अधिक तेज गिरावट की उम्मीद नहीं है।
कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की रणनीति भारत को तेल के आयात पर निर्भरता तुरंत कम करनी होगी। इसके लिए घरेलू स्तर पर तेल खोज को बढ़ाना होगा। राजस्थान में केयर्न की खोज ने बड़ी संभावनाएं दिखाई हैं। भारत के भूगोल में हाइड्रोकार्बन के बड़े भंडार हो सकते हैं। हमें अपनी खोज प्रक्रियाओं में और अधिक तेजी लानी होगी। सबसे समझदारी भरी रणनीति बिजली को प्राथमिक स्रोत बनाना है।
नवीकरणीय ऊर्जा और कोयले की अनिवार्यता
नवीकरणीय ऊर्जा महत्वपूर्ण है लेकिन यह पूरी तरह विकल्प नहीं है। हमारी 50 प्रतिशत स्थापित क्षमता गैर-जीवाश्म स्रोतों से है। लेकिन वास्तविक बिजली उत्पादन का 70 प्रतिशत हिस्सा कोयले से आता है। भारत में प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत अभी बहुत कम है। विकास के साथ ऊर्जा की मांग और अधिक बढ़ने वाली है। अल्पकाल में थर्मल पावर से बचना भारत के लिए नामुमकिन है।
स्वच्छ कोयला तकनीक और नए निवेश की जरूरत
भारत के पास कोयले का बहुत बड़ा भंडार मौजूद है। हमें कोयला खनन को और अधिक कुशल बनाना होगा। कोयला गैसीकरण जैसी तकनीकों का उपयोग करना बहुत जरूरी है। गैसीकृत कोयले का उपयोग उर्वरक और प्लास्टिक में हो सकता है। इस क्षेत्र में निवेश और अनुसंधान की भारी गुंजाइश है। बिजली के क्षेत्र में बदलाव से नई निर्भरताएं पैदा होंगी।
चीन पर निर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा
बैटरी स्टोरेज और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए हम चीन पर निर्भर हैं। नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिड के प्रबंधन के लिए यह बहुत अनिवार्य है। यह स्थिति भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। इन प्रणालियों में तोड़फोड़ पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। रक्षा बुनियादी ढांचे पर भी इसका बहुत बुरा असर पड़ेगा। परमाणु ऊर्जा एक बेहतर दीर्घकालिक विकल्प साबित हो सकती है।
परमाणु ऊर्जा और थोरियम भंडार का महत्व
भारत के पास दुनिया का विशाल थोरियम भंडार मौजूद है। हमारा तीन चरणों वाला परमाणु कार्यक्रम सुरक्षा के लिए बना है। हालांकि इस दिशा में प्रगति अब तक बहुत धीमी रही है। भारत को स्वदेशी परमाणु क्षमताओं को प्राथमिकता देनी चाहिए। हमें आयातित तकनीकों के बजाय खुद की क्षमता विकसित करनी होगी। युद्ध से प्रेरित ऊर्जा बदलाव का लाभ चीन को मिलेगा।
ऊर्जा परिवर्तन और चीन का बढ़ता वैश्विक कद चीन इलेक्ट्रिक इकोसिस्टम के लिए दुनिया का एकमात्र स्रोत है। बैटरी स्टोरेज और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स में चीन सबसे आगे है। जैसे-जैसे देश तेल छोड़ेंगे, वे चीन पर निर्भर होंगे। यूरोप अब चीन को प्रतिद्वंद्वी के बजाय सहयोगी देख सकता है। ऊर्जा परिवर्तन में चीन एक स्थिर भागीदार के रूप में उभरेगा। ट्रंप की नीतियों ने अनजाने में चीन की मदद की है।
ट्रंप की नीतियां और तेल प्रभुत्व का संघर्ष
युद्ध से बिजली की ओर बदलाव की गति तेज हुई है। यह स्थिति सीधे तौर पर चीन की ताकत को बढ़ाती है। ऊंची तेल कीमतों से अमेरिकी तेल कंपनियों को लाभ होगा। लेकिन अमेरिका के पास पर्याप्त एलएनजी क्षमता अभी नहीं है। वह कतर जैसे क्षेत्रों की कमी को पूरा नहीं कर पाएगा। नई क्षमता बनाने में अभी कई साल का समय लगेगा।
डॉलर के प्रति घटता भरोसा और नया विश्व क्रम
ट्रंप की टैरिफ नीतियों ने वैश्विक आर्थिक अस्थिरता पैदा की है। इससे अमेरिकी डॉलर के प्रति दुनिया का भरोसा कम हुआ है। वैश्विक वित्त में डॉलर की एंकर भूमिका अब कमजोर होगी। इसका सीधा लाभ प्रतिद्वंद्वी अर्थव्यवस्थाओं को मिलने की उम्मीद है। युद्ध के बाद परमाणु हथियारों का प्रसार और बढ़ेगा। देश परमाणु हथियारों को ही एकमात्र वास्तविक निवारक मानेंगे।
पश्चिम एशिया का भविष्य और उभरती हुई शक्तियां इजरायल अब क्षेत्र की सबसे प्रभावी ताकत बनकर उभरेगा। ईरान भी अंततः परमाणु क्षमता विकसित करने की कोशिश करेगा। जापान और जर्मनी जैसे देश अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करेंगे। खाड़ी देशों की महत्वाकांक्षाओं को युद्ध से भारी नुकसान हुआ है। दुबई जैसे वित्तीय केंद्रों की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। तेल से दूर जाने की उनकी योजनाएं पिछड़ सकती हैं।
भारत के लिए अनुसंधान और विकास की चेतावनी
विश्व अब एक अनियमित बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। देश अब सामाजिक क्षेत्रों के बजाय रक्षा पर अधिक खर्च करेंगे। भारत को अपनी जीडीपी का बड़ा हिस्सा R&D पर खर्चना चाहिए। वर्तमान में हम केवल 0.65 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च करते हैं। छोटे देश भी हमसे अनुपातिक रूप से अधिक खर्च कर रहे हैं। घरेलू तकनीक के बिना हम रणनीतिक स्वायत्तता नहीं पा सकते।
तकनीकी आत्मनिर्भरता और भारत का सुनहरा भविष्य
भारत को विज्ञान और नवाचार में भारी निवेश करना होगा। हमारे ड्रोन आज भी चीनी पुर्जों पर निर्भर हैं। एक उभरती हुई महाशक्ति के लिए यह स्थिति अस्वीकार्य है। हमें अपनी भविष्य की सुरक्षा के लिए खुद की तकनीक चाहिए। आत्मनिर्भरता के बिना भारत अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षाएं पूरी नहीं कर पाएगा। कूटनीतिक और तकनीकी मोर्चे पर भारत को सजग रहना होगा।
(ऊपर दिया गया कंटेंट एक फाइन-ट्यून्ड AI मॉडल का इस्तेमाल करके वीडियो से ट्रांसक्राइब किया गया है। एक्यूरेसी, क्वालिटी और एडिटोरियल इंटीग्रिटी पक्का करने के लिए, हम ह्यूमन-इन-द-लूप (HITL) प्रोसेस का इस्तेमाल करते हैं। AI शुरुआती ड्राफ्ट बनाने में मदद करता है, जबकि हमारी अनुभवी एडिटोरियल टीम पब्लिकेशन से पहले कंटेंट को ध्यान से रिव्यू, एडिट और बेहतर बनाती है। द फेडरल में, हम भरोसेमंद और इनसाइटफुल जर्नलिज़्म देने के लिए AI की एफिशिएंसी को ह्यूमन एडिटर्स की एक्सपर्टीज़ के साथ मिलाते हैं।)