
व्हाट्सऐप, मेटा और भारत, क्या कानून बिग टेक से निपटने को तैयार है?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद व्हाट्सऐप की प्राइवेसी, डेटा-शेयरिंग और एन्क्रिप्शन दावों पर बहस तेज़ हुई है। बिग टेक की जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या विज्ञापनदाताओं के साथ आखिर साझा क्या किया जा रहा है? क्या वह आपकी निजी चैट होती है? जब सुप्रीम कोर्ट की व्हाट्सऐप और मेटा पर की गई तीखी टिप्पणियों ने प्राइवेसी, डेटा-शेयरिंग और इस सवाल पर व्यापक बहस छेड़ दी कि क्या भारत का कानूनी ढांचा बिग टेक कंपनियों से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार है।
द फेडरल ने इस मुद्दे पर यही केंद्रीय सवाल AI with Sanket कार्यक्रम में उठाया। मीडियानामा के संस्थापक और संपादक निखिल पहवा, सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता खुशबू जैन और सोशल एंड मीडिया मैटर्स की सीईओ प्रतिष्ठा अरोड़ा से बातचीत की। चर्चा इस बात पर केंद्रित रही कि 2021 में क्या बदला, नियामक और अदालतें किन सवालों की जांच कर रही हैं, और संभावित समाधान क्या हो सकते हैं।
यह चर्चा व्हाट्सऐप की 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी में हुए बदलाव की पृष्ठभूमि में हुई और इस सवाल के इर्द-गिर्द घूमती रही कि यह प्लेटफॉर्म यूज़र डेटा से कमाई कैसे करता है। पैनल ने यह भी बहस की कि क्या व्हाट्सऐप के एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन के दावों का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट होना चाहिए, और उन यूज़र्स के लिए सहमति (कंसेंट) कैसे काम करे, जो जटिल प्राइवेसी पॉलिसियों को वास्तविक रूप से समझ ही नहीं सकते।
चर्चा बार-बार सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी पर लौटती रही। अगर कोई प्लेटफॉर्म भारत में काम करना चाहता है, तो उसे देश के कानूनों और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करना होगा। यही तर्क प्राइवेसी, संप्रभुता और व्यापारिक हितों बनाम सार्वजनिक अधिकारों की सीमा को लेकर पैनल के मतभेदों का केंद्र बना।
2021 में क्या बदला?
निखिल पहवा ने विवाद की जड़ व्हाट्सऐप की 2021 की शर्तों और प्राइवेसी पॉलिसी में हुए बदलाव को बताया। उनके अनुसार, इस बदलाव ने व्हाट्सऐप को यूज़र मेटाडेटा अपनी मूल कंपनी (तब फेसबुक, अब मेटा) के साथ साझा करने की अनुमति दी, ताकि फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे मेटा प्लेटफॉर्म्स पर विज्ञापन सक्षम किए जा सकें।
उनका तर्क था कि यह व्हाट्सऐप की पहले दी गई उन आश्वस्तियों से उलट था, जिनमें कहा गया था कि व्हाट्सऐप के जरिए विज्ञापन नहीं दिखाए जाएंगे। पहवा ने यह भी बताया कि समय के साथ व्हाट्सऐप का कमर्शियल इकोसिस्टम काफी बढ़ चुका है। बिजनेस मैसेजिंग आम हो गई है और यूज़र्स को लगातार प्रमोशनल मैसेज मिलने लगे हैं। इस नजरिए से, 2021 की पॉलिसी केवल एक कानूनी अपडेट नहीं थी, बल्कि एक बुनियादी बदलाव था, जिसने व्हाट्सऐप को मेटा के विज्ञापन-आधारित बिजनेस मॉडल में और गहराई से जोड़ दिया जबकि व्हाट्सऐप करोड़ों लोगों के लिए डिफॉल्ट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म बना रहा।
लो या छोड़ो की लड़ाई
खुशबू जैन ने व्हाट्सऐप की 2021 नीति को टेक इट ऑर लीव इट (लो या छोड़ो) करार दिया। उनके मुताबिक, यूज़र्स को सेवा जारी रखने के लिए विस्तारित डेटा-शेयरिंग को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने कहा कि एक प्रभुत्वशाली प्लेटफॉर्म, जो एक तरह से डिजिटल टाउन स्क्वायर बन चुका है, अपनी स्थिति का फायदा उठाकर अनुचित शर्तें थोप सकता है। जैन ने व्हाट्सऐप के सार्वजनिक रुख में मौजूद विरोधाभास की ओर भी इशारा किया एक तरफ कंपनी कहती है कि एन्क्रिप्शन के कारण वह खुद भी संदेश नहीं पढ़ सकती, वहीं दूसरी तरफ पॉलिसी में विज्ञापन और बिजनेस उद्देश्यों के लिए डेटा साझा करने का दायरा बढ़ाया गया।
जैन के अनुसार, असली सवाल यह नहीं है कि कोई कंपनी कारोबार कर सकती है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या कोई प्रभुत्वशाली प्लेटफॉर्म नियम इस तरह बदल सकता है जिससे यूज़र अधिकार कमजोर हों या भारतीय कानून का उल्लंघन हो।
प्रतिष्ठा अरोड़ा ने कहा कि धिकांश यूज़र्स के लिए प्राइवेसी पॉलिसियां व्यावहारिक रूप से अपठनीय होती हैं। छोटे फॉन्ट, जटिल भाषा और आगे बढ़ने के लिए स्वीकार करें जैसी मजबूरी है। उन्होंने इसे एक डिज़ाइन समस्या बताया, जो सूचित सहमति को कमजोर करती है, खासकर उन यूज़र्स के लिए जिनके पास लंबी कानूनी शर्तों को समझने की क्षमता या संदर्भ नहीं होता।
एन्क्रिप्शन बनाम कमाई
निखिल पहवा ने एक और गंभीर चिंता की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने अमेरिका में दायर एक मुकदमे का हवाला दिया, जिसमें कथित तौर पर कहा गया है कि व्हाट्सऐप के कर्मचारी संदेशों तक पहुंच बना सकते हैं। जो कंपनी के लंबे समय से किए जा रहे एन्क्रिप्शन दावों को सीधे चुनौती देता है।
उन्होंने एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन को सरल शब्दों में समझाया: संदेश भेजने वाला उसे एक कुंजी से एन्क्रिप्ट करता है और केवल प्राप्तकर्ता के पास उसे डिक्रिप्ट करने की कुंजी होती है, जिससे व्हाट्सऐप सर्वर से गुजरते समय भी संदेश पढ़ा नहीं जा सकता।
पहवा ने कहा कि इन दावों का स्वतंत्र ऑडिट होना चाहिए और व्हाट्सऐप को साइबर सुरक्षा शोधकर्ताओं के लिए तकनीकी जांच की अनुमति देनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यूज़र अक्सर लक्षित विज्ञापनों को संदेशों की सामग्री से जोड़ देते हैं, जबकि प्लेटफॉर्म अन्य संकेतों और डेटा सेट्स से भी यूज़र की रुचि समझ सकते हैं।
साथ ही, उन्होंने यह व्यापक तर्क दिया कि अरबों डॉलर में खरीदी गई सेवा के लिए कमाई करना एक व्यावसायिक आवश्यकता है, और समय के साथ सेवाओं की शर्तें बदलना असामान्य नहीं बशर्ते यूज़र्स को जानकारी दी जाए और “लो या छोड़ो” का विकल्प दिया जाए। उनके अनुसार, पूरी तरह प्राइवेसी की मांग करते हुए एक मुफ्त सेवा की उम्मीद करना अव्यावहारिक है, क्योंकि आधुनिक इंटरनेट का बड़ा हिस्सा विज्ञापन से चलता है।
अधिकार, कानून और संप्रभुता
खुशबू जैन ने इस तर्क का विरोध किया कि यह केवल उपभोक्ता पसंद का मामला है। उनका कहना था कि जब राष्ट्रीय कानूनों जैसे प्रतिस्पर्धा कानून और व्यक्ति के निजता के अधिकार की बात आती है, तो भारत में काम करने वाली कंपनियों को देश के कानूनी ढांचे का पालन करना ही होगा।
उन्होंने कहा कि बहस कारोबार रोकने की नहीं, बल्कि इस सवाल की है कि क्या कोई प्रभुत्वशाली कंपनी समूह कंपनियों के बीच डेटा साझा कर अपनी स्थिति का दुरुपयोग कर रही है।
पहवा ने इस फ्रेमिंग के कुछ हिस्सों से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि जिस डेटा संरक्षण कानून का जिक्र हो रहा है, वह अभी पूरी तरह लागू नहीं हुआ है, और निजता का मौलिक अधिकार मुख्य रूप से राज्य के खिलाफ लागू होता है, न कि निजी कंपनियों के खिलाफ। उन्होंने यह भी कहा कि प्राइवेसी और एंटीट्रस्ट (प्रतिस्पर्धा) बहसों को अलग-अलग देखना चाहिए, साथ ही यह स्वीकार किया कि विज्ञापन और डेटा-आधारित कमाई ही कई डिजिटल सेवाओं को मुफ्त बनाए रखती है।
अरोड़ा ने चर्चा को आम लोगों के अनुभवों की ओर मोड़ा स्पैम कॉल्स और अनचाहे संपर्कों का जिक्र करते हुए कहा कि यह दिखाता है कि व्यक्तिगत डेटा यूज़र के नियंत्रण से बाहर कैसे घूमता रहता है। उन्होंने तर्क दिया कि खासकर बड़े शहरों के बाहर, बहुत से यूज़र यह नहीं जानते कि वे किस बात की सहमति दे रहे हैं या उनका डेटा कहां जा रहा है। इसलिए जन-जागरूकता और नीतियों की स्पष्टता किसी भी सार्थक सुधार के लिए जरूरी है।
समाधान कैसे दिख सकते हैं?
समाधानों पर चर्चा करते हुए पैनल एक बिंदु पर सहमत दिखा। व्हाट्सऐप के तकनीकी दावों पर अधिक स्पष्टता जरूरी है। पहवा ने दोहराया कि एन्क्रिप्शन की अखंडता और कर्मचारियों की पहुंच को लेकर सवाल सुलझाने के लिए स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य होने चाहिए।
इंटरऑपरेबिलिटी पर उन्होंने कहा कि क्रॉस-प्लेटफॉर्म मैसेजिंग तकनीक दशकों से मौजूद है, और XMPP प्रोटोकॉल इसका उदाहरण है। लेकिन उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी कंपनी को किसी विशेष तकनीक को अपनाने के लिए मजबूर किया जा सकता है। उनके अनुसार, यूज़र की पसंद अहम है—हालांकि बड़े पैमाने पर प्लेटफॉर्म बदलना आसान नहीं होता।
खुशबू जैन ने सहमति और प्रतिस्पर्धा पर केंद्रित उपाय सुझाए। उन्होंने कहा कि सहमति एक विकल्प होनी चाहिए, फिरौती नहीं। उन्होंने ऐसे ऑप्ट-आउट मैकेनिज्म की वकालत की, जिसमें यूज़र शर्तें अस्वीकार कर सकें, लेकिन मैसेजिंग सेवा से वंचित न हों। उन्होंने यह भी कहा कि प्राइवेसी पॉलिसी को सेवा की गुणवत्ता का हिस्सा माना जा सकता है, और प्रभुत्वशाली कंपनियों को बाजार शक्ति बनाए रखने के लिए उस गुणवत्ता को गिराने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।
जैन ने सुझाव दिया कि व्हाट्सऐप बिजनेस API और अन्य राजस्व स्रोतों से कमाई कर सकता है, बिना निजी चैट डेटा “एकत्र” किए। साथ ही उन्होंने अधिक सूक्ष्म सहमति की मांग की। स्पष्ट रूप से बताया जाए कि कौन-सा डेटा लिया जा रहा है, किस उद्देश्य से और किसके साथ साझा किया जा रहा है।
प्रतिष्ठा अरोड़ा ने जोर दिया कि प्राइवेसी पॉलिसियों को सरल भाषा में समझाना, एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन जैसे शब्दों पर सार्वजनिक संवाद बढ़ाना और भारत के डेटा संरक्षण ढांचे के पूरी तरह लागू होने से पहले जागरूकता निर्माण करना बेहद जरूरी है।जिसमें सरकार और सभी हितधारकों की सामूहिक भूमिका हो।

