
‘वर्कर कौन है?’ — सुप्रीम कोर्ट 1978 के ऐतिहासिक फैसले की फिर करेगा समीक्षा
एक महत्वपूर्ण सुनवाई भारतीय श्रम कानून की सीमाओं को फिर से तय कर सकती है — और यह तय करेगी कि क्या अस्पतालों, स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले लाखों भारतीय अपने कार्यस्थल के अधिकारों का दावा कर पाएंगे।
करीब पांच दशकों से एक न्यायिक फैसला लाखों भारतीयों के कामकाजी जीवन को प्रभावित करता आया है। यह फैसला 1978 में Supreme Court of India की सात-न्यायाधीशों की पीठ ने दिया था। इसमें कहा गया था कि भारतीय श्रम कानून में “इंडस्ट्री” शब्द को व्यापक रूप से समझा जाना चाहिए, ताकि अस्पताल, स्कूल, चैरिटेबल संस्थाएं, कुछ सरकारी विभाग भी श्रम कानूनों के दायरे में आएं।
अब एक 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ यह जांच रही है कि क्या यह व्याख्या सही थी या कानून की मूल मंशा से आगे बढ़ गई थी।
महत्वपूर्ण सुनवाई
यह सुनवाई 17 मार्च से शुरू हुई, जिसकी अगुवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत कर रहे हैं। यह भारतीय न्यायिक इतिहास में श्रम कानून से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण कार्यवाहियों में से एक मानी जा रही है।
मुख्य सवाल यह है:
* कौन कर्मचारी अपने वेतन, नौकरी से निकाले जाने या काम की शर्तों पर विवाद उठा सकता है?
* किसे कानून की सुरक्षा मिलेगी और कौन इससे बाहर रहेगा?
शुरुआत कैसे हुई? (1978 केस)
यह मामला 1978 में शुरू हुआ, जब बैंगलोर वाटर सप्लाई बोर्ड ने अपने कर्मचारियों के मामले में श्रम न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी थी।
तब न्यायमूर्ति वी.आर कृष्णा अय्यर की अध्यक्षता वाली पीठ ने इंडस्ट्री की व्यापक परिभाषा दी।
कोई भी संस्था “इंडस्ट्री” मानी जाएगी अगर वह व्यवस्थित गतिविधि करती हो, उसमें कर्मचारी काम करते हों और वह वस्तु या सेवा प्रदान करती हो (भले ही लाभ के लिए न हो)।
इससे अस्पताल, निजी विश्वविद्यालय, रिसर्च संस्थान, सहकारी समितियां सभी “इंडस्ट्री” की श्रेणी में आ गए।
विचारधारा का सवाल
यह फैसला एक विचारधारात्मक दृष्टिकोण पर आधारित था। जस्टिस कृष्णा अय्यर का मानना था कि श्रम कानून का उद्देश्य कमजोर पक्ष (कर्मचारी) की रक्षा करना है, और इसे केवल फैक्ट्रियों या व्यापारिक संस्थानों तक सीमित करना गलत होगा।
इस फैसले का ट्रेड यूनियनों ने स्वागत किया, जबकि नियोक्ताओं ने इसका विरोध किया।
समय के साथ कई मामलों में अलग-अलग फैसले आए, जिससे यह सवाल उठा कि क्या सरकारी विभाग “इंडस्ट्री” हैं?
2005 में 5-न्यायाधीशों की पीठ ने इस फैसले पर संदेह जताया और इसे पुनर्विचार के लिए भेजा।
2017 में 7-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि अब इस पर 9-न्यायाधीशों की पीठ ही फैसला करेगी।
अब वही पीठ सुनवाई कर रही है।
अभी क्या बहस हो रही है?
जो लोग 1978 के फैसले की समीक्षा चाहते हैं, उनका कहना है कि यह फैसला कानून की मूल भावना से आगे निकल गया था।
वरिष्ठ वकील शेखर नफाडे ने दलील दी कि अब “ट्रेड”, “बिजनेस” और “मैन्युफैक्चर” जैसे शब्दों के मूल अर्थ पर वापस जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शिक्षा एक बौद्धिक प्रक्रिया है, न कि व्यावसायिक सेवा। शिक्षा अब संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत मौलिक अधिकार है। इसलिए इसे “इंडस्ट्री” नहीं माना जाना चाहिए।
केंद्र सरकार की दलील
केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर वैंकटरमणी ने सुनवाई के पहले दिन सबसे तीखी दलील रखी। उन्होंने कहा कि अदालतों को अपनी सामाजिक या आर्थिक सोच को कानून बनाने वाली संसद के फैसलों पर थोपना नहीं चाहिए।
उनके मुताबिक, इंडस्ट्री की बहुत व्यापक व्याख्या नियोक्ताओं पर अनावश्यक बोझ डालती है और निजी उद्यम को हतोत्साहित करती है, जबकि देश में रोजगार सृजन इस समय एक बड़ी प्राथमिकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि संसद ने Industrial Disputes Act की जगह Industrial Relations Code 2020 लागू किया है, जो इस बात का संकेत है कि विधायिका पहले ही इस व्यापक परिभाषा को बदलना चाहती है।
इंदिरा जयसिंह की दलील
दूसरी ओर, वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने जोरदार तरीके से कहा कि 1978 के फैसले की समीक्षा की कोई जरूरत नहीं है।
उन्होंने कहा कि पूरा मामला ही एक गलत आधार पर खड़ा है—यह मान लिया गया है कि बैंगलोर वाटर सप्लाई केस में जजों की राय बंटी हुई थी।
उनका कहना था कि अदालत को इस संदर्भ (reference) को खारिज कर देना चाहिए और पहले से तय कानून को दोबारा नहीं खोलना चाहिए।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अदालत का फैसला दोनों पक्षों को प्रभावित करेगा—
* कर्मचारी, जो अपने अधिकारों के लिए विवाद उठाते हैं
* नियोक्ता, जो जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं
परिभाषा को सीमित करने से विवाद खत्म नहीं होंगे, बल्कि कर्मचारियों के पास न्याय पाने का मंच ही खत्म हो जाएगा।
जटिलता: कानून पहले ही बदल चुका है
इस पूरे मामले में एक बड़ी जटिलता यह है कि जिस कानून के तहत “इंडस्ट्री” की परिभाषा दी गई थी, यानी Industrial Disputes Act, उसे पहले ही खत्म किया जा चुका है।
उसकी जगह Industrial Relations Code 2020 नवंबर 2025 से लागू हो चुका है। कुछ वकीलों ने दलील दी कि अब यह मामला अप्रासंगिक (moot) हो गया है, क्योंकि अदालत ऐसे प्रावधान की व्याख्या करेगी जो अब अस्तित्व में ही नहीं है।
लेकिन अदालत इस तर्क से सहमत नहीं हुई।
न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने स्पष्ट कहा कि अदालत का फैसला उन हजारों मामलों पर लागू होगा जो पुराने कानून के तहत अभी भी लंबित हैं।
क्या दांव पर लगा है?
अगर 9-न्यायाधीशों की पीठ “इंडस्ट्री” की परिभाषा को सीमित कर देती है, तो इसके गंभीर और तुरंत प्रभाव हो सकते हैं:
* अस्पतालों के कर्मचारी
* स्कूलों के शिक्षक
* एनजीओ कर्मचारी
* सरकारी कल्याण विभागों के कर्मचारी
इन सभी को वेतन, काम के घंटे, छंटनी और विवाद समाधान जैसे अधिकारों से बाहर किया जा सकता है। और उनके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी मौजूद नहीं है।
कानूनी खालीपन
1982 में संसद ने “इंडस्ट्री” को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने के लिए संशोधन पास किया था, लेकिन उसे कभी लागू नहीं किया गया।
यह दिखाता है कि यह मुद्दा हमेशा से राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है।
अगर अदालत ने परिभाषा सीमित कर दी और कोई नया ढांचा नहीं बना, तो एक बड़ा कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है।
अगर 1978 का फैसला बरकरार रहा
अगर अदालत पुराने फैसले को बरकरार रखती है, तो सरकारी कार्यों और कल्याण योजनाओं को लेकर अस्पष्टता बनी रहेगी। राज्य सरकारों और नियोक्ताओं की शिकायतें जारी रहेंगी।
उनका कहना है कि इतनी व्यापक परिभाषा के कारण:
* सार्वजनिक सेवाओं का पुनर्गठन मुश्किल हो जाता है
* घाटे वाले विभाग बंद करना कठिन होता है
* नीतिगत फैसले लागू करना मुश्किल हो जाता है
आज के समय में क्यों महत्वपूर्ण है?
यह सुनवाई ऐसे समय में हो रही है जब पुराना कानून खत्म हो चुका है। नया कानून लागू हो चुका है, लेकिन उसमें भी अस्पष्टता है। देशभर में हजारों मामले अभी भी लंबित हैं।
यह फैसला सिर्फ एक कानूनी बहस नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि:
* क्या एक नर्स, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता या चैरिटी में काम करने वाला कर्मचारी
* अपने कार्यस्थल पर न्याय पाने का अधिकार रखता है या नहीं।
आखिरकार, यह सिर्फ “इंडस्ट्री” की परिभाषा का सवाल नहीं है—यह इस बात का फैसला है कि भारत किस तरह का समाज बनना चाहता है।

