लीगल लेंस | सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला संदर्भ में अनुच्छेद 17 इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
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सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने पूजा स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू कर दी है, जिसमें केरल का सबरीमला मंदिर भी शामिल है। (फोटो: iStock)

लीगल लेंस | सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला संदर्भ में अनुच्छेद 17 इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

संविधान निर्माताओं ने ‘अस्पृश्यता’ को परिभाषित करने से इनकार किया था। केरल मंदिर मामला यह परख रहा है कि उस संवैधानिक चुप्पी की सीमा कितनी दूर तक जाती है


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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 केवल दो छोटे वाक्यों में है। यह “अस्पृश्यता” को समाप्त करता है। यह किसी भी रूप में इसके अभ्यास को निषिद्ध करता है। इसके बाद यह कहता है कि अस्पृश्यता से उत्पन्न किसी भी प्रकार की अक्षमता को लागू करना कानून के अनुसार दंडनीय अपराध होगा।

“अस्पृश्यता” शब्द को उद्धरण चिह्नों में रखा गया है—न इसका अनुवाद किया गया है, न ही इसे परिभाषित किया गया है। यह जानबूझकर किया गया था और यही इस अनुच्छेद की मूल अवधारणा है। वर्तमान सबरीमला मामला इसी आधार पर निर्भर करेगा।

मंगलवार (7 अप्रैल) को सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने हस्तक्षेप किया, जब सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की पीठ इस लंबे समय से लंबित मामले पर सुनवाई कर रही थी। उन्होंने कहा कि एक महिला के रूप में हर महीने तीन दिनों की ‘अस्पृश्यता’ और चौथे दिन उसका खत्म हो जाना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

यह टिप्पणी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की उस आपत्ति के जवाब में की गई थी, जिसमें उन्होंने केरल के मंदिर में मासिक धर्म वाली आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक का विरोध करने वालों द्वारा अनुच्छेद 17 का हवाला देने पर सवाल उठाया था।

अनुच्छेद 17 का इतिहास

ड्राफ्ट अनुच्छेद 11, जैसा कि उस समय इसे कहा जाता था, 29 नवंबर 1948 को संविधान सभा में विचार के लिए प्रस्तुत किया गया।

सभा के कई सदस्यों ने इसकी परिभाषा मांगी। नज़ीरुद्दीन अहमद ने एक संशोधन प्रस्ताव रखा, जिसमें इस प्रावधान को केवल धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव तक सीमित करने की बात कही गई। उनकी आपत्ति कानूनी दृष्टि से थी—उन्होंने चेतावनी दी कि बिना परिभाषा के कोई भी शब्द गलत व्याख्या के लिए खुला रहता है।

प्रोफेसर के.टी. शाह ने भी माना कि यह चुप्पी भविष्य में अनिश्चितता पैदा करेगी और इसके स्थान पर कोई दूसरा शब्द रखने का सुझाव दिया।

हालांकि, ड्राफ्टिंग कमेटी ने दोनों प्रस्तावों को खारिज कर दिया। यह शब्द बिना किसी बदलाव के संविधान में शामिल किया गया और उद्धरण चिह्न भी यथावत रखे गए।

इस चुप्पी के पीछे एक सकारात्मक संवैधानिक रणनीति थी। संविधान निर्माताओं के अनुसार, ‘अस्पृश्यता’ कोई एकल प्रथा नहीं थी जिसे सूचीबद्ध किया जा सके, बल्कि यह सामाजिक अक्षमताओं का एक समूह था, जो शुद्धता और अशुद्धता की धारणा पर आधारित था।

यदि इसके उदाहरणों की सूची बनाई जाती, तो यह बहस शुरू हो जाती कि नए उदाहरण इसमें शामिल होते हैं या नहीं। केवल जाति के आधार पर इसकी परिभाषा तय करना इस प्रावधान की नैतिक व्यापकता को सीमित कर देता। 1935 के भारत सरकार अधिनियम ने “अस्पृश्यों” की सूची बनाकर यही रास्ता अपनाया था, लेकिन संविधान निर्माताओं ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने इस शब्द को खुला छोड़ा और अदालतों पर भरोसा किया कि वे इसके उद्देश्य के अनुरूप इसकी व्याख्या करेंगी।

इस चुनौती को स्वीकार करने वाली पहली अदालत ने इसे सावधानी से पढ़ा। 1957 के देवराजैया बनाम बी. पद्मन्ना मामले में मैसूर हाईकोर्ट ने अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955 पर विचार किया। यह मामला एक जैन पैम्फलेट लेखक से जुड़ा था, जिस पर धार्मिक बहिष्कार भड़काने का आरोप था। अदालत ने इस स्थिति में अधिनियम लागू करने से इनकार कर दिया।

हालांकि, उसका तर्क बाद में उद्धृत किए गए निष्कर्षों से कहीं अधिक सूक्ष्म था। फैसले में कहा गया कि अनुच्छेद 17 में ‘अस्पृश्यता’ शब्द उद्धरण चिह्नों में है, जो यह संकेत देता है कि संविधान निर्माताओं के मन में वह प्रथा थी, जैसा कि वह ऐतिहासिक रूप से भारत में विकसित हुई थी। साथ ही यह भी जोड़ा गया कि इसकी परिभाषा न देना एक जानबूझकर किया गया निर्णय था।

इसका उद्देश्य यह था कि इस प्रथा को किसी भी रूप में जारी रहने की कोई गुंजाइश न बचे। देवराजैया मामले को अक्सर इस तर्क के लिए उद्धृत किया जाता है कि अनुच्छेद 17 केवल जाति-आधारित अस्पृश्यता तक सीमित है, लेकिन ध्यान से पढ़ने पर यह उससे अधिक व्यापक अर्थ देता है। ऐतिहासिक संदर्भ इस अन्याय के स्वरूप को स्पष्ट करता है, जबकि “किसी भी रूप में” शब्द इसकी सीमाओं को तय करने से इनकार करता है।

दूसरी दिशा 1982 में सामने आई। पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ मामले (जिसे एशियाड वर्कर्स केस भी कहा जाता है) में अदालत ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। जस्टिस पी.एन. भगवती ने कहा कि अनुच्छेद 17, अनुच्छेद 23 और 24 के साथ, केवल राज्य ही नहीं बल्कि निजी व्यक्तियों पर भी लागू होता है।

मंदिर प्रबंधन के लिए इसका सीधा असर था—कोई धार्मिक संस्था यह नहीं कह सकती कि वह निजी है, इसलिए अनुच्छेद 17 उस पर लागू नहीं होता। यदि कोई प्रथा संवैधानिक अर्थ में अस्पृश्यता है, तो यह निषेध सभी पर लागू होगा।

तीसरी दिशा आने में एक दशक और लग गया। संविधान लागू होने के पहले 42 वर्षों तक सुप्रीम कोर्ट के सामने अनुच्छेद 17 से जुड़ा कोई बड़ा मामला नहीं आया।

जब ऐसा मामला आया, तो वह था 1992 का कर्नाटक राज्य बनाम अप्पा बालू इंगल मामला। इसमें अदालत ने उन ऊंची जाति के लोगों के खिलाफ सजा को बरकरार रखा, जिन्होंने दलितों को बंदूक की नोक पर बोरवेल से पानी लेने से रोका था।

जस्टिस कुलदीप सिंह ने अदालत की ओर से सिविल राइट्स संरक्षण अधिनियम को सख्ती से लागू किया। वहीं, जस्टिस के. रामास्वामी ने अपने विस्तृत सहमति वाले मत में और आगे बढ़ते हुए कहा कि अनुच्छेद 17 किसी एक ऐतिहासिक अन्याय के खिलाफ नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक अन्याय के खिलाफ प्रतिक्रिया है।

उन्होंने लिखा कि अस्पृश्यता “गुलामी का एक अप्रत्यक्ष रूप है और जाति व्यवस्था का विस्तार मात्र है।” उनके अनुसार, जाति और अस्पृश्यता साथ-साथ मौजूद हैं और साथ ही समाप्त होंगी। अदालतों को इस प्रावधान की व्याख्या करते समय इसके संवैधानिक उद्देश्य को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।

चौथी दिशा 2014 में सफाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत संघ मामले में सामने आई। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 17 को सीधे मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से मैला ढोने की प्रथा) से जोड़ा। अदालत ने कहा कि यह पेशा उसी शुद्ध-अशुद्ध की सोच पर आधारित है, जिसे समाप्त करने के लिए यह प्रावधान बनाया गया था।

इस फैसले ने ‘अस्पृश्यता’ का कोई नया अर्थ नहीं गढ़ा, बल्कि इसके पुराने अर्थ को पहचानते हुए उसे वर्तमान संदर्भ से जोड़ दिया।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने 2018 के इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य मामले में अपने सहमति वाले फैसले में इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। उनकी व्याख्या, जिसे अक्सर व्यापक कहा जाता है, दरअसल काफी सावधानीपूर्वक है। उन्होंने संविधान सभा की बहसों की ओर लौटते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि ‘अस्पृश्यता’ को केवल जाति तक सीमित न करने का निर्णय जानबूझकर लिया गया था।

उन्होंने मूल पाठ की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसमें “किसी भी रूप में” शब्द का इस्तेमाल किया गया है। देवराजैया, पीयूडीआर, अप्पा बालू इंगल और सफाई कर्मचारी आंदोलन जैसे मामलों की परंपरा को जोड़ते हुए उन्होंने एक समान धागा पहचाना। उनके अनुसार, अनुच्छेद 17 का मूल सिद्धांत यह है कि शुद्धता-अशुद्धता के विचारों पर आधारित सामाजिक पदानुक्रम को संवैधानिक जांच से बचने नहीं दिया जा सकता। जाति इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है, लेकिन यह एकमात्र रूप नहीं है।

इस दृष्टिकोण से सबरीमला का सवाल यह नहीं था कि मासिक धर्म वाली महिलाओं को उन दिनों ‘अस्पृश्य’ माना जा रहा है या नहीं, बल्कि यह था कि मंदिर में प्रवेश पर रोक क्या उसी शुद्धता के तर्क पर आधारित है, जिसे अनुच्छेद 17 निषिद्ध करता है।

यह प्रतिबंध 10 से 50 वर्ष की हर महिला पर लागू होता है। इसमें यह नहीं देखा जाता कि कोई महिला वास्तव में मासिक धर्म में है या नहीं, गर्भवती है, रजोनिवृत्ति हो चुकी है या वह मासिक धर्म में सक्षम ही नहीं है।

मंदिर प्रवेश पर मासिक धर्म की जांच नहीं करता, बल्कि महिला शरीर के आधार पर 40 वर्षों का एक दायरा तय करता है। 10 से 50 वर्ष की आयु सीमा यूं ही नहीं चुनी गई—यह वही अवधि है जब महिलाओं को मासिक धर्म में सक्षम माना जाता है। इस धारणा को हटा दें, तो यह नियम ही खत्म हो जाता है। यानी आयु-आधारित मानदंड दरअसल मासिक धर्म का ही एक छिपा हुआ रूप है।

2018 के फैसले की दो और महत्वपूर्ण बातें हैं। पहली, जस्टिस चंद्रचूड़ ने केवल अनुच्छेद 17 पर ही अपना तर्क आधारित नहीं किया। सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ सुरक्षा अनुच्छेद 15(2) और अनुच्छेद 21 में भी निहित है। अनुच्छेद 15(2) सार्वजनिक स्थानों पर भेदभावपूर्ण प्रवेश निषेध को रोकता है, जबकि अनुच्छेद 21 गरिमा की रक्षा करता है।

अन्य तीन बहुमत वाले न्यायाधीशों ने अनुच्छेद 17 पर विचार नहीं किया, जबकि जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने असहमति जताते हुए इसे केवल जाति तक सीमित माना। इसलिए अनुच्छेद 17 को लेकर इस मामले का अंतिम निष्कर्ष अब भी स्पष्ट नहीं है और यही मुद्दा वर्तमान नौ-न्यायाधीशों की पीठ के सामने है।

दूसरी बात, जस्टिस चंद्रचूड़ ने उस आपत्ति का भी पूर्वानुमान लगा लिया था, जिसे अब सॉलिसिटर जनरल उठा रहे हैं। यह आपत्ति है कि अनुच्छेद 17 को लिंग के आधार तक बढ़ाना उसके मूल उद्देश्य को कमजोर करता है।

इसका जवाब यह है कि यह प्रावधान सुधारात्मक (reparative) है, लेकिन केवल उसी तक सीमित नहीं है। जाति इसका सबसे तीखा रूप है, लेकिन यह इसका पूरा दायरा नहीं है। इसे केवल जाति तक सीमित करना, सबसे स्पष्ट उदाहरण को ही पूरे सिद्धांत के बराबर मान लेना होगा। संविधान सभा ने इस अंतर को खुला रखने के लिए ही इसे परिभाषित नहीं किया था, और अदालतों को भी इसे खुला ही रखना चाहिए।

केंद्र सरकार के तर्क दो हिस्सों में हैं। पहला, मंदिर का प्रतिबंध आयु-आधारित है, मासिक धर्म-आधारित नहीं। दूसरा, इसे ‘अस्पृश्यता’ कहना संविधान की सीमा से बाहर जाना है।

पहले हिस्से में केंद्र का तर्क एक हद तक संगत है, लेकिन दूसरा हिस्सा उतना मजबूत नहीं है। यदि यह नियम केवल आयु पर आधारित है, तो फिर इसी आयु सीमा को चुनने का कारण क्या है? इसका सीधा उत्तर मासिक धर्म और उससे जुड़ी शुद्धता की अवधारणा की ओर जाता है।

अनुच्छेद 17 कोई कैलेंडर नहीं है। यह यह नहीं पूछता कि किसी महिला को तीन दिन के लिए बाहर रखा गया या तीन हफ्तों के लिए। यह यह पूछता है कि क्या उसे ऐसे आधार पर बाहर किया गया है, जिसे संविधान मान्यता नहीं देता।

यही वह सवाल है जिसे 1948 में संविधान निर्माताओं ने खुला छोड़ा था। देवराजैया, पीयूडीआर, अप्पा बालू इंगल और सफाई कर्मचारी आंदोलन जैसे मामलों ने पिछले 75 वर्षों में अलग-अलग तरीकों से इसी सवाल को आगे बढ़ाया है।

इसी विरासत के आधार पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने 2018 में इसका उत्तर दिया था। अब वर्तमान नौ-न्यायाधीशों की पीठ के सामने यह विकल्प है कि वह इस सवाल को खुला रखे और अनुच्छेद 17 को “किसी भी रूप में” पढ़े।

यही वह केंद्रीय प्रश्न है, जिस पर यह मामला टिका हुआ ह

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