
T20 वर्ल्ड कप में भारत से क्यों पीछे हटा पाकिस्तान, जानिए पूरी कहानी
टी20 वर्ल्ड कप में भारत के खिलाफ खेलने से पाकिस्तान के इनकार पर विवाद गहरा गया है। ICC की चेतावनी के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्रिकेट पर राजनीति हावी हो रही है।
“मेरी बात याद रखिए, भारत को यह नहीं मिलेगा। आप पूरी कोशिश कर लीजिए, फिर भी नहीं मिलेगा। वरिष्ठ खेल पत्रकार राकेश राव का यह दोटूक बयान उस तीखी बहस की शुरुआत करता है, जिसमें यह समझने की कोशिश की गई कि पाकिस्तान ने आगामी आईसीसी पुरुष टी20 वर्ल्ड कप में भारत के खिलाफ खेलने से इनकार क्यों किया और कैसे दक्षिण एशिया में क्रिकेट अब खेल से ज़्यादा राजनीति का मंच बनता जा रहा है।
पाकिस्तान के इस फैसले के बाद जब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) की ओर से कड़े प्रतिबंधों की चेतावनी आई, तो कई सवाल खड़े हो गए। क्या यह चुनिंदा बहिष्कार है? क्या इससे राजस्व को भारी नुकसान होगा? और क्या अब क्रिकेट सिर्फ भू-राजनीतिक संदेश देने का जरिया बन गया है? द फेडरल ने इस पूरे विवाद को समझने के लिए वरिष्ठ खेल पत्रकार प्रदीप मैगज़ीन और राकेश राव से बातचीत की।
गायब होता मैच
ताज़ा विवाद भारत-पाकिस्तान के उस ग्रुप स्टेज मुकाबले को लेकर है, जो अब होता दिख नहीं रहा। पाकिस्तान ने टूर्नामेंट में हिस्सा लेने की घोषणा तो की, लेकिन भारत के खिलाफ खेलने से इनकार कर दिया। जब यह साफ शब्दों में यह पूछा गया कि या तो आप खेलते हैं या नहीं खेलते। दर्शकों को सबसे ज़्यादा भ्रम इस बात से है कि अब चुनिंदा भागीदारी का चलन बढ़ गया है। कभी मैच खेलते हैं लेकिन हाथ नहीं मिलाते, कभी ट्रॉफी लेने से मना करते हैं और अब किसी खास टीम के खिलाफ खेलने से ही इनकार।
प्रदीप मैगज़ीन ने इसे दर्शकों के लिए बेहद उलझाने वाला बताया। उन्होंने कहा, “या तो खेलो या मत खेलो।” उनका मानना था कि भारत-पाक क्रिकेट के इर्द-गिर्द बार-बार होने वाला यह ड्रामा खेल की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचा रहा है।
पिच पर दक्षिण एशियाई राजनीति
दोनों पैनलिस्ट इस बात पर सहमत दिखे कि मामला सिर्फ क्रिकेट तक सीमित नहीं है। मैगज़ीन ने कहा कि दक्षिण एशिया की पड़ोसी राजनीति अब सीधे क्रिकेट के ज़रिये खेली जा रही है और हर देश अपने घरेलू दर्शकों को साधने में लगा है। पाकिस्तान अपने लोगों के लिए खेल रहा है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच तनावपूर्ण रिश्ते अब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पूरी तरह झलकने लगे हैं।
राकेश राव ने भी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि पाकिस्तान का यह कदम जानबूझकर भारत को शर्मिंदा करने की कोशिश है, न कि किसी खेल विवाद का समाधान। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इस ऐलान से पहले पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) का न तो बीसीसीआई से और न ही आईसीसी से कोई बड़ा टकराव था।
बांग्लादेश बना ट्रिगर
चर्चा में एक अहम मोड़ तब आया जब बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्तफिज़ुर रहमान को इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) में खेलने से रोके जाने का ज़िक्र हुआ। बाद में बांग्लादेश का पूरे टूर्नामेंट से हटना इस विवाद को और बढ़ा गया। मैगज़ीन ने तर्क दिया कि यहीं से खेल का राजनीतिकरण शुरू हुआ। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर भारत सुरक्षा कारणों का हवाला देकर बांग्लादेश के एक खिलाड़ी को रोक सकता है, तो फिर पूरे बांग्लादेशी दल से भारत में खेलने की उम्मीद कैसे कर सकता है? हालांकि राव ने याद दिलाया कि बांग्लादेश ने अपनी जगह स्कॉटलैंड को दिए जाने को चुपचाप स्वीकार कर लिया था। उन्होंने सवाल उठाया कि पाकिस्तान को इसमें कूदने की ज़रूरत ही क्या थी? उनके मुताबिक, बांग्लादेश के नाम पर पाकिस्तान की एकजुटता दिखाना मौकापरस्ती थी।
भारत को शर्मिंदा करने की कोशिश?
राव के अनुसार, पाकिस्तान का भारत के खिलाफ न खेलने का फैसला पूरी तरह से सोचा-समझा है। “पूरा मकसद भारत को शर्मिंदा करना है, उन्होंने कहा। उनका मानना है कि इस पूरे विवाद में भारत शुरुआत में था ही नहीं। उन्होंने चेतावनी दी कि पाकिस्तान ने आईसीसी को ही निशाने पर ले लिया है। भारत के खिलाफ न खेलकर पाकिस्तान प्रसारण अधिकारों और आईसीसी की कमाई को नुकसान पहुंचा रहा है और उसी कमाई में पाकिस्तान खुद भी हिस्सेदार है। राव ने कहा कि 2012 के बाद से कोई भी आईसीसी टूर्नामेंट ऐसा नहीं हुआ, जिसमें भारत और पाकिस्तान कम से कम एक बार न भिड़े हों । इससे इस मैच की वैश्विक क्रिकेट अर्थव्यवस्था में अहमियत साफ होती है।
ICC की सख्त चेतावनी
आईसीसी की प्रतिक्रिया तेज़ और असामान्य रूप से सख्त रही। राव ने बताया कि 1 फरवरी की रात आईसीसी का बयान आया, जिसकी भाषा बेहद सोच-समझकर चुनी गई थी। “यह सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि धमकी है उनका मानना है कि आईसीसी लंबे समय तक चलने वाले प्रतिबंध लगा सकता है, जिन्हें झेलना पाकिस्तान के लिए बेहद मुश्किल होगा।
राव ने इस धारणा को भी खारिज किया कि आईसीसी भारत की कठपुतली है। भारत की आर्थिक ताकत को स्वीकार करते हुए भी उन्होंने कहा कि आईसीसी के फैसले सामूहिक रूप से लिए जाते हैं।
क्या पाकिस्तान गलत आकलन कर रहा है?
मैगज़ीन ने सवाल उठाया कि क्या पाकिस्तान ने इसके नतीजों के बारे में ठीक से सोचा है। उन्होंने माना कि पाकिस्तान को राजनीतिक रुख अपनाने का अधिकार है, लेकिन क्रिकेट से मिलने वाली कमाई और सद्भावना खोना उसके अपने क्रिकेट ढांचे को नुकसान पहुँचा सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर पाकिस्तान दबाव में फैसला बदलता है, तो घरेलू स्तर पर उसे शर्मिंदगी झेलनी पड़ेगी। और अगर नहीं बदलता, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ सकता है।ब्लैकमेल दोनों तरफ से है मैगज़ीन ने कहा। उनका तर्क था कि भारत, एक बड़ा और आर्थिक रूप से मजबूत देश होने के नाते, उससे ज़्यादा समझदारी की उम्मीद की जाती है।
भारत की साख पर सवाल
संकेट उपाध्याय ने भारत के अपने विरोधाभासों की ओर इशारा किया। एक तरफ सैन्य कार्रवाइयों के बाद भी पाकिस्तान के साथ खेलना, और दूसरी तरफ पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर अलग-थलग दिखाने की कोशिश। राव ने इस पर बेहद साफ राय रखी। उन्होंने कहा कि भारत को या तो पाकिस्तान के खिलाफ खेलने से पूरी तरह इनकार कर देना चाहिए था, या फिर खेलने के बाद हाथ न मिलाने जैसे प्रतीकात्मक कदम नहीं उठाने चाहिए थे। बाहर से देखने वाले को यह सब बेतरतीब लगता है,” राव ने चेतावनी दी कि इस तरह के मिले-जुले संदेश भारत की वैश्विक साख को नुकसान पहुंचाते हैं।
ओलंपिक और अतिशयोक्ति
पैनल ने इस दावे को भी खारिज कर दिया कि ऐसे क्रिकेट विवाद भारत की ओलंपिक मेज़बानी की दावेदारी को नुकसान पहुँचा सकते हैं। राव ने स्पष्ट कहा कि पहली बार मेज़बानी करने वाले देश के रूप में भारत का ओलंपिक जीतना वैसे भी मुश्किल है। यह नंबरों का खेल है और इन आशंकाओं को अतिशयोक्ति बताया। मैगज़ीन ने भी सहमति जताई, हालांकि उन्होंने भारत को वैश्विक मंच पर एक परिपक्व दावेदार की तरह व्यवहार करने की सलाह दी।
आगे क्या?
दोनों पैनलिस्ट ने माना कि मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। राव का अनुमान है कि आईसीसी, ब्रॉडकास्टर्स और आर्थिक दबाव के चलते पाकिस्तान को अपने फैसले पर फिर से सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। आईसीसी को यहां एक लकीर खींचनी होगी। चुनिंदा भागीदारी किसी भी देश को मंज़ूर नहीं की जा सकती चाहे वह भारत ही क्यों न हो।
मैगज़ीन ने पाकिस्तान के अगले कदम को लेकर अनिश्चितता जताई, लेकिन उम्मीद जताई कि समाधान ऐसा हो जो राजनीति से ऊपर उठकर क्रिकेट को प्राथमिकता दे।
असहज भविष्य
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा नुकसान ब्रॉडकास्टर्स और दर्शकों का है। राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत-पाकिस्तान मैच आज भी क्रिकेट की सबसे बड़ी व्यावसायिक पेशकश है।पाकिस्तान चाहे झुके या अपने फैसले पर अड़ा रहे, यह प्रकरण साफ दिखाता है कि दक्षिण एशिया में क्रिकेट और राजनीति कितनी गहराई से एक-दूसरे में उलझ चुके हैं और जब राजनीति मैदान में उतरती है, तो वैश्विक क्रिकेट प्रशासन कितना अस्थिर हो सकता है।

