मुस्ताफिज़ुर रहमान एपिसोड : बांग्लादेश को पाकिस्तान की ओर और धकेलने का जोखिम उठा रहा है भारत
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पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव जीतने के लिए उतरी बीजेपी, जहां कथित तौर पर बांग्लादेशियों के भारतीय मतदाता बनकर वोट डालने का मुद्दा पार्टी का बड़ा राजनीतिक हथियार है, ने मुस्ताफिज़ुर को अपने बांग्लादेश-विरोधी एजेंडे को और आगे बढ़ाने का एक आसान जरिया बना लिया है। | फ़ाइल फोटो

मुस्ताफिज़ुर रहमान एपिसोड : बांग्लादेश को पाकिस्तान की ओर और धकेलने का जोखिम उठा रहा है भारत

इन घटनाक्रमों ने राजनयिकों को यह सवाल उठाने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भारत की अपने शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों के खिलाफ क्रिकेट को एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति, उसके विरोधियों से ज़्यादा नुकसान खुद भारत को पहुंचा सकती है।


बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्ताफिज़ुर रहमान को इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) से बाहर किए जाने का मामला अब एक बड़े विवाद में बदल गया है। यह भारत–बांग्लादेश के पहले से तनावपूर्ण संबंधों में तेज़ी से एक बड़े विवाद का रूप लेता जा रहा है। इसके जवाब में बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) ने अगले महीने होने वाले टी20 वर्ल्ड कप के लिए भारत में खेलने से इनकार कर दिया है, जबकि भारत इस टूर्नामेंट का मेज़बान है। बीसीबी ने लंदन स्थित अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) से औपचारिक रूप से अनुरोध किया है कि उसके मैचों को किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित किया जाए।

इतना ही नहीं, बांग्लादेश ने अपने देश में आईपीएल के प्रसारण पर भी रोक लगा दी है। इन घटनाओं ने उपमहाद्वीप के राजनयिकों और क्रिकेट प्रेमियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भारत द्वारा शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों के खिलाफ क्रिकेट को एक राजनीतिक औज़ार की तरह इस्तेमाल करना, विरोधियों की तुलना में भारत को ही ज़्यादा नुकसान पहुंचाएगा।

मुस्ताफिज़ुर को लेकर भारत का फैसला

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने फैसला किया कि हाल ही में आईपीएल नीलामी में कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) द्वारा खरीदे गए मुस्ताफिज़ुर को लीग से बाहर किया जाए और उन्हें स्वदेश लौटने के लिए कहा जाए। बीसीसीआई का यह निर्णय बीते कुछ हफ्तों में बांग्लादेश में हिंदू और बौद्ध धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों की श्रृंखला के बाद लिया गया, जिनमें दो हिंदू पुरुषों की हत्या और उन्हें जलाए जाने की घटनाएं भी शामिल हैं।

पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव जीतने की कोशिशों में जुटी बीजेपी, जहां कथित बांग्लादेशियों के भारतीय मतदाता बनकर वोट डालने का मुद्दा एक बड़ा राजनीतिक हथियार है, ने मुस्ताफिज़ुर को अपने बांग्लादेश-विरोधी अभियान को और तेज़ करने के लिए एक उपयोगी औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया है।

उपमहाद्वीप में आईपीएल की लोकप्रियता

आईपीएल दक्षिण एशिया के सबसे आकर्षक और सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले क्रिकेट टूर्नामेंट्स में से एक है, जिसे न सिर्फ भारत में बल्कि देश और क्षेत्र से बाहर भी बड़े पैमाने पर देखा जाता है। बीते वर्षों में इसने क्रिकेट खेलने वाले देशों के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को आकर्षित किया है और उपमहाद्वीप व अन्य क्षेत्रों के हर उभरते क्रिकेटर का सपना बन गया है कि वह कभी आईपीएल का हिस्सा बने।

तेज़ गेंदबाज़ मुस्ताफिज़ुर बांग्लादेश में एक बड़े क्रिकेट स्टार हैं और आईपीएल में उनकी भागीदारी ने पड़ोसी देश में लीग के विशाल दर्शक वर्ग के लिए एक अतिरिक्त आकर्षण जोड़ दिया था।

मुस्ताफिज़ुर को आईपीएल नीलामी में कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) ने 9.2 करोड़ रुपये की कीमत पर खरीदा था। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि खिलाड़ी को वह पूरी राशि दी जाएगी या नहीं, लेकिन आईपीएल से बाहर किए जाने के कारण उनके स्टार क्रिकेटर के साथ हुई कथित बेइज्जती ने ही बांग्लादेशियों को मुस्ताफिज़ुर के समर्थन में एकजुट कर दिया है।

हसीना के बाद भारत–बांग्लादेश संबंध

दोनों देशों के रिश्तों में तब से तेज़ गिरावट आई है, जब बांग्लादेश की सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं शेख़ हसीना को अगस्त 2024 में नौकरी में आरक्षण को लेकर हुए छात्र आंदोलन के हिंसक हो जाने के बाद सत्ता से बेदखल कर देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

शेख़ हसीना भारत के लिए एक आदर्श साझेदार मानी जाती थीं, जिनके लंबे शासनकाल के दौरान भारत और बांग्लादेश के बीच सबसे सहयोगपूर्ण और सौहार्दपूर्ण रिश्ते देखने को मिले। ढाका से भागने के बाद से वह दिल्ली में रह रही हैं।

इस बीच, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार ने सत्ता संभाली है, जिसमें छात्र नेताओं को विशेष सलाहकार बनाया गया है। इस सरकार ने बांग्लादेश को पाकिस्तान के कहीं अधिक नज़दीक ला दिया है—इतना करीब, जितना वह 1971 में पाकिस्तान से स्वतंत्रता के बाद कभी नहीं रहा था।

इसके साथ ही, इस्लामवादी ताक़तों की संख्या और प्रभाव में भी जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, खासकर जमात-ए-इस्लामी की, जो बांग्लादेश के गठन के समय सबसे आगे रहकर विरोध करने वाली पार्टी थी।

हसीना के बाद के बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दलों में से एक बनकर उभरी है। आगामी फरवरी में होने वाले संसदीय चुनाव में छात्रों द्वारा बनाई गई अपनी राजनीतिक पार्टी—नेशनल सिटिज़न्स पार्टी (NCP)—और जमात के बीच संभावित गठबंधन ने देश के धर्मनिरपेक्ष तबकों और भारत, दोनों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

अब भारत के लिए सबसे बेहतर विकल्प BNP

अंतरिम सरकार ने छात्र आंदोलन के दौरान हुई बड़ी संख्या में मौतों के लिए शेख़ हसीना को ज़िम्मेदार ठहराते हुए उन्हें मृत्युदंड की सज़ा सुनाई है। हालांकि कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह कदम फरवरी में होने वाले संसदीय चुनाव से हसीना और उनकी अवामी लीग पार्टी को बाहर रखने की रणनीति का हिस्सा है।

इन परिस्थितियों में, शेख़ हसीना के शासनकाल के दौरान मुख्य विपक्षी रही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) बांग्लादेश में भारत के लिए सबसे बेहतर विकल्प के रूप में उभरकर सामने आई है।

ढाका में पहले रही बीएनपी सरकार के साथ भारत का अनुभव उत्साहजनक नहीं रहा है। लेकिन संसदीय चुनाव में शेख़ हसीना या उनकी पार्टी की भागीदारी न होने की स्थिति में, बीएनपी भारत के लिए सबसे बेहतर विकल्प बनकर उभरी है—खासकर इसलिए भी क्योंकि वह चुनाव में जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन के खिलाफ मैदान में है। हालिया एक चुनावी सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि बांग्लादेश में 70 प्रतिशत से अधिक मतदाता अगली सरकार बनाने के लिए बीएनपी को वोट देने की संभावना रखते हैं।

व्यापारोन्मुख बीएनपी नेतृत्व के भारत के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की संभावना है, इसके पीछे भौगोलिक और आर्थिक—दोनों कारण हैं, क्योंकि भारत बांग्लादेश का सबसे बड़ा और सबसे नज़दीकी बाज़ार है। पिछले सप्ताह पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी नेता खालिदा ज़िया के निधन के बाद, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के अन्य वरिष्ठ सदस्यों ने उनके बेटे और बीएनपी नेता तारिक रहमान के प्रति संवेदना व्यक्त की।

कूटनीतिक हलकों में इसे भारत की ओर से तारिक रहमान तक पहुंच बनाने की इच्छा के रूप में देखा गया, जिन्हें व्यापक रूप से बांग्लादेश का अगला प्रधानमंत्री माना जा रहा है, ताकि भविष्य में सहयोगपूर्ण रिश्ते बनाए जा सकें। हालांकि, मुस्ताफिज़ुर का मुद्दा एक बार फिर सब कुछ उलट-पुलट कर गया और संसदीय चुनाव में अब बस कुछ ही हफ्ते बचे होने के बीच बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावनाओं को भड़का दिया।

भारत का फैसला उलझन भरा

बीते कुछ महीनों में भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच बढ़ती नज़दीकियों को लेकर चिंतित रहा है। दोनों देशों के बीच रक्षा और खुफिया प्रतिनिधिमंडलों के कई आदान-प्रदान हुए हैं, जिसके चलते भारतीय तंत्र को अपने पूर्वी मोर्चे पर ध्यान और तेज़ करना पड़ा है—वह मोर्चा जो शेख़ हसीना की सरकार के दौरान अपेक्षाकृत शांत और स्थिर बना हुआ था।

पिछले दौर की बैठकों और संवादों में भारत लगातार इस बात को दोहराता रहा है कि वह एक स्थिर, शांतिपूर्ण और समृद्ध बांग्लादेश के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है, और इसके साथ ही दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी संपर्क बढ़ाने पर विशेष ज़ोर देता रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन प्रयासों का बड़ा मक़सद यह सुनिश्चित करना था कि बांग्लादेश पाकिस्तान के प्रभाव क्षेत्र में न चला जाए। ऑपरेशन सिंदूर के बाद दुबई में आयोजित एक अन्य अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट टूर्नामेंट के दौरान भारत ने पाकिस्तान के क्रिकेटरों के साथ औपचारिक सौजन्य का आदान-प्रदान करने से इनकार कर दिया था, हालांकि उसने पाकिस्तान के खिलाफ कई मैच खेले थे।

अब बांग्लादेश में हिंदुओं पर हालिया हमलों को आधार बनाकर बांग्लादेश को भी एक शत्रुतापूर्ण देश की श्रेणी में रख देना, उस नीति के बिल्कुल विपरीत है, जिससे दिल्ली अब तक पूरी कोशिश करती रही है कि ऐसी स्थिति न बने।

यदि जल्द ही इस दिशा में सुधार नहीं किया गया, तो मुस्ताफिज़ुर रहमान प्रकरण न केवल बांग्लादेश में व्यापक भारत-विरोधी भावनाओं को जन्म देगा, बल्कि बांग्लादेश को पाकिस्तान की ओर और धकेल देगा, ताकि वह भारत के खिलाफ साझा मोर्चा बना सके।

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