
महिला आरक्षण लागू करने की जल्दबाजी या सियासी खेल? विपक्ष ने पूछे तीखे सवाल
लोकसभा और विधानसभाओं में महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की केंद्र की योजना पर विपक्ष सवाल उठा रहा है। परिसीमन, पारदर्शिता को लेकर विपक्ष और सरकार के बीच नया विवाद खड़ा कर दिया है।
केंद्र सरकार द्वारा महिला आरक्षण को जल्द लागू करने के लिए परिसीमन प्रक्रिया को जल्द से जल्द कराए जाने की कोशिश ने राजनीतिक माहौल को एक बार फिर गर्म कर दिया है। विपक्ष ने इस कदम के समय और पारदर्शिता दोनों पर सवाल उठाए हैं। सरकार जहां संशोधन के जरिए इस प्रक्रिया को तेज करने की संभावनाएं तलाश रही है, वहीं निष्पक्षता, संघीय संतुलन और संवैधानिक सिद्धांतों को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आ रही हैं।
फिर बैकफुट पर विपक्ष?
2023 और वर्तमान स्थिति में स्पष्ट अंतर है। 2023 में महिला आरक्षण विधेयक विशेष सत्र में अचानक लाया गया था, जब INDIA गठबंधन आकार ले रहा था। यह 2024 चुनावों से पहले सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा था। उस समय कोई भी विपक्षी दल इस विधेयक का विरोध नहीं कर सका, क्योंकि यह देश की आधी आबादी से जुड़ा मुद्दा है। यहां तक कि सोनिया गांधी ने भी इसे “हमारा बिल” बताते हुए समर्थन दिया था, क्योंकि इसे UPA सरकार के दौरान राज्यसभा में पारित किया गया था।
हालांकि, उस समय सबसे बड़ी समस्या यह थी कि कानून में इसके लागू होने की कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं थी। इसमें कहा गया था कि 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना और उसके बाद परिसीमन के बाद ही इसे लागू किया जाएगा। जनगणना में देरी के कारण यह स्पष्ट नहीं था कि यह 2029, 2034 या उससे भी बाद में लागू होगा।
सरकार अब क्या बदलना चाहती है?
मौजूदा कानून के तहत महिला आरक्षण 2034 से पहले लागू होना मुश्किल है, क्योंकि यह जनगणना और परिसीमन पर निर्भर है। अब सरकार इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करने का प्रस्ताव दे रही है। इससे परिसीमन जल्दी हो सकता है और 2029 तक महिला आरक्षण लागू किया जा सकता है।लेकिन इस प्रस्ताव ने विवाद खड़ा कर दिया है, क्योंकि यह 2023 के कानून में तय प्रक्रिया को बदल देता है।
विपक्ष का विरोध क्यों?
विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने की जरूरत ही नहीं है। उनका तर्क है कि महिलाओं की आबादी हर क्षेत्र में लगभग 50 प्रतिशत है, इसलिए सीटों की सीमाएं बदले बिना भी आरक्षण लागू किया जा सकता है।अब जब सरकार संशोधन के जरिए परिसीमन को फिर से शामिल कर रही है, तो विपक्ष को डर है कि इसे “पिछले दरवाजे” से लाया जा रहा है, जिससे बड़े राजनीतिक और संरचनात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।
पारदर्शिता पर सवाल
विपक्ष का आरोप है कि इस मुद्दे पर चर्चा पारदर्शी तरीके से नहीं हो रही है। कुछ चुनिंदा सांसदों के साथ अनौपचारिक बातचीत की गई है, जबकि विपक्ष चाहता है कि इस पर सर्वदलीय बैठक हो। मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी सुझाव दिया था कि राज्य चुनावों के बाद इस पर खुली चर्चा हो, लेकिन सरकार ने अब तक ऐसा नहीं किया है।
दक्षिणी राज्यों की चिंता
दक्षिणी राज्यों को लंबे समय से डर है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने से उनकी राजनीतिक ताकत कम हो सकती है, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई है। सरकार लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव दे रही है, जो देखने में संतुलित लगता है।लेकिन विपक्ष का कहना है कि इससे राज्यों के बीच अंतर और बढ़ जाएगा। उदाहरण के लिए, तेलंगाना की सीटें 17 से 26 हो सकती हैं, जबकि उत्तर प्रदेश की 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। इससे दक्षिणी राज्यों का प्रभाव कम हो सकता है।
राजनीतिक असर क्या होगा?
विपक्ष का आरोप है कि यह बदलाव सत्ताधारी दल के लिए फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि उसकी ताकत मुख्य रूप से उत्तरी और हिंदी भाषी राज्यों में केंद्रित है। यदि इन क्षेत्रों में सीटें बढ़ती हैं, तो भविष्य में सत्ता परिवर्तन और कठिन हो सकता है।
संवैधानिक चुनौती की संभावना
यह मुद्दा संविधान के “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” सिद्धांत से भी जुड़ा है। वर्तमान में भी असंतुलन है—उत्तर प्रदेश में एक सांसद लगभग 24 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि तमिलनाडु में यह संख्या करीब 18.5 लाख है। नए बदलाव से यह अंतर और बढ़ सकता है, जिसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण का मुद्दा
विपक्ष की एक और मांग है कि महिला आरक्षण में ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा हो। लेकिन यह जाति आधारित आंकड़ों पर निर्भर करता है। 2011 की जनगणना में यह डेटा नहीं है, जबकि अगली जनगणना में इसे शामिल किए जाने की संभावना है। ऐसे में पुराने डेटा का उपयोग इस मांग को नजरअंदाज करने जैसा माना जा रहा है।
आरक्षण लागू करने का तरीका अस्पष्ट
महिला आरक्षण कैसे लागू होगा, इस पर अभी स्पष्टता नहीं है। दो मॉडल सामने हैं—एक, स्थानीय निकायों की तरह हर चुनाव में सीटों का रोटेशन; दूसरा, SC/ST आरक्षण की तरह सीटों को स्थिर रखना। सरकार ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि वह कौन सा मॉडल अपनाएगी। महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की कोशिश ने जहां एक ओर उम्मीदें बढ़ाई हैं, वहीं दूसरी ओर कई राजनीतिक, संवैधानिक और संघीय सवाल भी खड़े कर दिए हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा देश की राजनीति में बड़ा विवाद बन सकता है।

