महिला आरक्षण के बहाने सीट बढ़ोतरी-परिसीमन, क्या विपक्ष फंस गया है?
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महिला आरक्षण के बहाने सीट बढ़ोतरी-परिसीमन, क्या विपक्ष फंस गया है?

महिला आरक्षण को जल्दी लागू करने और लोकसभा सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव ने विपक्ष को दुविधा में डाल दिया है, क्योंकि इससे परिसीमन के जरिए सियासी संतुलन बदल सकता है।


केंद्र सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम में बदलाव करने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत महिलाओं के लिए आरक्षण को जल्दी लागू करने के साथ-साथ लोकसभा की सीटों की संख्या सभी राज्यों में 50 प्रतिशत बढ़ाने की बात कही गई है।इस प्रस्ताव ने विपक्ष को मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। एक तरफ विपक्ष महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू होने में रुकावट डालता हुआ नहीं दिखना चाहता, लेकिन दूसरी तरफ वह इस प्रस्ताव का समर्थन भी नहीं करना चाहता।

विपक्ष को चिंता है कि अगर वह इस प्रस्ताव का समर्थन करता है, तो इसके साथ होने वाली परिसीमन प्रक्रिया ऐसी हो सकती है, जिससे सत्तारूढ़ भाजपा को चुनाव में फायदा मिल जाए और विपक्षी दलों को नुकसान उठाना पड़े। विपक्ष न तो महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया में बाधा डालता हुआ दिखना चाहता है, और न ही केंद्र के इस प्रस्ताव का समर्थन करना चाहता है, क्योंकि इससे परिसीमन की ऐसी प्रक्रिया का रास्ता साफ हो सकता है, जो सत्तारूढ़ भाजपा के विरोधियों को चुनावी रूप से नुकसान पहुंचा सकती है।


पिछले महीने केंद्र ने कुछ विपक्षी नेताओं से संपर्क कर सितंबर 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को जल्द लागू करने की योजना पर चर्चा की थी। सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्षी नेताओं—जिनमें एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और एनसीपी-एसपी सांसद सुप्रिया सुले शामिल थे—को बताया कि सरकार 2023 के कानून में उस प्रावधान को हटाने पर विचार कर रही है, जिसमें 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर परिसीमन को महिला आरक्षण लागू करने की पूर्व शर्त बनाया गया था।

बताया जाता है कि सरकार लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों को बढ़ाकर 816 करने के लिए तैयार है और 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करना चाहती है, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव तक महिला आरक्षण लागू किया जा सके। प्रत्येक राज्य की लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत की समान वृद्धि का प्रस्ताव उन विपक्षी दलों को शांत करने के लिए था, जो आशंका जता रहे थे कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से दक्षिणी राज्यों को नुकसान होगा और उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे हिंदीभाषी राज्यों को फायदा मिलेगा। हालांकि, इस प्रस्ताव ने भाजपा के विरोधियों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने इस पर कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि सीटों में समान वृद्धि का यह फार्मूला दक्षिणी राज्यों को हाशिए पर धकेल देगा और उत्तरी राज्यों को असमान रूप से लाभ पहुंचाएगा।

रेड्डी के अनुसार, इस फार्मूले से तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु की कुल सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जाएंगी—यानी 66 सीटों की बढ़ोतरी। वहीं केवल उत्तर प्रदेश और बिहार की सीटें 120 से बढ़कर 180 हो जाएंगी—यानी 60 सीटों की वृद्धि। यदि दिल्ली, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, पंजाब और झारखंड जैसे राज्यों की संभावित वृद्धि भी जोड़ दी जाए, तो इन राज्यों का कुल आंकड़ा 471 सीटों तक पहुंच सकता है, जो 816 सदस्यीय लोकसभा में बहुमत के आंकड़े 408 से काफी अधिक होगा। इसके मुकाबले पांचों दक्षिणी राज्यों के पास केवल 195 सीटें होंगी।

रेड्डी ने कहा कि यदि केंद्र परिसीमन पर अड़ा रहता है, तो राज्यों के बीच मौजूदा प्रतिनिधित्व के अंतर को बनाए रखना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, तेलंगाना के पास वर्तमान में 17 सीटें हैं, जबकि उत्तर प्रदेश के पास 80 सीटें हैं—यानी 63 सीटों का अंतर। 50 प्रतिशत वृद्धि के बाद यह अंतर बढ़कर 94 सीटों तक पहुंच जाएगा।

तमिलनाडु के विरुधुनगर से सांसद और कांग्रेस के लोकसभा व्हिप मणिकम टैगोर ने भी रेड्डी के विचारों का समर्थन करते हुए कहा कि यह फार्मूला दक्षिणी राज्यों को राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल देगा और सत्ता संतुलन को हिंदी पट्टी की ओर झुका देगा।इंडिया गठबंधन के सूत्रों का कहना है कि इस मुद्दे पर व्यापक सहमति है। एक वरिष्ठ डीएमके सांसद ने कहा कि यह चिंता नई नहीं है और पहले भी उठाई जा चुकी है। उन्होंने बताया कि एक साल पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने दक्षिणी राज्यों को एकजुट होकर इस मुद्दे को उठाने की पहल की थी।

हालांकि, विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि केंद्र ने महिला आरक्षण के शीघ्र कार्यान्वयन के प्रस्ताव के साथ परिसीमन को जोड़ दिया है। विपक्ष का मानना है कि यह एक राजनीतिक रणनीति है, जिससे भाजपा को दीर्घकालिक चुनावी लाभ मिल सकता है। एक सीपीएम सांसद ने कहा कि भाजपा दक्षिण भारत में अपने प्रभाव का विस्तार नहीं कर पाई है, इसलिए वह परिसीमन के माध्यम से राजनीतिक समीकरण बदलना चाहती है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार 2027 की जनगणना के बाद अलग से परिसीमन कानून लाती है, तो उसे संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी, जो एनडीए के पास नहीं है। इसलिए सरकार महिला आरक्षण के मुद्दे के साथ इसे जोड़कर आगे बढ़ाना चाहती है, क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल महिलाओं के आरक्षण का विरोध करता हुआ नहीं दिखना चाहेगा।

विपक्ष ने सरकार से मांग की है कि वह इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाए। कांग्रेस के राज्यसभा मुख्य सचेतक जयराम रमेश ने कहा कि विपक्ष ने सरकार से अनुरोध किया है कि 29 अप्रैल के बाद—जब असम, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव समाप्त हो जाएंगे—इस विषय पर चर्चा के लिए बैठक आयोजित की जाए।हालांकि, भाजपा सूत्रों का कहना है कि मौजूदा सत्र में संशोधन न लाना केवल एक रणनीतिक कदम है और सरकार भविष्य में विशेष सत्र बुलाकर इसे पारित कराने की कोशिश कर सकती है।

अब विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह परिसीमन के खिलाफ अपनी चिंताओं को प्रभावी ढंग से रखे, लेकिन साथ ही महिला आरक्षण के विरोधी के रूप में भी न दिखे। कुछ विपक्षी नेताओं का मानना है कि वे संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 में संशोधन की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाकर इस मुद्दे का समाधान खोज सकते हैं, क्योंकि इन संशोधनों के लिए दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होगा।

एक कांग्रेस सांसद, जो पेशे से वकील भी हैं, ने कहा कि विपक्ष महिला आरक्षण के शीघ्र कार्यान्वयन का समर्थन कर सकता है, लेकिन लोकसभा की संरचना बदलने से जुड़े संशोधनों का विरोध कर सकता है। उनके अनुसार, वर्तमान परिस्थितियों में यही विपक्ष के लिए सबसे व्यावहारिक रास्ता हो सकता है।

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