ZEE NEWS को ‘पक्षपातपूर्ण और सांप्रदायिक रिपोर्टिंग’ करना पड़ा भारी, नमाज़ से जाम का दावा करने पर लगा जुर्माना
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ZEE NEWS को ‘पक्षपातपूर्ण और सांप्रदायिक रिपोर्टिंग’ करना पड़ा भारी, नमाज़ से जाम का दावा करने पर लगा जुर्माना

Zee News पर जुर्माना लगाया गया क्योंकि उसने एक प्रसारण में नमाज़ पढ़ने की घटना को ट्रैफिक जाम से जोड़ दिया था। जांच में यह दावा गलत पाया गया।


टीवी पत्रकारिता और गलत जानकारी के बीच की रेखा तब धुंधली हो गई जब एक प्राइम टाइम शो में यह दावा किया गया कि जम्मू–श्रीनगर हाईवे पर एक मुस्लिम ट्रक ड्राइवर द्वारा नमाज़ पढ़ने से ट्रैफिक जाम लगा। बाद में यह दावा गलत साबित हुआ। इस मामले ने मीडिया की जिम्मेदारी पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।। इस मामले के बाद नियामक कार्रवाई हुई और भारतीय न्यूजरूम में जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठे।

The Federal के कार्यक्रम “AI With Sanket” में वरिष्ठ पत्रकार जावेद अंसारी और अदिति फडनीस से बातचीत की गई। चर्चा का विषय था News Broadcasting and Digital Standards Authority (NBDSA) द्वारा ज़ी न्यूज़ के खिलाफ हाल ही में दिया गया आदेश, टीवी पत्रकारिता में बढ़ता संकट, और क्या आत्म-नियमन (self-regulation) इस गिरावट को रोकने के लिए काफी है।

यह विवाद 3 मार्च 2025 के उस प्रसारण से शुरू हुआ, जिसमें ज़ी न्यूज़ ने एक वायरल सोशल मीडिया वीडियो चलाया। हेडलाइन में दावा किया गया कि जम्मू में एक मुस्लिम ट्रक ड्राइवर के नमाज़ पढ़ने से ट्रैफिक जाम लग गया। अगले दिन इस पर शिकायत दर्ज हुई, जिसमें कहा गया कि खबर की पुष्टि नहीं की गई थी और उसे सांप्रदायिक रंग दिया गया था। बाद में NBDSA की जांच में यह सामने आया कि ट्रैफिक जाम असल में भूस्खलन (landslide) और सामान्य सड़क अवरोध की वजह से लगा था, ना कि वीडियो में दिखाए गए व्यक्ति के कारण।

चैनल ने अपनी सफाई में कहा कि जब वीडियो प्रसारित किया गया था, तब उसकी पुष्टि नहीं हुई थी। बाद में जब गलती पता चली, तो वीडियो हटा दिया गया। चैनल ने यह भी डिस्क्लेमर चलाया था कि वह इस सामग्री की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका है। News Broadcasting and Digital Standards Authority (NBDSA) ने चैनल पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया और सदस्य प्रसारकों के लिए तथ्य-जांच से जुड़े नियमों को मजबूत करने के लिए छह निर्देश जारी किए।

यह कोई अपवाद नहीं

जावेद अंसारी के अनुसार, यह घटना कोई अलग या दुर्लभ मामला नहीं है, बल्कि मीडिया में गहरी समस्या का संकेत है। उन्होंने कहा, 'यह कोई अपवाद नहीं है… दुर्भाग्य से यह अब सामान्य बात बन चुकी है।'उनका कहना है कि आजकल टीवी समाचार और तथ्यों के बीच का संबंध कई बार सिर्फ संयोग जैसा रह गया है। उन्होंने फैसले का स्वागत तो किया, लेकिन इसे नाकाफी बताया। उनका मानना है कि यह समस्या सिर्फ एक चैनल तक सीमित नहीं है, बल्कि कई मीडिया संस्थानों में फैली हुई है। अंसारी के मुताबिक, टीवी पत्रकारिता में अब स्टीरियोटाइप बनाना, किसी को बदनाम करना और पहले से तय कहानी के हिसाब से रिपोर्टिंग करना आम हो गया है। उन्होंने कहा कि जब सख्त जवाबदेही नहीं होती, तो ऐसे काम करने का हौसला बढ़ जाता है।

अदिति फडनिस ने भी इस चिंता से सहमति जताई। उन्होंने मौजूदा माहौल को 'परेशान करने वाला' बताया और कहा कि आजकल तथ्यों की सटीकता को लेकर लापरवाही बढ़ गई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि समस्या सिर्फ सांप्रदायिक एंगल तक सीमित नहीं है, बल्कि सामान्य गलतियों और बिना पुष्टि की खबरें चलाने तक फैली हुई है।



तथ्य जांच की विफलता

इस बहस का सबसे बड़ा सवाल यह है: क्या कोई राष्ट्रीय न्यूज चैनल ऐसी सामग्री दिखा सकता है, जिसकी सत्यता की पुष्टि वह खुद नहीं कर पा रहा है? फडनिस का जवाब साफ था। उनके अनुसार, पत्रकारिता की नींव पक्के और सही तथ्यों पर टिकी होती है।

उन्होंने कहा, 'जब तक आप पूरी तरह आश्वस्त न हों कि आप तथ्यात्मक रूप से सही हैं, तब तक आपको वह बात नहीं कहनी चाहिए।' उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए कि कोई चीज़ वायरल है, वह सच नहीं हो जाती। फडनिस ने माना कि पत्रकारों से पहले भी गलतियां हुई हैं। लेकिन उन्होंने दो तरह की गलतियों में फर्क बताया- एक, जब गलत स्रोत की वजह से गलती हो जाए। दूसरी, जब जानबूझकर बिना पुष्टि की सोशल मीडिया सामग्री प्रसारित कर दी जाए। उनके अनुसार, दूसरी तरह की गलती एक बड़ी समस्या को दिखाती है, जहां तेजी और लोकप्रियता (likes, views, TRP) को संपादकीय सावधानी से ज्यादा महत्व दिया जा रहा है।

जावेद अंसारी ने इस बात को आगे बढ़ाते हुए पुराने न्यूज़रूम के नियमों को याद किया। उन्होंने कहा कि पहले किसी खबर को प्रकाशित करने से पहले दो स्वतंत्र स्रोतों से उसकी पुष्टि जरूरी होती थी। कई बार पुष्टि होने तक खबर को हफ्तों रोका जाता था। उनका मानना है कि 24/7 न्यूज़ के दौर में यह अनुशासन कमजोर पड़ गया है।

TRP का दबाव

दोनों पत्रकारों ने कहा कि पत्रकारिता के गिरते स्तर के पीछे TRP और वायरल होने की होड़ बड़ी वजह है। अंसारी ने इस तर्क की आलोचना की कि 'लोग यही देखना चाहते हैं', इसलिए सनसनीखेज खबरें दिखाई जाती हैं। उनके अनुसार, रेटिंग्स अक्सर दर्शकों के सबसे निचले स्तर की पसंद को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। अगर सिर्फ लोकप्रियता के आधार पर फैसले होंगे, तो न्यूज आसानी से मनोरंजन बन सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि आज पत्रकारिता को 'कंटेंट' की तरह देखा जा रहा है। इससे तथ्य आधारित रिपोर्टिंग और दर्शकों को आकर्षित करने वाले प्रोग्राम के बीच की रेखा धुंधली हो रही है। उनके शब्दों में, 'सबसे बड़ा नुकसान न्यूज का हुआ है।'

अदिति फडनिस ने इस चर्चा को डिजिटल मीडिया तक बढ़ाया। उन्होंने कहा कि प्रभाव और फॉलोअर्स बढ़ाने की दौड़ ने संकट को और गहरा कर दिया है। जब पत्रकारिता को लोगों को प्रभावित करने के बराबर माना जाता है, तो यह इस पेशे के असली उद्देश्य को बिगाड़ देता है।

इन्फ्लुएंसर बनाम पत्रकार

इन्फ्लुएंसर के पत्रकार की भूमिका निभाने के बढ़ते चलन पर भी कड़ी आलोचना की गई। अदिति फडनिस ने कहा कि ये दोनों भूमिकाएं एक-दूसरे से अलग हैं और साथ नहीं चल सकतीं। उनके अनुसार, इन्फ्लुएंसर आमतौर पर ट्रेंड को बढ़ावा देते हैं और अक्सर कहानी का एक ही पक्ष दिखाते हैं। जबकि पत्रकारिता में कई पक्ष दिखाना और निष्पक्ष रहना जरूरी होता है। उन्होंने साफ कहा, 'आप एक साथ इन्फ्लुएंसर और पत्रकार नहीं हो सकते। आपको एक ही होना पड़ेगा।' उनका मानना है कि इन दोनों भूमिकाओं के मिल जाने से संपादकीय अनुशासन कमजोर होता है और खबरें जनहित की बजाय खास दर्शक वर्ग को ध्यान में रखकर, एकतरफा तरीके से पेश की जाने लगती हैं।

NBDSA के छह नियम

अपने फैसले में News Broadcasting and Digital Standards Authority (NBDSA) ने छह मुख्य सिद्धांत दोहराए:

सोशल मीडिया की सामग्री प्रसारित करने से पहले उसकी पुष्टि जरूरी है।

जहां संभव हो, जानकारी की जमीनी रिपोर्टिंग या भरोसेमंद स्रोत से पुष्टि की जाए।

फोटो और वीडियो की जांच की जाए कि वे एडिटेड या AI से तो नहीं बनाए गए हैं।

किसी भी सामग्री को संदर्भ से बाहर पेश न किया जाए।

सेना की कार्रवाई, आंतरिक अशांति या सांप्रदायिक हिंसा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते समय जनहित और सटीकता का खास ध्यान रखा जाए।

इन नियमों का उद्देश्य पत्रकारिता में जिम्मेदारी और सच्चाई को मजबूत करना है।

सिर्फ यह लिख देना कि सामग्री की पुष्टि नहीं हुई है (डिस्क्लेमर देना) जिम्मेदारी से बचने का तरीका नहीं हो सकता। दोनों पैनलिस्टों ने कहा कि ये सभी दिशा-निर्देश कोई नए नियम नहीं हैं, बल्कि पुराने पत्रकारिता के सिद्धांतों की ही याद दिलाते हैं। जावेद अंसारी ने कहा, 'यह तो पुरानी पत्रकारिता के बुनियादी नियम हैं।' उन्होंने सवाल उठाया कि इन नियमों का पालन कौन करवाएगा और बार-बार गलती करने पर क्या सजा होगी। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तो ये नियम सिर्फ दिखावे तक सीमित रह जाएंगे।

कमज़ोर सजा

अंसारी के अनुसार, 1 लाख रुपये का जुर्माना किसी बड़े न्यूज चैनल के लिए कुछ भी नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि सुधारात्मक कदम के तौर पर माफी भी उसी प्रमुखता (prominence) और समय तक चलाई जानी चाहिए, जितनी देर और जिस तरह से गलत खबर चलाई गई थी। उन्होंने कहा, 'इसे सिर्फ नीचे स्क्रॉल में मत चलाइए।' माफी को प्राइम टाइम में हेडलाइन के रूप में दिखाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि बार-बार गलती करने वाले चैनलों का नाम सार्वजनिक करना जरूरी हो सकता है, ताकि दोबारा ऐसी गलती न हो।

अदिति फडनिस ने यह भी बताया कि नियामक फैसलों में देरी भी असर को कम कर देती है। इस मामले में शिकायत से लेकर फैसला आने तक लगभग एक साल लग गया। तब तक गलत जानकारी लोगों की सोच पर स्थायी प्रभाव डाल चुकी हो सकती है।

एक गहरा और व्यापक संकट

दोनों पत्रकारों की चिंता सिर्फ एक चैनल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम में आ रही गिरावट को लेकर है। जब अफवाहों को बार-बार सच की तरह दिखाया जाता है, बिना पुष्टि वाले वीडियो पर सांप्रदायिक एंगल जोड़ा जाता है, और पहले से तय कहानी (नैरेटिव) के आधार पर रिपोर्टिंग की जाती है, तो इसका असर धीरे-धीरे समाज पर पड़ता है। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी पत्रकारिता से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है और मीडिया संस्थानों पर लोगों का भरोसा कम हो सकता है। जब दर्शकों को लगातार ऐसी जानकारी मिलती है जो बाद में गलत साबित हो जाती है, तो सच्चाई पहचानने की जिम्मेदारी दर्शकों पर आ जाती है। यह जिम्मेदारी का गलत और चिंताजनक बदलाव है। आखिर में चर्चा मूल बातों पर वापस आई। उनके अनुसार, पत्रकारिता न तो मनोरंजन है और न ही कंटेंट मार्केटिंग।

यह एक पेशा है, जो कुछ नियमों पर चलता है - तथ्य जांच (verification), पुष्टि (corroboration), सही संदर्भ (context) और जवाबदेही (accountability)। क्या मीडिया उद्योग खुद को सुधार पाएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन यह मामला दिखाता है कि भारतीय टीवी पत्रकारिता में नैतिकता पर बहस अब सिर्फ धारणा (perception) की नहीं रही — बल्कि दर्ज की गई गलतियों और नियामक कार्रवाई की बात है।

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