
दिमाग खाने वाले अमीबा का बढ़ा खतरा, बेअसर क्लोरीन! जलवायु परिवर्तन वजह
एक बार यह संक्रमण हो जाता है तो व्यक्ति की जान बचाना लगभग असंभव होता है क्योंकि अब तक इस बीमारी में 97 प्रतिशत मामलों में रोगी की मृत्यु हो जाती है...
दिमाग खाने वाला अमीबा कोई नई खोज नहीं है। लेकिन इससे जुड़ी नई और चिंताजनक बात ये सामने आई है कि अब यह बीमारी दुर्लभ नहीं रह रही। इस अमीबा को नेगलेरिया फाउलेरी कहा जाता है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि नेगलेरिया फाउलेरी (Naegleria fowleri) अमीबा को पहले कुछ गिने-चुने गर्म क्षेत्रों की समस्या माना जाता था। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के कारण ये धीरे-धीरे अपने पांव दुनिया के नए हिस्सों में पसार रहा है।
जब हम जलवायु परिवर्तन की बात करते हैं तो आमतौर पर आंखों के सामने पिघलते ग्लेशियर, बढ़ता तापमान या अनियमित बारिश की तस्वीरें आती हैं। लेकिन विज्ञान अब हमें यह भी दिखा रहा है कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। यह हमारे पानी, हमारी नसों और हमारे दिमाग तक पहुंच चुका है...
अमीबा क्या होता है?
अमीबा एक बहुत ही सूक्ष्म जीव होता है, जिसे हम नंगी आंखों से नहीं देख सकते। यह एक कोशिका वाला जीव है। यानी इसका पूरा शरीर सिर्फ एक ही सेल से बना होता है। यह आमतौर पर पानी, गीली मिट्टी, तालाब, झील, नहर और गंदे पानी में पाया जाता है। अधिकांश अमीबा हानिरहित होते हैं और प्रकृति में सफाईकर्मी की तरह काम करते हैं। लेकिन कुछ खास प्रकार के अमीबा ऐसे होते हैं जो अगर शरीर के अंदर गलत रास्ते से पहुंच जाएं, तो गंभीर बीमारी पैदा कर सकते हैं।
क्या है दिमाग को खाने वाला अमीबा और क्यों इतना घातक?
नेगलेरिया फाउलेरी एक सूक्ष्म अमीबा है, जो गर्म मीठे पानी में पनपता है। झीलें, तालाब, गर्म नदियां, ठहरा हुआ पानी, ठीक से साफ न की गई पानी की टंकियां इत्यादि, ये सभी इस अमीबा के लिए अनुकूल वातावरण बनाते हैं।
यह अमीबा तब खतरनाक बनता है, जब दूषित पानी नाक के रास्ते शरीर में चला जाता है। यह पानी पीने से नहीं फैलता बल्कि नाक के भीतर प्रवेश करने के बाद घ्राण तंत्रिका ( Sense of Smell System ) के माध्यम से सीधे दिमाग तक पहुंचता है। वहां यह प्राइमरी अमीबिक मेनिंगोएन्सेफेलाइटिस ( Primary Amoebic Meningoencephalitis ) नामक गंभीर संक्रमण पैदा करता है। यह निष्कर्ष जर्नल Biocontaminant में प्रकाशित एक नए अध्ययन में बताया गया है।
क्यों बेहद घातक है ये अमीबा?
प्राइमरी अमीबिक मेनिंगोएन्सेफेलाइटिस बीमारी की सबसे डरावनी बात इसकी मृत्यु दर है। पुराने आंकड़ों के अनुसार, इसके 95 प्रतिशत से अधिक मामलों में मरीज को बचाया नहीं जा सका। यानी यह उन बीमारियों में शामिल है, जहां समय और विकल्प दोनों बेहद सीमित होते हैं।
अमेरिका की सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन के शोध भी साफ बताते हैं कि यह संक्रमण तब होता है, जब संक्रमित पानी नाक के माध्यम से शरीर के अंदर जाता है। एक बार यह संक्रमण हो जाता है तो व्यक्ति की जान बचाना लगभग असंभव होता है क्योंकि अब तक इस बीमारी में 97 प्रतिशत मामलों में रोगी की मृत्यु हो जाती है।
जलवायु परिवर्तन ने क्यों बढ़ा दिया इसका खतरा?
हालिया अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह स्पष्ट रूप से सामने आया है कि बढ़ता वैश्विक तापमान इस अमीबा के लिए सबसे अनुकूल स्थिति पैदा कर रहा है। नेगलेरिया फाउलेरी को गर्म पानी पसंद है। जैसे-जैसे जल स्रोतों का तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इसके जीवित रहने और तेजी से बढ़ने की संभावना भी बढ़ती जा रही है।
पहले यह अमीबा केवल कुछ उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक सीमित था। लेकिन अब वैज्ञानिक देख रहे हैं कि यह उन इलाकों में भी पाया जा रहा है, जहां पहले इसका नाम भी नहीं लिया जाता था। यह बदलाव सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि लंबे समय तक गर्म रहने वाला मौसम, सूखा, और फिर अचानक भारी बारिश, ये सभी परिस्थितियां पानी को गर्म और ठहरा हुआ बना देती हैं। यही स्थिति इस अमीबा के लिए आदर्श मानी जाती है।
क्यों साधारण जल शोधन भी हमेशा पर्याप्त नहीं
एक और चिंताजनक पहलू यह है कि यह अमीबा सामान्य परिस्थितियों में काफी सहनशील होता है। शोध बताते हैं कि यह हल्के क्लोरीन ट्रीटमेंट, गर्म पानी और पुरानी पाइपलाइन जैसी स्थितियों में भी जीवित रह सकता है। यही कारण है कि कई बार नल या टंकी का पानी दिखने में साफ होने के बावजूद सुरक्षित नहीं होता। विशेषकर पुराने शहरों में, जहां जल आपूर्ति की पाइपलाइन जर्जर हो चुकी है, वहां गर्म मौसम में यह खतरा और बढ़ जाता है। यह स्थिति हमें ये समझने पर मजबूर करती है कि जल सुरक्षा केवल पानी की उपलब्धता का प्रश्न नहीं है। बल्कि उसकी गुणवत्ता और तापमान का भी है।
संक्रमण का तरीका: जहां सबसे ज्यादा भ्रम होता है
इस बीमारी को लेकर सबसे आम भ्रांति यही है कि यह दूषित पानी पीने से होती है। जबकि विज्ञान साफ कहता है कि ऐसा नहीं है। संक्रमण तब होता है, जब पानी नाक के भीतर चला जाए। तैराकी करते समय, गोता लगाते समय, नाक से पानी चढ़ाने पर या किसी धार्मिक या घरेलू प्रक्रिया में पानी नाक के रास्ते अंदर जाने पर यह खतरा पैदा होता है। नाक से प्रवेश करने के बाद अमीबा सीधे दिमाग तक पहुंचता है, और वहां पहुंचने के बाद उसे रोकना बेहद कठिन हो जाता है।
शुरुआती लक्षण क्यों धोखा दे जाते हैं
इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती इसके शुरुआती लक्षण हैं। तेज सिरदर्द, बुखार, उलटी, गर्दन में अकड़न, रोशनी से परेशानी — ये सभी लक्षण सामान्य संक्रमण जैसे लगते हैं। अक्सर लोग इन्हें वायरल बुखार या सामान्य मेनिन्जाइटिस समझ लेते हैं। लेकिन कुछ ही दिनों में स्थिति तेजी से बिगड़ने लगती है। दिमाग में सूजन बढ़ती है, दौरे पड़ने लगते हैं और चेतना प्रभावित होने लगती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे “तेजी से जान लेने वाला संक्रमण” मानते हैं।
इलाज से ज्यादा जरूरी क्यों है बचाव
वर्तमान चिकित्सा विज्ञान में इस बीमारी के लिए कोई पूर्णतः प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं है। कुछ मामलों में आक्रामक दवाओं और समय पर पहचान से जीवन बचाने की कोशिश की जाती है, लेकिन सफलता दर बहुत कम है। इसलिए वैज्ञानिकों और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का जोर अब इलाज से ज्यादा रोकथाम पर है। गर्म मौसम में बिना साफ किए पानी में तैरने से बचना, नाक में पानी जाने से रोकना और घरेलू जल स्रोतों की नियमित सफाई, यही सबसे कारगर उपाय माने जाते हैं।
One Health दृष्टिकोण और भविष्य की तैयारी
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और पर्यावरण वैज्ञानिक अब इस खतरे को One Health दृष्टिकोण से देख रहे हैं। इसका अर्थ है कि मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और जल संसाधन, तीनों को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ समझा जाए। क्योंकि यह बीमारी केवल एक अमीबा का हमला नहीं है। यह उस असंतुलन का परिणाम है, जो हमने प्रकृति के साथ अपने व्यवहार में पैदा किया है।
यह बीमारी हमें क्या चेतावनी देती है
दिमाग को खाने वाला अमीबा हमें यह याद दिलाता है कि जलवायु परिवर्तन केवल भविष्य की समस्या नहीं है। यह वर्तमान में हमारे जीवन को प्रभावित कर रहा है। यह हमें बताता है कि पर्यावरणीय बदलाव अब सीधे मानव स्वास्थ्य से जुड़ चुके हैं। यह बीमारी दुर्लभ जरूर है, लेकिन इसका संदेश बहुत गहरा है। अगर पानी, स्वच्छता और जलवायु पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो ऐसे अदृश्य खतरे धीरे-धीरे सामने आते रहेंगे।
भारत में भी पैर पसार रहा नेगलेरिया फाउलेरी
भारत के संदर्भ में देखें तो ब्रेन ईटिंग अमीबा (नेगलेरिया फाउलेरी) का खतरा केवल एक दुर्लभ संक्रमण की कहानी नहीं है। भारत में गर्मियों का तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। लंबे हीटवेव, सूखे के बाद अचानक तेज बारिश और जल स्रोतों का सिकुड़ना, ये सभी स्थितियां ऐसे सूक्ष्म जीवों के पनपने के लिए आदर्श वातावरण बनाती हैं। नेगलेरिया फाउलेरी गर्म और ठहरे हुए मीठे पानी में तेजी से बढ़ता है और भारत के कई हिस्सों में तालाब, झीलें, नहरें और यहां तक कि घरेलू पानी की टंकियां भी इस श्रेणी में आती हैं।
चिंता की बात यह है कि भारत में जल को उबालकर या फिल्टर कर पीने की जागरूकता तो है लेकिन नाक के जरिए पानी के संपर्क को लेकर लगभग कोई चेतना नहीं है। स्नान, तैराकी, धार्मिक अनुष्ठान या गर्मियों में बच्चों का तालाबों में खेलना, ये सभी गतिविधियां अनजाने में जोखिम बढ़ा सकती हैं। पिछले कुछ वर्षों में केरल, कर्नाटक और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों से आए मामलों ने यह स्पष्ट किया है कि यह संक्रमण अब केवल पश्चिमी देशों की समस्या नहीं रह गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण जब जल का तापमान बढ़ता है तो ऐसे अमीबा की सक्रियता भी बढ़ती है और भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश इसके लिए स्वाभाविक रूप से अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
केरल में मिले इतने केस
भारत में नेगलेरिया फाउलेरी से जुड़े सबसे अधिक मामले दक्षिण भारत में केरल राज्य से सामने आए हैं। साल 2025 में केरल के स्वास्थ्य विभाग ने पुष्टि की कि 69 से अधिक लोग इस अमीबा के कारण पीड़ित हुए, जिनमें से कम से कम 19 की मौत हुई हैं और संक्रमितों में तीन महीने के शिशु से लेकर बुज़ुर्ग तक शामिल हैं।
राज्य में स्वास्थ्य अधिकारी समस्याओं से निपटने के लिए 'Water is Life' अभियान, सोपदानुकृति (well chlorination) और जागरूकता कार्यक्रम चला रहे हैं ताकि लोग पानी को नाक में जाने से रोकें, खासकर तैराकी या स्नान जैसी गतिविधियों के दौरान।
कुछ मेडिकल रिपोर्ट्स में यह भी दिखा है कि 2024–25 के दौरान कुल 100 से अधिक अमीबिक एन्सेफलाइटिस (मस्तिष्क संक्रमण) के मामले दर्ज किए गए, जिनमें से करीब 23 लोगों की जान चली गई। कोल्लम और तिरुवनंतपुरम जैसे जिलों में केस और मौतों की संख्या बढ़ी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या केवल एक-दो स्थान तक सीमित नहीं रही।
कुल मिलाकर दिमाग खाने वाले अमीबा के बढ़ने की स्थिति केवल एक संक्रमण नहीं है। यह कहानी है बदलते पर्यावरण, बढ़ते तापमान और हमारे स्वास्थ्य के बीच गहराते रिश्ते की। विज्ञान हमें डराने नहीं बल्कि चेताने की कोशिश कर रहा है। समय रहते अगर हमने पानी, स्वच्छता और पर्यावरण को प्राथमिकता नहीं दी तो भविष्य में ऐसी बीमारियां केवल खबरों तक सीमित नहीं रहेंगी। बल्कि महामारी के रूप में सामने आएंगी! यही कारण है कि दिमाग को खाने वाला अमीबा आज चिकित्सा विज्ञान के लिए नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता के लिए एक गंभीर चेतावनी बन चुका है।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्शक करें।

