
लक्षण दिखने से पहले कैंसर का पता लगा लेते हैं ये टेस्ट, सेफ्टी टिप्स
कोलोरेक्टल कैंसर की स्क्रीनिंग उन लोगों के लिए जरूरी मानी जाती है, जिनके परिवार में इस कैंसर का इतिहास हो, जिनका खान-पान रेड मीट से भरपूर और फाइबर में कम हो...
Cancer Preventing Test: कैंसर की जांच के बारे में यह सच है कि कोई एक ऐसा टेस्ट नहीं है, जो हर तरह के कैंसर को पहचान सके। लेकिन नियमित स्क्रीनिंग कुछ खास प्रकार के कैंसर को उस समय पकड़ सकती है, जब शरीर में अभी कोई लक्षण भी दिखाई नहीं देते। स्क्रीनिंग की जरूरत और समय व्यक्ति की उम्र, लिंग, पारिवारिक इतिहास और व्यक्तिगत जोखिम पर निर्भर करता है। इसलिए इसकी सलाह हर किसी के लिए एक जैसी नहीं होती।
मैमोग्राम
ब्रेस्ट कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए मैमोग्राम को सबसे प्रभावी जांचों में गिना जाता है। भारत में आमतौर पर महिलाओं को 45 वर्ष की उम्र के बाद हर साल मैमोग्राम कराने की सलाह दी जाती है। यह एक विशेष एक्स-रे जांच होती है, जो ब्रेस्ट में होने वाले बदलावों को उस वक्त भी दिखा सकती है, जब गांठ हाथ से महसूस नहीं होती। इसके साथ-साथ हर महीने ब्रेस्ट की स्वयं जांच और हर 6 से 12 महीने में क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जाम कराने की सलाह दी जाती है। कम उम्र की महिलाओं में ब्रेस्ट टिश्यू अधिक घना होने के कारण मैमोग्राम की सटीकता कुछ कम हो सकती है। ऐसे मामलों में, यदि परिवार में ब्रेस्ट कैंसर का इतिहास हो या आनुवंशिक जोखिम अधिक हो तो डॉक्टर की सलाह पर अल्ट्रासाउंड या MRI से पहले जांच की जा सकती है।
पैप स्मीयर और HPV स्क्रीनिंग
पैप स्मीयर टेस्ट गर्भाशय ग्रीवा (Uterine cervix) की कोशिकाओं में होने वाले शुरुआती बदलावों को पहचानने में मदद करता है, जो आगे चलकर कैंसर का रूप ले सकते हैं। आमतौर पर इसे 25 साल की उम्र से शुरू करने और हर 3 से 5 साल में कराने की सलाह दी जाती है। HPV स्क्रीनिंग अक्सर पैप स्मीयर के साथ की जाती है क्योंकि HPV वायरस सर्वाइकल कैंसर का मुख्य कारण माना जाता है। हालांकि स्क्रीनिंग से बीमारी जल्दी पकड़ में आ सकती है लेकिन सबसे प्रभावी बचाव उपाय HPV वैक्सीन है।
अल्ट्रासाउंड और CA-125 टेस्ट
ओवेरियन कैंसर की पहचान शुरुआती स्तर में करना चुनौतीपूर्ण होता है। क्योंकि इसके लक्षण अक्सर स्पष्ट नहीं होते। सामान्य आबादी के लिए इसकी नियमित स्क्रीनिंग की सिफारिश नहीं की जाती। लेकिन जिन महिलाओं के परिवार में ब्रेस्ट या ओवेरियन कैंसर का इतिहास हो या जिनमें BRCA1 या BRCA2 जीन से जुड़ा जोखिम हो, उनके लिए स्क्रीनिंग जरूरी हो सकती है। ऐसे मामलों में अल्ट्रासाउंड या ट्रांसवेजाइनल स्कैन के साथ CA-125 ब्लड टेस्ट की मदद ली जाती है।
कोलोनोस्कोपी और स्टूल टेस्ट
कोलोरेक्टल कैंसर की स्क्रीनिंग उन लोगों के लिए खासतौर पर जरूरी मानी जाती है, जिनके परिवार में इस कैंसर का इतिहास हो, जिनका खान-पान रेड मीट से भरपूर और फाइबर में कम हो या जिन्हें आनुवंशिक समस्याएं जैसे फैमिलियल एडिनोमेटस पॉलीपोसिस या हेरिडिटरी नॉन-पॉलीपोसिस कोलोरेक्टल कैंसर हों। इसकी जांच के लिए कोलोनोस्कोपी, फ्लेक्सिबल सिग्मॉयडोस्कोपी और मल में छिपे खून की जांच जैसे टेस्ट किए जाते हैं। समय रहते प्री-कैंसरस पॉलीप्स को हटाने से कैंसर बनने से पहले ही उसे रोका जा सकता है।
कैंसर के मामले में एक बात बिल्कुल साफ है कि जितनी जल्दी बीमारी पकड़ में आए, उतना बेहतर इलाज संभव होता है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग नियमित जांच को टाल देते हैं। वजह अक्सर यही होती है कि उन्हें कोई लक्षण महसूस नहीं होते या फिर मन में यह डर होता है कि कहीं कोई गंभीर बीमारी न निकल आए। लेकिन इस डर से बाहर आकर काम करना जरूरी है ताकि बीमारी को बढ़ने से रोका जा सके।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।

