AI और गूगल ज्ञान से बढ़ी डॉक्टर्स की समस्या, उपचार में मिल रही चुनौती
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डॉक्टर्स वर्सेज़ एआई का स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान

AI और गूगल ज्ञान से बढ़ी डॉक्टर्स की समस्या, उपचार में मिल रही चुनौती

कभी-कभी एआई सेहत से जुड़ी समस्या के छोटे से लक्षण को भी बड़ी और डरावनी बीमारी से जोड़ देता है। जैसे, साधारण सिर दर्द को ब्रेन ट्यूमर तक पहुंचा देना...


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AI vs Doctors: जनवरी 2026 की ओपन एआई की रिपोर्ट बताती है कि हर महीने करीब 4 करोड़ लोग अपनी सेहत से जुड़ी सलाह एआई से ले रहे हैं। साथ ही, नेचर मेडिसिन में प्रकाशित स्टडी बताती है कि चैट जीपीटी सेहत से जुड़े आपात स्थिति वाले मामलों में 51.6 प्रतिशत बार गलत सलाह दे रही है। वहीं, दिल्ली-एनसीआर सहित देश के लगभग हर हिस्से के डॉक्टर्स भी ऐसे मरीजों का इलाज करने में कई तरह की भावनात्मक और विश्वास संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, जो चैट जीपीटी, एआई और गूगल ज्ञान के साथ इलाज कराने आते हैं...


मरीज के एआई ज्ञान का सामना करने की चुनौती

कैलाश दीपक हॉस्पिटल के हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) डॉक्टर चंद्राशु चौधरी बताते हैं कि AI और ChatGPT से अपनी स्वास्थ्य समस्या साझा करने वाले मरीज आकर सीधे-सीधे यह नहीं बताते कि उन्हें क्या समस्या हो रही है। बल्कि वो सबसे पहले अपनी जानकारी का प्रर्दशन करते हैं...जैसे, वो आते ही कहेंगे कि डॉक्टर साहब मेरे सीने में दर्द हुआ था, मैंने ईसीजी करा लिया है। एआई ने ये फलां-फलां टेस्ट भी कराने का सुझाव दिया था तो हमने वो भी करा लिए, इनकी रिपोर्ट्स भी हमने एआई से चेक करा ली है, एआई ने ये बताया है। अब हमें घबराहट हो रही है, बताइए क्या करना चाहिए...उनकी पूरी बात सुनने के बाद, जब हम उन्हें कुछ बताने या समझाने का प्रयास करते हैं तो उनके पास इसके लिए काउंटर्स यानी प्रतिउत्तर पहले से तैयार होते हैं। ऐसे में कई बार हमारे पास समय के साथ ही धैर्य की भी कमी होने लगती है, आखिर हम भी इंसान ही हैं और हमारे लिए अन्य मरीज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जो बाहर बैठकर अपना नंबर आने की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।

इनमें भी सबसे अधिक चुनौती उन युवाओं के साथ पेश आती है, जो अपने दादा-दादी या नाना-नानी को लेकर हॉस्पिटल आते हैं। इंटरनेट के युग में पैदा हुए इन बच्चों की व्यवहारिक समझ के बारे में तो क्या ही कहा जाए... ये ठीक से पूरी बात सुनने को भी तैयार नहीं होते, समझने का प्रयास तो क्या ही करेंगे! ऐसे में इन्हें समझाने की हमारी चुनौती बहुत अधिक बढ़ जाती है। फिर भी ये पूरी तरह तब तक विश्वास नहीं कर पाते, जब तक इनके साथ आया हुआ मरीज हमारी बताचीत सुनकर, हमारे द्वारा बताए गए लक्षणों से सहमति जताते हुए यह ना कह दे कि डॉक्टर साहब जो कह रहे हैं, वैसा ही हुआ था मेरे साथ! यह पूरी प्रक्रिया हमें मानसिक रूप से काफी थका देनेवाली होती है। इतने पर भी मरीज के ऐसे परिजन फिर से एआई से प्रिस्क्रिप्शन और दवाएं चेक करते हैं और कुछ समझ ना आए तो या तो हमारे पास ही दोबारा आएंगे या यही उलझनें लेकर किसी दूसरे डॉक्टर के पास पहुंच जाएंगे! ऐसे में सबसे ज्यादा समस्या मरीज की बीमारी बढ़ जाने की होती है। समय पर सही इलाज नहीं मिल पाता या इलाज मिलने में देरी होती है तो मरीज की सेहत और बिगड़ जाती है।


मशीन खरीदकर खुद ही कर ली अपनी फीजियोथेरेपी!

जॉइंट केयर की सीईओ सीनियर फिजियोथेरेपिस्ट डॉक्टर वंदना चौहान एआई और चैटजीपीटी ज्ञान प्राप्त करके आने वाले मरीजों के बारे में बात करते हुए अपने कई अनुभव साझा करती हैं। ये अपने एक पेशेंट के बारे में बताती हैं, जिसने पीठ की अकड़न और गर्दन दर्द के बारे में एआई से जानकारी हासिल की और ट्रांसक्यूटेनियस इलेक्ट्रिकल नर्व स्टिमुलेशन (T.E.N.S) जिसे आम बोलचाल की भाषा में टेंस मशीन कहते हैं, इसे खरीद लिया। और बिना किसी फिजियोथेरेपिस्ट के मार्गदर्शन के अपने आप ही घर में मशीन का उपयोग शुरू कर दिया। लगातार ऐसा करने से इनके ऊत्तक चोटिल (टिश्यूज डैमेज) हो गए, जिससे दर्द और अकड़न के साथ ही अब दुखन की समस्या भी बढ़ गई।

जब यह मरीज डॉक्टर वंदना के पास अपनी समस्या लेकर पहुंचा तो इन्हें समस्या की तह तक जाने के प्रयास में टिश्यूज डैमेज होने का कारण पता चला। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फिजियोथेरेपिस्ट इस मशीन के माध्यम से दर्द और जकड़न से पीड़ित मरीजों का इलाज विद्युत तरंगे देकर करते हैं। इसके उपयोग की एक तय समय सीमा होती है, जो मरीज की स्थिति के अनुसार अलग-अलग समय और तरंगों की तीव्रता पर स्थिर की जाती है। यदि इसे ज्यादा देर तक या हाई फ्रिक्वेंसी पर उपयोग किया जाए तो टिश्यूज के डैमेज होने या मासपेशियों में समस्या होने का खतरा बढ़ जाता है।

डॉक्टर वंदना अपनी बात जारी रखते हुए कहती हैं 'इंटरनेट के माध्यम से स्वास्थ्य संबंधी जानकारी हासिल करके आने वाले मरीजों का इलाज करना शुरुआती स्तर पर काफी चुनौतीभरा होता है। क्योंकि अब हमें केवल मरीज की समस्या पर ध्यान नहीं देना होता बल्कि पहले उसके आधे-अधूरे ज्ञान का निबटारा करना होता है। इस स्थिति को बिगाड़ने में उन डॉक्टर्स का रोल भी अहम है, जो सोशल मीडिया पर 3-3 मिनट के विडियो डालकर भ्रम बढ़ाने का काम करते हैं, इनमें कुछ लोग तो और एक कदम आगे बढ़कर अब दवाइयों के नाम भी सुझाने लगे हैं कि कौन-सी दवाई लेनी चाहिए...मरीज की पूरी तरह जांच किए बिना दवाई कैसे बता सकते हैं आप! आखिर एक विडियो शॉर्ट्स के इतने कम टाइम में आप किसी बीमारी के कारण, लक्षण और समाधान के बारे में कितना ही बता पाओगे और गैर चिकित्सकीय पृष्टभूमि का व्यक्ति इसकी गहराई को कितना ही समझ पाएगा! मैं कहना चाहूंगी कि ऐसे डॉक्टर्स सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने और ग्लैमर का चस्का छोड़कर अपने काम पर अधिक ध्यान दें, इससे मरीजों को भी अधिक लाभ मिलेगा और आपके करियर को भी।'


बढ़ जाता है एग्जॉशन

मैक्स हॉस्पिटल के सीनियर सायकाइट्रिस्ट डॉक्टर राजेश कुमार कहते हैं कि एआई, चैटजीपीटी या गूगल से अपनी बीमारी के बारे में बहुत सारी बातें जानने के बाद जब मरीज हमारे पास आता है तो हमारे सामने पहली चुनौती यह होती है कि उसके आधे-अधूरे ज्ञान को सुनकर, उसे समझाना होता है कि आप जो बात बता रहे हैं, वह इस स्थिति में सही होती है और इस स्थिति में सही नहीं होती। जैसे, एक पेशेंट को लग रहा था कि उसे अवसाद (डिप्रेशन) हो गया है। उसने आते ही कहा कि उसे डिप्रेशन हो गया है और उसने इसके लिए कुछ दवाओं के नाम भी इंटरनेट से पता कर लिए हैं लेकिन बिना डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के ये दवाएं उसे किसी मेडिकल से नहीं मिलेंगी इसलिए उसे प्रिस्क्रिप्शन चाहिए।

फिर जब मैंने उससे पूछा कि तुम्हें कैसे पता कि तुम्हें डिप्रेशन हो गया है तो उसने बताया कि उसने अपनी परेशानी और लक्षण चैटजीपीटी को बताए और चैटजीपीटी ने बताया कि वो डिप्रेशन में है। फिर मैंने काफी देर उससे बात की, उसकी काउंसलिंग की और इस दौरान उसकी समस्याओं और लक्षणों को जाना तो पता लगा कि वह गंभीर तनाव और ओवर थिंकिंग की समस्या से जूझ रहा है। ये डिप्रेशन यानी अवसाद से एकदम अलग स्थितियां हैं और इनका उपचार भी काफी अलग होता है।

इस तरह की आधी-अधूरी जानकारी मरीज के लिए तो नुकसानदायक होती ही है, हमारे लिए भी चुनौतीपूर्ण स्थिति बन जाती है। क्योंकि ऐसे पेशेंट्स को समझाने में समय बहुत अधिक लगता है, दूसरे मरीजों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है और हमें भी काफी मानसिक और भावनात्मक थकान हो जाती है। इसके बाद भी इस बात की आशंका बनी रहती है कि मरीज बताई गई बातों को मानेगा या नहीं। क्योंकि काफी समझाने के बाद भी मरीज डॉक्टर की बात पर विश्वास नहीं कर पाता और अपनी बात को सही साबित करने के लिए किसी अन्य डॉक्टर के पास उन्हीं तर्क-वितर्क के साथ पहुंच जाता है। अब डॉक्टर्स स्वाइप करने का ये ट्रेंड बहुत अधिक देखने को मिल रहा है।


गंभीर स्तर पर बढ़ रहा है अविश्वास

उद्गम मेंटल हेल्थ केयर ऐंड रिहेबिलिटेशन सेंटर की सीनियर क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट इरा गुप्ता कहती हैं कि एआई, चैट जीपीटी, गूगल हो या कोई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म। यहां मिलने वाला स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान लोगों में बीमारियों के प्रति जागरूकता तो बढ़ा रहा है। लेकिन साथ ही अविश्वास को भी बहुत अधिक बढ़ा रहा है। यह अविश्वास अपने डॉक्टर के प्रति हो सकता है, अपने परिवार के प्रति हो सकता है, अपने काउंसलर के प्रति हो सकता है और यहां तक कि मेडिकल स्टोर पर मिलने वाली दवाओं के प्रति भी हो सकता है। मानसिक और भावनात्मक समस्याओं का सामना कर रहे मरीज इंटरनेट से अपनी समस्याओं का समाधान खोजते हैं, ऐसे में उन्हें जो फीड पढ़ने को मिलती है, उसे हर व्यक्ति अपने नजरिए से देखता है और जो व्यक्ति पहले ही मानसिक उलझनों और भावनात्मक उथल-पुथल से गुजर रहा हो, उसकी मूल्यांकन क्षमता उतनी बेहतर नहीं रह जाती, जितनी सामान्य स्थिति में होती है। ऐसे में कई तरह की दिक्कतें मरीज के लिए तो बढ़ ही जाती हैं, हमारे लिए भी बढ़ती हैं। क्योंकि मानसिक या भावनात्मक समस्या से जूझ रहे मरीज को यह विश्वास दिला पाना और अधिक चुनौतीभरा हो जाता है कि हम उसके भले की बात कर रहे हैं, हम पूरी तरह उसके साथ हैं और स्थितियां ठीक हो जाएंगी।


एआई से पूछा इंफेक्शन का इलाज, बढ़ गई समस्या

गायनेकोलॉजिस्ट गीतांजलि शर्मा बताती हैं कि महिलाएं और युवा बच्चियां इस इंटरनेट ज्ञान के चक्कर में अपनी सेहत से खिलवाड़ करने लगी हैं। मेरी एक 42 वर्षीय मरीज ने जननांग के पास कुछ दाने और खुजली की समस्या होने पर फोटो खींचकर एआई से पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए और ये किन दवाओं से ठीक होगा। दवाइयों का नाम पता चलने पर उसने एआई द्वारा बताए गए क्रीम को लगाया भी और खाने वाली दवाएं खाईं भी। लेकिन समस्या ठीक होने की जगह संक्रमण बढ़ गया। ऐसे में उसने फिर से फोटो खींचकर फिर एआई को बताया कि समस्या कम नहीं हुई तो एआई ने दूसरी दवाएं उसे बताईं...इससे पहले कि वो ये दवाएं लेती, इस बीच उसने अपनी बहन से अपने इंफेक्शन और इन सारी बातों की चर्चा की तब उसकी बहन उस महिला को मेरे पास लेकर आई और अभी उसका इलाज चल रहा है। यह तो बस एक घटनाभर है। इंटरनेट ज्ञान के चलते अपनी सेहत को लेकर ऐसे कई तरह के खतरे लोग उठा रहे हैं।


बस करो अब थोड़ा हम भी चेक कर लें

दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग हॉस्पिटल्स में अपनी सेवाएं देने वाली IVF एक्सपर्ट डॉक्टर शुचि कालिया बताती हैं कि आजकल ज्यादातर मरीज अपनी सेहत से जुड़ी समस्या के बारे में पहले से ही इंटरनेट से काफी कुछ पढ़कर आते हैं। ऐसे में कई बार यह हमारे लिए काफी सहायक भी होता है और कई बार काफी दिक्कत भरा। ये पूरी तरह निर्भर करता है मरीज के माइंडसेट पर। क्योंकि कुछ मरीज, जो सही जानकारी के साथ पहुंचते हैं, उन्हें तुरंत बात समझ में आ जाती है और वो किसी तरह के तर्क-वितर्क नहीं करते। साथ ही दवाओं को भी बताई गई विधि से सही समय पर लेते हैं। लेकिन जो लोग अधपकी जानकारी के साथ आते हैं, उन्हें समझाना काफी मुश्किल होता है। कई बार तो मन करता है कि बोल दूं, बस करो, धोड़ा हम भी चेक कर लें कि क्या करना है! हालांकि ऐसे मरीजों को डील करने का मैंने अपना तरीका बना लिया है, मैं इनसे कहती हूं कि सबसे पहले आप अपने दिमाग से वो सब डिलीट करो, जो इंटरनेट से पढ़कर आए हो। फिर मेरी बात ध्यान से सुनों, इसके बाद अगर मन में कोई प्रश्न आए तो पूछना।


इंटरनेट जगत को डॉक्टर का विकल्प बनाने के नुकसान

- मरीज स्थिति बिगाड़कर डॉक्टर्स के पास पहुंचते हैं

- समय पर सही उपचार ना मिल पाने से जान का जोखिम भी बढ़ जाता है।

- कम स्तर की बीमारी का गंभीर आंकलन करने से मरीज मानसिक रूप से तनाव में आ जाते हैं।

- बीमारी को लेकर सही जानकारी नहीं मिलने और कुछ अन्य ही डरा देने वाले तथ्य सामने आने से कुछ मरीजों को एंग्जाइटी अटैक और पैनिक अटैक्स का सामना करना पड़ जाता है।

- एआई और सोशल मीडिया पर बताई गई दवाएं कई बार रिऐक्शन कर जाती हैं। क्योंकि यदि मरीज के शरीर में एक से अधिक दिक्कत हैं तो जरूरी नहीं कि इंटरनेट पर मिला दवाई का सुझाव आपके लिए सही ही हो।

- यह बात केवल दवाओं तक सीमित नहीं है बल्कि एक्सर्साइज और फिटनेस टिप्स पर भी लागू होती है। जैसे, पेट की चर्बी घटाने के लिए जो एक्सर्साइज सामान्य स्थिति में सुझाई जा सकती है, सर्जरी के बाद या पेट संबंधी कुछ अन्य स्थितियों में नहीं सुझाई जा सकती।

ये सभी अंतर एक डॉक्टर एक विशेषज्ञ ही डाइग्नॉज करने या पूरी जांच के बाद पता लगा सकता है। एआई, चैटजीपी या सोशल मीडिया पर सजेशन देने वाले विडियोज नहीं। इसलिए इंटरनेट आधारित इन सभी सूचना देने वाले माध्यमों को अपने ज्ञान और जागरूकता बढ़ाने के लिए उपयोग करें ना कि अपने डॉक्टर के विकल्प के रूप में! सेहत से जुड़ी छोटी से छोटी समस्या को ठीक करने के लिए भी डॉक्टर के सुझाव के बिना कोई दवाई ना खाएं।


क्या सारी गलती एआई और ऐसे दूसरे माध्यमों की ही है?

इन सभी घटनाक्रमों को पढ़कर अगर आपकी नजरों में एआई, चैटजीपीटी, गूगल और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स विलेन बन रहे हैं तो यह सही नहीं है। क्योंकि इन्हें कोई गलत जानकारी देने के लिए तैयार नहीं किया गया है। बल्कि इनसे सही जानकारी लेने का एक तरीका होता है। एआई सही सलाह तभी देता है, जब उसे आपकी सेहत से जुड़ी पूरी जानकारी मिले, जो कि किसी भी आम व्यक्ति के लिए एआई को उपलब्ध करा पाना संभव नहीं होता है। क्योंकि डॉक्टर आपसे जो एक-दो छोटी-छोटी लाइनों में प्रश्न पूछते हैं और आपकी मेडिकल हिस्ट्री की जानकारी ले लेते हैं, एआई वैसा नहीं कर पाता है, उसे आपको हर जानकारी पहले से ही बतानी पड़ेगी, फिर भी बारीकियों को समझने में कोई ना कोई कमी रह जाना सामान्य है।


कैसे करें AI का सही उपयोग?

एआई और इंटरनेट आधारित अन्य माध्यमों का सेहत से जुड़ी जानकारी पाने में उपयोग करते समय आप इनमें अपनी स्वास्थ्य समस्या के साथ ही अधिक से अधिक मेडिकल हिस्ट्री साझा करें और फिर AI से कहें कि मुझसे एक डॉक्टर की तरह सवाल पूछो। इस प्रक्रिया में आपको सही उत्तर मिलने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

इसके साथ ही एआई गलत डाइग्नॉसिस पकड़ने में सहायक हो सकता है। अपनी मेडिकल रिपोर्ट्स से जुड़ी जानकारी एआई से साझा करें और फिर उसके सुझाव देखें। लेकिन इन्हें आखिरी ना समझें बल्कि इन पर अपने डॉक्टर से खुलकर बात करें। यानी आप अपनी मेडिकल स्थिति को सही तरीके से समझने में एआई की सहायता ले सकते हैं। यह प्रक्रिया आपको बताती है कि आपको अपने डॉक्टर से कौन-कौन से बिन्दुओं पर बात करनी चाहिए।

इजराइल डीकोनेस मेडिकल सेंटर बोस्टन में एआई प्रोग्राम के डायरेक्टर डॉक्टर एडम रॉडमैन बेथ का कहना है कि 'एआई का उपयोग सहायक की तरह करें ना कि अपने डॉक्टर के विकल्प के रूप में। क्योंकि इससे ज्यादा सवाल पूछने के चक्कर में आप बिना कारण चिंता में पड़ सकते हैं।' सेहत से जुड़ी भ्रामक और गलत जानकारियों से जुड़े विषयों पर ओपन एआई ने भी अपना पक्ष रखा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कंपनी का कहना है कि 'लोग असल जिंदगी में एआई का उपयोग अलग तरीके से करते हैं और मॉडल को लगातार रिफाइन किया जा रहा है।'

कई अलग-अलग शोध यह दावा पेश करते हैं कि चैटजीपीटी लोगों को खुश करने वाले उत्तर देता है। जैसे, यदि मरीज कह दे कि उसके दोस्त ने इस बीमारी को मामूली बताया है तो एआई द्वारा लक्षणों को कम गंभीर बताने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। वहीं, यदि कोई व्यक्ति अपनी बीमारी के लक्षणों के प्रति बहुत अधिक गंभीरता दिखाता है तो एआई भी उसे घबरा देने वाले परिणाम ही दिखाता है। उपलब्ध डेटा के आधार पर बात करें तो लगभग 65 प्रतिशत लोग जो पूरी तरह सुरक्षित थे, उनके द्वारा बताए हल्के-फुल्के लक्षणों को भी एआई ने बहुत गंभीर बताते हुए उन्हें तुरंत इमरजेंसी में भर्ती होने की सलाह दी।

चिकित्सा और जैव-चिकित्सा (Biomedical) शोध पत्रिका 'नेचर मेडिसिन' में छपे शोध के अनुसार, चैटजीपीटी स्वास्थ्य चिकित्सा से जुड़ी गंभीरता को पहचानने में भारी चूक कर रहा है। जिन मामलों में जीवन बचाने के लिए तुरंत अस्पताल जाना अनिवार्य था, उनमें लगभग 52 प्रतिशत बार एआई ने मरीज को घर पर आराम करने या फिर डॉक्टर का सामान्य अपॉइंटमेंट लेने की सलाह दी। इस तरह की लापरवाही किसी की जान का जोखिम बढ़ा सकती है। इसलिए हम फिर एक बार आपसे यही कहेंगे कि एआई और ऐसी अन्य तकनीक को अपनी जागरूकता बढ़ाने के लिए उपयोग करें, अपने चिकित्सक के विकल्प के रूप में नहीं।

डिसक्लेमर- आर्टिकल में उपयोग आंकड़ें पब्लिक डोमेन में उपलब्ध डेटा पर आधारित हैं और डॉक्टर्स के अपने व्यक्तिगत अनुभव हैं।


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