
मात्र 40 की उम्र में पड़ने लगती है डिमेंशिया की नींव, संभव है बचाव
डिमेंशिया की नींव 40 की उम्र के आसपास ही पड़ने लगती है, जब दिमाग की कोशिकाओं में सूक्ष्म स्तर पर सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और मिनरल असंतुलन शुरू हो जाता है...
डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) को हम बुढ़ापे में होने वाली बीमारी मानते हैं। लेकिन न्यूरोसाइंस के अनुसार, यह दिमाग की कमजोरी के कारण होती है और इसकी नींव 40 साल की उम्र के आस-पास ही पड़ने लगती है। और दिमाग में यह कमजोरी अचानक 65 या 70 की उम्र में सामने आती है। ऐसे में हमें लगता है कि यह बीमारी बड़ी उम्र में होती है! इस बारे में यह समझना आवश्यक है कि 40 की उम्र में दिमाग की कोशिकाओं के भीतर सूक्ष्म स्तर पर बदलाव शुरू हो जाते हैं। जैसे, हल्की लेकिन लगातार बनी रहने वाली सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और मिनरल असंतुलन। ये ऐसे बदलाव हैं, जो बाहर से दिखाई नहीं देते। लेकिन वर्षों तक जमा होकर खराब याददाश्त, निर्णय क्षमता की कमजोरी और भावनात्मक असंतुलन को बढ़ाने लगते हैं। यही वजह है कि डिमेंशिया को अब 'लेट एज डिज़ीज़' नहीं बल्कि लाइफटाइम ब्रेन प्रोसेस माना जा रहा है...
40 के बाद दिमाग में क्या बदलने लगता है?
40 की उम्र के बाद दिमाग के न्यूरॉन्स के बीच का संवाद धीमा होने लगता है। मस्तिष्क की सूक्ष्म रक्त नलिकाओं में लचीलापन कम होता है, जिससे ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की सप्लाई सही तरीके से नहीं हो पाती है। साथ ही माइक्रोग्लिया कोशिकाएं , जो दिमाग की सफाई करती हैं। ये जरूरत से ज्यादा सक्रिय होकर हल्की लेकिन लगातार सूजन पैदा करने लगती हैं। यही क्रॉनिक सूजन आगे चलकर न्यूरोडिजेनेरेशन की जमीन तैयार करती है। न्यूरोडिजेनेरेशन अर्थात मस्तिष्क की कोशिकाएं धीरे-धीरे मरने लगती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में एक अहम भूमिका निभाता है मैग्नीशियम।
मैग्नीशियम और डिमेंशिया का वैज्ञानिक कनेक्शन
ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी (ANU) के Neuroimaging & Brain Lab द्वारा 2023 में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन ने इस संबंध को बेहद स्पष्ट किया। इस रिसर्च में 40 से 73 वर्ष के लगभग 6,000 लोगों के ब्रेन स्कैन और उनके दैनिक आहार का विश्लेषण किया गया। रिसर्च में सामने आया कि जिन लोगों को रोज लगभग 550 मिलीग्राम या उससे अधिक मैग्नीशियम मिला, उनके दिमाग में उम्र से जुड़ी सिकुड़न (Brain Volume Loss) अपेक्षाकृत कम हुई।
यह सिकुड़न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रेन वॉल्यूम का घटना ही डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों की शुरुआती पहचान माना जाता है।रिसर्च यह भी बताती है कि मैग्नीशियम न्यूरॉन्स के बीच सिग्नल ट्रांसमिशन को स्थिर करता है, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करता है और दिमाग में सूजन को नियंत्रित रखने में मदद करता है। यानी यह केवल एक मिनरल नहीं, बल्कि ब्रेन प्रोटेक्टर की तरह काम करता है।
मात्र 40 की उम्र में पड़ने लगती है डिमेंशिया की नींव, ऐसे रोकें
हमारी 40 साल की उम्र ही जीवन का वह पड़ाव है, जब दिमाग बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखता है। लेकिन अंदरूनी स्तर पर कुछ सूक्ष्म बदलाव शुरू हो चुके होते हैं। न्यूरॉन्स के आसपास हल्की-हल्की सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का असंतुलन और ब्रेन एनर्जी मेटाबॉलिज़म का धीमा पड़ना, ये सब मिलकर धीरे-धीरे उस जमीन को तैयार करते हैं, जिस पर आगे चलकर डिमेंशिया खड़ा होता है। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि पर्याप्त मैग्नीशियम लेने वाले लोगों का दिमाग जैविक रूप से अपनी उम्र से लगभग एक साल 'युवा' दिखाई देता है। यानी कैलेंडर की उम्र भले आगे बढ़ रही हो, लेकिन दिमाग की कोशिकाएँ उतनी तेज़ी से बूढ़ी नहीं हो रहीं।
ब्रेन हेल्थ में मैग्निशियम का महत्व?
मैग्नीशियम आखिर इतना अहम क्यों है, यह समझना आवश्यक है। मैग्नीशियम केवल एक खनिज नहीं है। यह दिमाग की 300 से अधिक जैविक क्रियाओं में प्रत्यक्ष भूमिका निभाता है। न्यूरॉन्स के बीच सिग्नल ट्रांसमिशन, सिनैप्स की स्थिरता, माइटोकॉन्ड्रिया की ऊर्जा उत्पादन क्षमता और सूजन नियंत्रण और इन सबका संतुलन मैग्नीशियम पर निर्भर करता है।
यही कारण है कि ARIC-Neurocognitive Study जैसे दीर्घकालिक कोहोर्ट अध्ययनों में यह सामने आया कि जिन लोगों के खून में मैग्नीशियम का स्तर कम था, उनमें डिमेंशिया विकसित होने का जोखिम लगभग 24 प्रतिशत अधिक पाया गया। यानी कमी सिर्फ थकान या मांसपेशियों की जकड़न तक सीमित नहीं रहती बल्कि दिमाग के भविष्य को भी प्रभावित करती है।
चीन की Shanghai Aging Study भी इसी दिशा में इशारा करती है। इस अध्ययन में देखा गया कि जिन वृद्धों का आहार-आधारित मैग्नीशियम सेवन सबसे कम था, उनमें डिमेंशिया की घटनाएं सबसे अधिक दर्ज की गईं। दिलचस्प बात यह रही कि केवल मैग्नीशियम की मात्रा ही नहीं बल्कि कैल्शियम-मैग्नीशियम अनुपात भी दिमागी स्वास्थ्य को प्रभावित करता दिखा।
अमेरिका के NHANES डेटा पर आधारित विश्लेषण ने इसमें एक और परत जोड़ी। उच्च मैग्नीशियम सेवन का संबंध बेहतर ग्लोबल कॉग्निटिव स्कोर से पाया गया, खासकर महिलाओं और उन लोगों में जिनका विटामिन-D स्तर संतुलित था। इसका मतलब यह है कि दिमाग की सेहत किसी एक पोषक तत्व पर नहीं बल्कि पूरे पोषण नेटवर्क पर निर्भर करती है।
डिमेंशिया से बचने के लिए क्या करें?
डिमेंशिया से बचने के लिए न्यूरोसाइंस का उत्तर साफ है कि 40 की उम्र के बाद दिमाग पूरी तरह स्थिर नहीं रहता। यह वह चरण होता है, जब न्यूरोप्लास्टिसिटी होती तो है लेकिन यह धीरे-धीरे कम होने लगती है। इस दौरान अगर शरीर को पर्याप्त मैग्नीशियम, संतुलित वसा, नियंत्रित सूजन और सही नींद मिलती है तो दिमाग अपनी संरचना को लंबे समय तक सुरक्षित रख सकता है।
यही कारण है कि विशेषज्ञ डिमेंशिया को अब 'अचानक होने वाली बीमारी' नहीं बल्कि 'धीरे-धीरे बनने वाली स्थिति' मानते हैं। Journal of Neurodegenerative Disorders और Nutrients जैसे जर्नल्स में प्रकाशित समीक्षाएं स्पष्ट कहती हैं कि माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की लंबे समय तक चलने वाली कमी, खासकर मैग्नीशियम की कमी, दिमाग को ऑक्सीडेटिव क्षति के प्रति संवेदनशील बना देती है।
इस पूरी बात का निचोड़ यही है कि डिमेंशिया केवल याददाश्त कम होने से जुड़ी कोई बीमारी नहीं है। बल्कि यह दिमाग की कोशिकाओं के पोषण, ऊर्जा और सूजन नियंत्रण का असंतुलन है, जो दशकों पहले शुरू हो जाता है। इसलिए 40 साल की उम्र में डरने की नहीं बल्कि संभलने की उम्र है। यह वह समय है जब सही भोजन, सही खनिज, सही नींद और सही जीवनशैली मिलकर दिमाग को आने वाले 20–30 वर्षों के लिए सुरक्षित बना सकते हैं।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।

